गत 1 मार्च को जबलपुर में गुरु तेगबहादुर जी के 350वें शहीदी वर्ष के उपलक्ष्य में एक भव्य एवं प्रेरणादायी व्याख्यान कार्यक्रम का आयोजित हुआ। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह श्री रामदत्त चक्रधर ने गुरु तेगबहादुर जी के अद्वितीय त्याग, तपस्या, धैर्य और अप्रतिम साहस का विस्तृत वर्णन किया।
उन्होंने कहा कि गुरु तेगबहादुर जी का जीवन केवल एक धार्मिक महापुरुष का जीवन नहीं था, बल्कि अन्याय के विरुद्ध निर्भीकता से खड़े होने और सत्य की रक्षा के लिए सर्वस्व अर्पण करने की प्रेरक गाथा है। उन्होंने कहा कि गुरु तेगबहादुर जी गुरु हरगोविंद के सुपुत्र थे। बाल्यावस्था में उनका नाम त्यागमल था, किंतु मात्र 13 वर्ष की आयु में युद्धभूमि में असाधारण वीरता का परिचय देने पर उन्हें ‘तेगबहादुर’ की उपाधि प्राप्त हुई।
यह नाम केवल एक सम्मान नहीं, बल्कि उनके तेजस्वी व्यक्तित्व और अदम्य साहस की पहचान बन गया- तेग (तलवार) की धार जैसी प्रखरता और बहादुरी का प्रतीक। उन्होंने उस ऐतिहासिक कालखंड का स्मरण कराया, जब औरंगजेब के शासनकाल में मजहबी असहिष्णुता और अत्याचार चरम पर थे। उन्होंने कहा कि उस समय अनेक स्थानों पर लोगों पर जबरन कन्वर्जन का दबाव बनाया जा रहा था और समाज भय एवं असुरक्षा के वातावरण में जी रहा था।
ऐसे कठिन समय में गुरु तेगबहादुर जी ने निर्भीकता के साथ अन्याय को ललकारा और स्पष्ट घोषणा की कि यदि उन्हें इस्लाम स्वीकार करने के लिए विवश किया जा सकता है, तभी अन्य किसी को बाध्य किया जा सकता है। यह घोषणा केवल एक चुनौती नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की सशक्त उद्घोषणा थी। उन्होंने कहा कि गुरु तेगबहादुर जी ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि धर्म केवल पूजा-पद्धति का विषय नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और आस्था की स्वतंत्रता का प्रतीक है।
उनका बलिदान किसी एक समुदाय के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए था। उन्होंने श्रीगुरुजी के साथियों– भाई मति दास, भाई दयाला और भाई सती दास के अद्भुत साहस का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि गुरु तेगबहादुर जी का बलिदान भारतीय इतिहास में धार्मिक स्वतंत्रता, नैतिक साहस और मानवीय गरिमा की अमिट मिसाल है।

















