ईरान: खामेनेई की मौत पर भारत में कथित प्रगतिशील महिलाओं का रुदन क्यों?
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ईरान: खामेनेई की मौत पर भारत में कथित प्रगतिशील महिलाओं का रुदन क्यों?

अयातुल्लाह खामनेई की मौत (2026) पर भारत की प्रगतिशील महिलाएं शोक मना रही हैं, लेकिन ईरान में अनिवार्य हिजाब, 9-13 साल में लड़कियों की शादी और महसा अमिनी जैसी घटनाओं पर उनका मौन सवाल उठाता है।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by कुलदीप सिंह
Mar 6, 2026, 11:39 am IST
inविश्व
Iran Ali Khamnei calls women flower

अली खामनेई

ईरान में खामनेई की मौत के बाद जहां राजनीतिक प्रतिक्रियाएं विभाजित हैं, तो वहीं महिलाओं की भी प्रतिक्रियाएं दोहरी आ रही हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि खामनेई का राजनीतिक जीवन महिलाओं के दमन से भरा हुआ रहा है। इस्लामिक क्रांति ने किस प्रकार 1979 में महिलाओं की क्रांति को चुरा लिया था और ईरान के शाह के खिलाफ सुस्ताकर जश्न मनाने की तैयारी करती हुई महिलाओं को एक और संघर्ष में झोंक दिया था। हमने पिछले कई लेखों में उन महिलाओं की कहानियों पर बात की है, ये वे कहानियाँ हैं, जिनपर तमाम स्त्री विमर्श मौन है। ये वे महिलाएं थीं, जिन्होनें ईरान के शाह की फिजूलखर्ची के खिलाफ संघर्ष किया था और अपने लिए समानता का आकाश चाहा था, मगर उन्हें यह पता ही नहीं चला था कि कब उनकी क्रांति का फायदा उठाकर इस्लामिक कट्टरपंथी हावी हो गए और उनकी अपनी ही क्रांति से उन्हें बेदखल कर दिया गया।

महिलाओं के साथ बर्बरता की कहानी

जिन महिलाओं ने शाह के खिलाफ क्रांति की मशाल जलाई, उन्हें ही खलनायिका बनाकर सजाएं दी गईं, और भी ऐसी सजाएं, जिन्हें सुनकर अभी तक रोंगटे खड़े हो जाते हैं, और इसी मजहबी कट्टरपंथ को एक और पायदान ऊपर खामनेई लेकर गए। महिलाओं के लिए हिजाब अनिवार्य कर दिया गया। और यह इतना आवश्यक बना दिया गया कि ऐसा न करने वाली लड़कियों के लिए भयानक यातनाएं मुकर्रर थीं। महसा अमीन की मौत को कौन भूल सकता है? इतना ही नहीं महिलाओं के साथ अत्याचारों की हर सीमा पार कर दी गई थी।

15 अगस्त 2004 की वह घटना कौन भूल सकेगा, जब वहाँ के नेका शहर में एक 16 वर्ष की एक किशोरी को सरेआम इसलिए फांसी दे दी गई थी, क्योंकि उस पर यह आरोप था कि उसने शादी से पहले संबंध बनाए थे। इतना ही नहीं, यह खामनेई की सरकार थी, जिसने लड़कियों की शादी की उम्र को घटाकर 13 वर्ष की गई थी, और उसके बाद वर्ष 2024 में यह उम्र महज 9 वर्ष कर दी गई थी। क्या इतनी कम उम्र में बच्ची को यह पता भी होगा कि शादी का अर्थ क्या होता है? और क्या यह लड़कियों पर एक और अत्याचार नहीं था? परंतु किसी भी महिला विमर्श में न ही ईरान में बच्चियों के साथ होने वाला यह अन्याय शामिल था और न ही उन बेचारी लड़कियों की असमय मृत्यु एवं अंतहीन यातनाएं, जिनका कोई ओरछोर था ही नहीं।

भारतीय छद्म बुद्धिजीवी महिलाओं का खामेनेई की मौत पर रूदन

भारत में तमाम महिलाएं इन दिनों ईरान के खामनेई की मौत का शोक मना रही हैं। उनका यह कहना है कि अमेरिका ने यह बहुत गलत किया कि इस तरह किसी लोकतान्त्रिक देश के मुखिया को मौत दी। मगर ये वही महिलाएं हैं, जिन्हें बांग्लादेश में शेख हसीना की लोकतान्त्रिक तरीके से चुनी गई सरकार के गिरने पर क्रांति का अनुभव हुआ था।

हिन्दू अत्याचार पर चुप्पी

ये वही महिलाएं हैं, जिन्हें बांग्लादेश और पाकिस्तान में हिंदुओं के मारे जाने पर पीड़ा नहीं होती, ये वही महिलाएं हैं, जो यह कहती घूम रही थीं कि बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ जो भी हो रहा है, वह भी उन्हें उस देश का आंतरिक मामला लगा। जब इजरायल पर हमास के आतंकियों ने हमला किया, और यहूदी महिलाओं के साथ अत्याचारों की हर सीमा पार कर दी, तब भी ये महिलाएं मौन रहीं। यहां तक कि अमेरिका का विरोध करते-करते ये महिलाएं अफगानिस्तान में तालिबान शासन द्वारा महिलाओं पर लगाई गई पाबंदियों पर भी मौन रहीं। वे इस बात पर भी अभी तक चुप है कि अफगानिस्तान में लड़कियां पढ़ाई से बेदखल की जा चुकी हैं, मगर ये महिलाएं ईरान के उस शासक की मौत पर मातम मनाने के लिए हर संभव तर्क दे रही हैं, जिसने अपने देश की महिलाओं का जीना कठिन किया हुआ था।

आइए जिस खामनेई की मौत पर भारत का कथित प्रगतिशील महिला वर्ग शोक मना रहा है, उसने अपने देश की महिलाओं के लिए कैसे अमानवीय कानून बनाए थे, उस पर एक दृष्टि डालते हैं।

इसे भी पढ़ें: ईरान में अपनी कठपुतली बिठाना चाहते हैं ट्रंप, कहा-‘सुप्रीम लीडर के तौर पर मोजतबा खामेनेई पसंद नहीं’

9 वर्ष में बच्चियों की शादी

ईरान में लड़कियों की शादी की उम्र को 13 वर्ष तक कर दिया गया था, हालांकि अभिभावकों की अनुमति के साथ यह महज 9 वर्ष की उम्र में भी किया जा सकता था। शादीशुदा महिलाओं के लिए बाहर जाने या फिर पासपोर्ट लेने के लिए शौहर की इजाजत जरूरी थी। आदमियों के लिए एक से ज्यादा शादियाँ भी जायज हैं। और उसके साथ ही तलाक की स्थिति में औलाद की कस्टडी अधिकांश रूप से आदमियों को ही दी जाती है।

अर्थात कहा जाए तो लड़कियों के लिए निजी जीवन के अधिकार पूरी तरह छीनने में कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ी गई थी, हालांकि यह भी बात सत्य है कि वहाँ की अधिकांश जनता ने इन तमाम महिला विरोधी नियमों को माना नहीं था। यही कारण था कि वहाँ पर महिलाओं के हक में आवाज उठाने में पुरुष सबसे आगे रहे थे। और असंख्य पुरुषों ने महिलाओं का साथ देने का दंड भी उसी सरकार के हाथों पाया, जिस सरकार के पक्ष में भारत की प्रगतिशील महिलाओं का एक बहुत बड़ा वर्ग आ गया है।

अनिवार्य हिजाब को लेकर बेहद कड़े कानून और उनका क्रियान्वयन

वैसे तो मार्च 1979 को ही ईरान की महिलाओं के सामने यह स्पष्ट हो गया था कि उनकी क्रांति पर इस्लामिक अतिक्रमण हो गया है और उन्हें अब अपनी आजादी के लिए एक लंबा सफर तय करना होगा, मगर यह भी बात सच है कि उनका संघर्ष इस सीमा तक चलेगा कि हजारो की संख्या में महिलाओं को अपनी जान की कुर्बानी देनी होगी, यह किसी ने नहीं सोचा होगा। महसा अमीन की पुलिस कस्टडी में केवल इस कारण से मौत कौन भूल सकता है कि उसने हिजाब सही से नहीं पहना था। महसा अमीन की मौत के बाद ईरान की जनता सड़कों पर उतर आई और लड़कियों के साथ लड़कों ने भी इस अमानवीय कानून के खिलाफ प्रदर्शन किया और हर संभव आवाज उठाई, मगर भारत में रह रही प्रगतिशील महिलाओं का मौन नहीं टूटा।

उन्होंने ईरान की महिलाओं की आवाज पर सोशल मीडिया तक पर अपना विरोध दर्ज नहीं कराया। ईरान में उन महिलाओं को कोई और नहीं बल्कि वही खामनेई मार रहा था, जिसकी अमेरिका के हमले में मौत पर पिछले कई दिनों से वे लोग शोक मना रही हैं।

कथित प्रगतिशील महिलाओं का सच

ये वही महिलाएं हैं, जो महिलाओं की आजादी की लगातार बातें करती रहती हैं और उनके अनुसार भारत और विशेषकर हिन्दू धर्म में महिलाओं को आजादी नहीं है, मगर उन्हें भारत में स्वतंत्र महिलाएं नहीं दिखती है और उन्हें ईरान में वे महिलाएं भी नहीं दिखीं जो धीरे-धीरे खेल के मैदानों और स्टेडियम से दर्शक के रूप में भी बाहर कर दी गईं और वह भी केवल इस कारण कि वे महिलाएं थीं और उनकी सरकार ने ऐसे कानून बना दिए थे कि वे न ही पुरुषों के खेलकूद की प्रतिस्पर्धा स्टेडियम में देख सकती हैं और न ही वे एकल गा सकती हैं।

भारत में महिलाओं का एक प्रगतिशील वर्ग है, वह सहज मौन ही रहता है, और जब महिलाओं पर मजहबी हिंसा की बात आती है या फिर मजहबी सत्ता द्वारा महिलाओं के शोषण की बात आती है तो वह और भी अधिक चुप्पी साध लेता है, उसे वे दर्द दिखते ही नहीं हैं, जो इन महिलाओं ने झेले होते हैं, मगर जब मजहबी सत्ता को कोई हटाता है, तो मजहबी सत्ता की स्वायत्ता के नाम पर छाती पीटने के लिए आ जाती हैं, वे रुदाली बन जाती हैं। प्रश्न यही है कि यह शोक का यह रिश्ता आखिर क्या कहलाता है?

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