UK Hindu Temple: भारत में जब मुस्लिम आक्रमणकारी आए तो उन्होंने मंदिर नष्ट किये और ऐसा करने में उन्होंने तनिक भी लाज का अनुभव नहीं किया, बल्कि अभी तक वे उस विध्वंस को सही ठहराते हैं। जब वे कुछ स्थानों पर किन्हीं कारणों वश सत्ता में आए तो भी उन्होंने शासन की संरचना के हर ढांचे में यह प्रयास किया कि वे हिन्दू पहचान को नष्ट कर दे। उन्होंने मस्जिदें भी बनाईं तो मंदिरों को तोड़कर या फिर उसे रिप्लेस करके। उन्होंने उस स्थान का जो उद्देश्य था, उसे बदल दिया। और यह सब सुनियोजित तरीके से किया, जैसे अभी पाकिस्तान में कई मामलों में देखा गया कि मंदिर की जमीन पर मॉल बन गया या फिर व्यावसायिक परिसर बन गए।
जो मंदिर पुराने हो गए थे, उन्हें भूमाफियाओं ने ढहाकर वहाँ पर दुकाने, घर या फिर मॉल बना दिए। कई बार यह सरकारी स्तर पर हुआ तो कई बार ऐसे ही हो गया। मगर उस स्थान के उद्देश्य को पूरी तरह से बदल दिया गया। यह तो पाकिस्तान की बात है या फिर हम यह भी कह सकते हैं कि मुस्लिम देशों में ऐसा होता है, जैसे कि हाल ही में बांग्लादेश में एक मंदिर को रेलवे की जमीन पर बनाया हुआ कहकर ढहा दिया गया था। या फिर मंदिरों की जमीन पर मस्जिद बना दी गई।
क्या है पूरा मामला ?
परंतु यदि हम यह कहें कि कथित रूप से धर्म निरपेक्ष और आधुनिक एवं प्रगतिशील यूके में एक मंदिर की जमीन को एक मस्जिद को बेचा जा रहा था और वह भी सरकारी स्तर पर तो क्या आप यह विश्वास कर पाएंगे? सहज रूप से यह विश्वास ही नहीं होगा कि एक कथित प्रगतिशील देश में किसी धार्मिक संरचना के साथ ऐसा हो सकता है? मगर यह सच है, यह सच है कि तेजी से यूके इस इस्लामीकरण में यह एक और उदाहरण जुड़ गया है। यह बात आज से नहीं, बल्कि न जाने कब से कही जा रही है कि यूके का तेजी से इस्लामीकरण हो रहा है और इस इस्लामीकरण का कई लोग विरोध कर रहे हैं। उनका यह कहना है कि वे किसी धर्म या धार्मिक पहचान के विरोधी नहीं हैं, बल्कि वे यूके की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को बदले जाने का विरोध कर रहे हैं। यह भी सच है कि यूके में काफी संख्या में भारतीय और हिन्दू भी बसे हुए हैं, जो वहाँ के कानून के दायरे में रहते हुए अपने धर्म का पालन कर रहे हैं।
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नियमों का पालन करने में विश्वास करते हैं हिन्दू
यह भी देखा गया है कि यूके में हिन्दू समुदाय एक शांत समुदाय है, जिसके लिए उस देश के कानून और नियम सर्वोपरि हैं, जहां पर वह वर्तमान में निवास कर रहा है, वह अपना पर्व, परम्पराएं भी उन्हीं दायरों में मनाता है। मगर पिछले कुछ समय से इसी शांतिपूर्ण हिन्दू समाज पर कई प्रकार से हमले होने लगे हैं। कभी मंदिरों को विकृत किया जाता है तो कभी हिंदुओं के बच्चों के साथ स्कूलों में भी भेदभाव किया जाता है। मगर अब जो मामला मीडिया में आया है, वह हिंदुओं के लिए काफी खतरनाक मामला है। वहाँ पर पीटरबरो सिटी काउंसिल, जिस पर लेबर पार्टी का कब्जा है और जिसकी काउन्सलर शबीना कय्यूम है, ने एक जमीन, जिस पर मंदिर बना हुआ है, उसे दोबारा नीलामी में एक मस्जिद बनाने के लिए बेच दिया।
जरा कल्पना करें कि एक मंदिर, जहां पर लगातार पूजा हो रही है, जहां पर हजारों लोगों की आस्थाएं आकार ले रही हैं, जहां पर एक विशेष धार्मिक परंपराओं का पालन किया जा रहा है, उस स्थान को संरचनागत ढांचे का सहारा लेकर नष्ट कर दिया जाएगा और फिर वहाँ पर एक नई पहचान उसी स्थान को दे दी जाएगी? यह कदम उस कदम से बिल्कुल भी अलग नहीं है, जो आक्रमणकारियों ने हिन्दू मंदिरों को लेकर मध्यकाल में उठाए थे। और ऐसा भी नहीं है कि भारत समाज मंदिर ने काउंसिल को मंदिर के लिए पैसे नहीं दिए? यह पूरा मामला आरंभ हुआ जब पर पीटरबरो सिटी काउंसिल ने न्यू इंग्लैंड कॉम्प्लेक्स को बेचने का निर्णय लिया। वर्ष 2025 के अक्टूबर माह में मंदिर ने 1.4 मिलियन पाउंड इस मंदिर की प्रॉपर्टी खरीदने के लिए काउंसिल को दिए थे और वह प्रथम दो बोली लगाने वालों में से थे। मगर दिसंबर में काउंसिल ने इस संपत्ति को दूसरे बोली लगाने वाले को बेचने का निर्णय कर लिया।
हालांकि इसे सार्वजनिक नहीं किया गया, मगर शीघ्र ही मंदिर प्रशासन को अपने वकीलों के माध्यम से यह पता चल गया कि काउंसिल ने जिसे यह संपत्ति बेचने का निर्णय लिया है, वह एक मस्जिद है और वह मस्जिद खदीजा के साथ संबंधित है।
हाई कोर्ट का फैसला
इसके बाद मंदिर ने इंग्लैंड एण्ड वेल्स के हाईकोर्ट में एक न्यायिक समीक्षा के लिए अपील की और उन्हें न्यायालय ने हाल फिलहाल निराश नहीं किया है। उनकी आशाओं को अभी जीवित रखा है। न्यायालय ने 27 फरवरी को जस्टिस डेविड फोर्डहम ने काउंसिल को एक अंतरिम आदेश जारी करते हुए कहा कि काउंसिल अभी कोई भी ऐसा कदम न उठाए, जिसे वापस न लिया जा सके। न्यू इंग्लैंड कॉम्प्लेक्स एक दो नहीं बल्कि चालीस वर्षों से भारत हिन्दू समाज मंदिर का स्थान है। यहाँ पर हजारों लोग आस्थाओं का सागर लेकर आते हैं। उनके लिए यह एक राहत का समाचार है। उन हजारों भक्तों की पीड़ा का अनुमान लगाना ही अत्यंत पीड़ादायक है, जिन्हें यह सूचना मिली होगी कि जहां पर कुछ समय पहले उनका मंदिर था, अब उस जमीन को मस्जिद के लिए बेच दिया गया है।
कोर्ट ने भी इस बात को माना कि काउंसिल के उठाए गए कदम में पारदर्शिता का अभाव है। उन्होनें अपने आदेश में कहा कि काउंसिल ने जो आचरण किया है, उसके कारण ही इतना कठोर निर्णय लेना पड़ा है। तो ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या लेबर के नेतृत्व वाली काउंसिल ने जानते बूझते मंदिर की जमीन को मस्जिद को बेचने का फैसला ले लिया था।
मंदिर ने दूसरी बार भी बोली लगाई थी
ऐसा नहीं है कि मंदिर ने एक ही बार बोली लगाई थी। मंदिर की वाइस प्रेसीडेंट एकता पटेल ने कहा था कि हिन्दू समुदाय ने अपने मंदिर को बचाने के लिए कोई भी कसर नहीं छोड़ी थी, मगर उनकी दूसरी भी बोली काउंसिल ने स्वीकार नहीं की थी।eastangliabylines.co.uk के अनुसार मंदिर में आने वाले भक्तों को यह पीड़ा थी कि एक स्थान की वह धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान नष्ट हो जाएगी जो एक समुदाय ने अपने अथक परिश्रम से बनाई है और जो बुजुर्ग हैं, उन्हें यह लग रहा है कि इस मंदिर के जाने से उनकी लाइफ लाइन ही खो जाएगी और हिन्दू समुदाय के पास आसपास में कोई भी धार्मिक स्थल नहीं होगा।
कोर्ट के इस निर्णय से पीटरबरो काउंसिल के हिन्दू समाज को कुछ राहत मिली है, परंतु यह उन्हें भी पता है कि यह एक बहुत लंबी लड़ाई है और कानूनी और प्रशासनिक दोनों ही स्तर पर उन्हें अपने धार्मिक अस्तित्व की लड़ाई लड़नी है।











