...तो क्या Trump Iran से उखाड़ देंगे इस्लामी सत्ता तंत्र? America-Israel हमले के पीछे एजेंडा 'आम ईरानियों की आजादी'!
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…तो क्या Trump Iran से उखाड़ देंगे इस्लामी सत्ता तंत्र? America-Israel हमले के पीछे एजेंडा ‘आम ईरानियों की आजादी’!

ईरान में अभी कोई ऐसी जमीनी ताकत नजर नहीं आ रही है जो इस्लामिक रिपब्लिक को चुनौती दे सके, भले ही ट्रंप और अमेरिकी अधिकारियों ने ईरान के लोगों से 'आगे बढ़ने' की अपील की है

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Mar 5, 2026, 07:32 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
Representational Image

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अमेरिका और इस्राएल द्वारा ईरान के खिलाफ आपरेशन एपिक फ्यूरी छठे दिन में प्रवेश कर रहा है। ईरान के विभिन्न शहरों पर बमबारी और मिसाइल हमले जारी हैं। लेकिन ध्यान दें, गत 28 फरवरी को इस आपरेशन के शुरू होने के कुछ ही घंटे बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि वे इस युद्ध से ईरानी लोगों के लिए सिर्फ ‘आजादी’ चाहते हैं। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप का असल इरादा तेहरान में इस्लामी सत्ता तंत्र को उखाड़ फेंकना है। स्टिमसन सेंटर के वरिष्ठ फेलो केली ग्रीको ने मध्य पूर्व के एक बड़े मीडिया समूह से बातचीत में बताया कि अमेरिकी सैनिकों को ईरान में मैदाने जंग में उतारे बिना इतना बड़ा राजनीतिक परिवर्तन लाना नामुमकिन नहीं, तो मुश्किल जरूर होगा।

ग्रीको ने कहा, ‘ट्रंप वहां सत्ता बदल करवाने के लिए जरूरी कीमत चुकाने को तैयार नहीं दिखते। इसलिए कुछ सैकेंडरी टार्गेट भी हैं, जो हवाई ताकत से हासिल न होने पर शायद पर्याप्त रहें।” शुरुआती हमलों के बाद ट्रंप ने ईरानी लोगों से अपील की थी कि उनकी ‘आजादी का पल’ आ गया है। उन्होंने कहा था, “जब हम अपना काम पूरा कर लें, तो आप अपनी सरकार को हटाने का प्रयास करें। यह काम आपको ही करना होगा।” ट्रंप का यह बयान साफ बताता है कि अमेरिका ईरान के वर्तमान इस्लामी शासन को हटाने की कोशिश में जुटा है।

Representational Image

सेंटर फॉर इंटरनेशनल पॉलिसी के कार्यकारी उपाध्यक्ष मैथ्यू डस ने जोर देकर कहा कि सिर्फ हवाई हमले वहां की शासन व्यवस्था को हटा नहीं सकते। वे कहते हैं, ‘कोई इमारतें नष्ट कर सकता है, शासन को नुकसान पहुंचा सकता है, लेकिन इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जहां केवल हवाई हमलों के बूते शासन बदला गया हो।’ 2011 में लीबिया में नाटो के हवाई आपरेशन ने गद्दाफी को सत्ता से हटाया जरूर था, लेकिन वहां विद्रोहियों ने जमीनी लड़ाई लड़ी थी। ईरान में अभी कोई ऐसी जमीनी ताकत नजर नहीं आ रही है जो इस्लामिक रिपब्लिक को चुनौती दे सके, भले ही ट्रंप और अमेरिकी अधिकारियों ने ईरान के लोगों से ‘आगे बढ़ने’ की अपील की है।

उधर अमेरिका ने जमीनी सैनिक भेजने का विकल्प खुला तो रखा है, लेकिन इससे सेना के लिए जोखिम ही बढ़ेगा और यह ट्रंप की तेज सैन्य अभियानों की नीति के खिलाफ भी होगा। मैक्यू डस ने कहा कि सैनिकों को जमीन पर उतारे बिना भी यह युद्ध अमेरिकी जनता को नापसंद दिखता है। उन्होंने इस युद्ध की 2003 के इराक युद्ध से तुलना की, जहां शुरू में जनता का 55 प्रतिशत से ज्यादा समर्थन मिला था। डस कहते हैं, “जैसे-जैसे युद्ध लंबा खिंचेगा, खासकर अगर सैनिक उतारे जाएंगे, तो उसको जनसमर्थन और कम होगा।”

मिसाइल हमले में ध्वस्त हुई तेहरान की इमारतें

3 मार्च को डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथाल ने एक बैठक के बाद चिंता जताई थी कि अमेरिका जमीनी कार्रवाई की ओर बढ़ रहा है। इस ब्रीफिंग के बाद उन्हें पहले से ज्यादा लग रहा है कि ट्रंप प्रशासन के इस एजेंडे को पूरा करने के लिए सैनिकों की जरूरत पड़ेगी।”

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और पेंटागन प्रमुख पीट हेगसेथ ने ईरान में सत्ता परिवर्तन के बजाय अन्य छोटे लक्ष्य बताए। जैसे, ईरान के न्यूक्लियर, ड्रोन और नौसेना कार्यक्रमों को नष्ट करना। रुबियो ने कहा कि ईरान मिसाइल-ड्रोन हथियारों से ‘इम्युनिटी’ हासिल कर परमाणु हथियार बना रहा था। उधर हेगसेथ ने भी भरोसा दिलाया है कि यह युद्ध सतत चलने वाली जंग नहीं बनेगा। उनका कहना है, ‘हम मिशन पूरा कर रहे हैं, लेकिन स्पष्ट सोच रखते हैं।’ डेमोक्रेट सीनेटर एलिजाबेथ वॉरेन का कहना है कि ट्रंप प्रशासन का कोई प्लान नहीं दिखता। यह गैर-कानूनी लड़ाई झूठ पर आधारित है, जो बिना किसी खतरे के शुरू की गई है।

1 मार्च को बमबारी में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई, कई बड़े अधिकारी और सैकड़ों नागरिक मारे गए थे। संघर्ष मध्य पूर्व तक फैल चुका है। ईरान ने खाड़ी देशों में यूएस अधिष्ठानों, ऊर्जा ठिकानों और नागरिक क्षेत्रों पर ड्रोन-मिसाइल हमले किए; तेहरान ने इस्राएल पर मिसाइलें दागीं। इराक में ईरान समर्थित समूहों ने यूएस ठिकानों पर ड्रोन हमले किए, जबकि लेबनान से आतंकी संगठन हिजबुल्लाह भी युद्ध में शामिल हो गया है। इस्राएल लेबनान के दक्षिण में हमला करने की योजना बना रहा है।

इस बीच, नाटो के मिसाइल इंटरसेप्शन का मलबा तुर्की की धरती पर गिरा है, जिससे तुर्की चाहे—अनचाहे संघर्ष में उलझ गया दिखता है। नाटो की मिसाइलें ईरानी हमलों को रोक रही थीं, लेकिन उनका मलबा तुर्की में गिरा। इसलिए अब तुर्की नाटो सदस्य के रूप में रक्षात्मक भूमिका निभा रहा है, हालांकि उसके ईरान से आर्थिक और क्षेत्रीय संबंध युद्ध को लेकर उसके लिए उलझनें पैदा कर सकते हैं। तुर्की ने अभी तक कोई स्पष्ट सैन्य कदम नहीं उठाया है, लेकिन उसका हवाई क्षेत्र जोखिम के केन्द्र में जो आ ही गया है।

पेंटागन प्रमुख पीट हेगसेथ

विशेषज्ञ हेगसेथ के खुली जंग न होने के दावे के बावजूद, ट्रंप ने कहा है कि मिशन समय से आगे चल रहा है, लेकिन युद्ध 4-5 हफ्ते या और भी ज्यादा लंबा चल सकता है। अमेरिका के सहयोगी देश इसे सफल बता रहे हैं। एक रिपब्लिकन सीनेटर का मानना है कि इससे इस्राएल-अरब संबंध मजबूत होंगे और क्षेत्र में खुशहाली व सुरक्षा का माहौल बनेगा। जो भी हो, इतना तो तय ​है कि यह युद्ध ट्रंप की विरासत के बारे में बहुत कुछ लिख जाएगा।

Topics: US Iran conflict 2026trumpIrantehranisraelturkeynetyanahuइस्लामइस्राएलgulf countriesट्रंपईरानMiddle East tensionअमेरिकाUS Iran warnato
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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