डॉल्फिन हंटर आईएनएस अंजदीप ने बढ़ाई भारत की समुद्री ताकत, तटीय सुरक्षा में नई छलांग
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डॉल्फिन हंटर आईएनएस अंजदीप ने बढ़ाई भारत की समुद्री ताकत, तटीय सुरक्षा में नई छलांग

चेन्नई बंदरगाह पर आयोजित भव्य समारोह में नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी की उपस्थिति में इस युद्धपोत को राष्ट्र को समर्पित किया गया।

Written byयोगेश कुमार गोयलयोगेश कुमार गोयल — edited by Mahak Singh
Feb 28, 2026, 05:21 pm IST
in भारत

भारतीय समुद्री शक्ति के इतिहास में 27 फरवरी को एक और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया, जब भारतीय नौसेना ने अपने नवीनतम पनडुब्बी रोधी युद्धपोत ‘आईएनएस अंजदीप’ को औपचारिक रूप से कमीशन किया। चेन्नई बंदरगाह पर आयोजित भव्य समारोह में नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी की उपस्थिति में इस युद्धपोत को राष्ट्र को समर्पित किया गया। यह केवल एक नए पोत का नौसेना में शामिल होना नहीं है बल्कि भारत की तटीय सुरक्षा, समुद्री निगरानी और पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता में गुणात्मक छलांग का प्रतीक है। आईएनएस अंजदीप ‘एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट’ परियोजना के अंतर्गत निर्मित आठ युद्धपोतों की श्रृंखला का तीसरा पोत है। इस परियोजना का उद्देश्य विशेष रूप से उथले जल क्षेत्रों में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाना, उनका पीछा करना और उन्हें निष्क्रिय करना है। आधुनिक समुद्री युद्ध की रणनीति में तटीय और उथले जल क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील माने जाते हैं क्योंकि इन्हीं क्षेत्रों के माध्यम से समुद्री व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और सामरिक गतिविधियां संचालित होती हैं। ऐसे में आईएनएस अंजदीप का शामिल होना भारतीय नौसेना के लिए एक महत्वपूर्ण सामरिक उपलब्धि है। यह युद्धपोत भारत की बढ़ती स्वदेशी रक्षा निर्माण क्षमता और आत्मनिर्भर भारत के संकल्प का एक जीवंत प्रतीक है। इसे ‘डॉल्फिन हंटर’ के नाम से भी जाना जा रहा है, जो इसकी अद्वितीय मारक क्षमता और सटीक खोज तकनीक को दर्शाता है।

नामकरण के पीछे की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि

किसी भी युद्धपोत का नाम केवल एक पहचान नहीं बल्कि एक विरासत होती है। ‘अंजदीप’ नाम उत्तरी कर्नाटक के कारवार तट के निकट स्थित अंजदीप द्वीप के नाम पर रखा गया है। यह द्वीप भारतीय नौसैनिक इतिहास में विशेष महत्व रखता है। दिसंबर 1961 में गोवा मुक्ति अभियान के दौरान यहां भारतीय नौसेना की निर्णायक कार्रवाई हुई थी, जिसने पुर्तगाली शासन के अंत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस ऐतिहासिक कार्रवाई की स्मृति और साहस की परंपरा को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से इस युद्धपोत का नाम ‘अंजदीप’ रखा गया है। एडमिरल त्रिपाठी ने इसे भारतीय नौसेना के गौरवशाली अतीत से जुड़ा बताते हुए कहा कि यह पोत पेट्या श्रेणी के अंतिम कोरवेट का उत्तराधिकारी है, जिसने 1972 से 2003 तक देश की सेवा की। पुराने अंजदीप के रिटायर होने के दो दशक बाद यह नया और आधुनिक अवतार नौसेना की ताकत को फिर से परिभाषित कर रहा है। आईएनएस अंजदीप केवल एक तकनीकी संरचना नहीं बल्कि समुद्री विरासत और साहसिक परंपरा का प्रतीक भी है।

स्वदेशी निर्माण: आत्मनिर्भर भारत की मिसाल

आईएनएस अंजदीप का निर्माण कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) द्वारा किया गया है। 29 अप्रैल 2019 को रक्षा मंत्रालय और जीआरएसई के बीच इस परियोजना के लिए अनुबंध पर हस्ताक्षर हुए थे। 17 जून 2022 को कट्टुपल्ली शिपयार्ड में इसकी कील रखी गई और 13 जून 2023 को इसे जलावतरण किया गया। लगभग चार वर्ष और दो महीने की अवधि में तैयार हुआ यह युद्धपोत भारत की उन्नत जहाज निर्माण क्षमता का प्रमाण है। इस पोत में 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है। यह न केवल आयात पर निर्भरता कम करता है बल्कि देश के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को भी प्रोत्साहन देता है। वर्तमान में भारतीय नौसेना के लिए 54 से अधिक जहाजों का निर्माण विभिन्न भारतीय शिपयार्डों में चल रहा है, जो ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ की अवधारणा को साकार कर रहा है।

एएसडब्ल्यू-एसडब्ल्यूसी परियोजना

आईएनएस अंजदीप भारतीय नौसेना की पनडुब्बी रोधी उथले जल नौका परियोजना ‘एएसडब्ल्यू-एसडब्ल्यूसी’ (एंटी सबमरीन वारफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट) के तहत निर्मित होने वाले आठ जहाजों की श्रृंखला का तीसरा पोत है। तटीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से यह परियोजना अत्यंत महत्वपूर्ण है। अक्सर बड़ी पनडुब्बियां और विध्वंसक जहाज गहरे समुद्र में प्रभावी होते हैं लेकिन उथले पानी (तटीय क्षेत्रों) में उनकी गतिशीलता सीमित हो जाती है। दुश्मन की छोटी और शांत डीजल-इलैक्ट्रिक पनडुब्बियां अक्सर तटीय इलाकों में छिपकर खतरा पैदा करती हैं। आईएनएस अंजदीप को विशेष रूप से इन्हीं खतरों को बेअसर करने के लिए डिजाइन किया गया है।

आधुनिक युद्ध का महारथी

आईएनएस अंजदीप की तकनीकी बनावट और इसकी क्षमताएं इसे दुनिया के बेहतरीन तटीय युद्धपोतों की श्रेणी में खड़ा करती हैं। लगभग 77 मीटर लंबा यह युद्धपोत उच्च गति वाले वाटर-जेट प्रणोदन प्रणाली से सुसज्जित है। यह प्रणाली इसे न केवल 25 समुद्री मील की अधिकतम गति प्रदान करती है बल्कि संकरे तटीय रास्तों में तीव्र मोड़ लेने की क्षमता भी देती है। वाटर-जेट प्रणाली पारंपरिक प्रोपेलर की तुलना में अधिक फुर्ती और कम ध्वनि उत्पन्न करती है, जिससे पोत की स्टील्थ क्षमता बढ़ जाती है। इस युद्धपोत में स्वदेशी ‘हल माउंटेड सोनार अभय’ प्रणाली लगी है। स्वदेशी रूप से विकसित यह सोनार प्रणाली पानी के भीतर की आवाजों और हलचल को पकड़ने में माहिर है। यह शोरगुल वाले तटीय वातावरण में भी दुश्मन की शांत पनडुब्बियों के ‘सिग्नेचर’ को पहचानने की क्षमता रखता है। सोनार प्रणाली ध्वनि तरंगों के माध्यम से समुद्र के भीतर छिपे खतरों की पहचान करती है। विशेष रूप से उथले समुद्र में, जहां पृष्ठभूमि शोर अधिक होता है, वहां यह प्रणाली पनडुब्बियों की गतिविधियों को अलग कर पहचानने में सक्षम है। इसके अतिरिक्त, पोत हल्के टॉरपीडो और पनडुब्बी रोधी रॉकेटों से लैस है। यह हथियार प्रणाली दुश्मन की डीजल-इलैक्ट्रिक या छोटी पनडुब्बियों को निष्क्रिय करने में सक्षम है। आधुनिक समुद्री युद्ध में ऐसी ‘शांत’ पनडुब्बियां गंभीर खतरा बन सकती हैं, जिन्हें खोज पाना कठिन होता है। आईएनएस अंजदीप विशेष रूप से ऐसे खतरों से निपटने के लिए डिजाइन किया गया है।

आईएनएस अंजदीप को क्यों कहा जाता है ‘डॉल्फिन हंटर’?

आईएनएस अंजदीप को ‘डॉल्फिन हंटर’ उपनाम दिया गया है। इसका कारण इसकी सोनार प्रणाली और संचालन क्षमता है, जो डॉल्फिन द्वारा ध्वनि तरंगों के माध्यम से शिकार खोजने की प्राकृतिक प्रक्रिया से प्रेरित है। डॉल्फिन जिस प्रकार समुद्र के भीतर ‘इकोलोकेशन’ (ध्वनि तरंगों) का उपयोग कर दिशा और लक्ष्य निर्धारित करती है, उसी प्रकार यह पोत भी उन्नत सोनार तकनीक के माध्यम से पनडुब्बियों की पहचान करता है। तटीय और उथले जल क्षेत्रों में बड़े विध्वंसक पोत अक्सर शोर और सीमित गतिशीलता के कारण प्रभावी ढ़ंग से काम नहीं कर पाते। इसके विपरीत, आईएनएस अंजदीप को संकरे तटीय गलियारों में तेज और चुपचाप संचालन के लिए डिजाइन किया गया है। इसकी उच्च गतिशीलता ही इसे डॉल्फिन की तरह ही ‘शिकार’ करने में सक्षम बनाती है।

बहुआयामी भूमिका

यद्यपि इसका मुख्य कार्य पनडुब्बी रोधी युद्ध है परंतु आईएनएस अंजदीप की भूमिका केवल इसी तक सीमित नहीं है। यह तटीय निगरानी, कम तीव्रता वाले समुद्री अभियानों, खोज एवं बचाव कार्यों तथा समुद्री सुरक्षा अभियानों में भी सक्रिय भूमिका निभा सकता है। भारत का विशाल समुद्री तट लगभग 7,500 किलोमीटर लंबा है। इसके अतिरिक्त, अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप जैसे द्वीपीय क्षेत्र सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन क्षेत्रों में निरंतर निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया की आवश्यकता होती है। आईएनएस अंजदीप जैसे पोत इन आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शिकार का पता लगाने के बाद उसे नष्ट करने के लिए आईएनएस अंजदीप कई महत्वपूर्ण हथियारों से लैस है। हल्के वजन वाले टॉरपीडो पानी के भीतर पनडुब्बी पर सटीक निशाना साधते हैं। पनडुब्बी रोधी रॉकेट उथले पानी में दुश्मन के ठिकानों को ध्वस्त करने के लिए प्रभावी हैं। आईएनएस अंजदीप ‘माइन लेयिंग’ (बारूदी सुरंग) बिछाने में भी सक्षम है, जिससे दुश्मन के जहाजों का रास्ता रोका जा सकता है।

सामरिक महत्व और क्षेत्रीय संतुलन

हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती समुद्री सक्रियता और पनडुब्बी तैनाती को देखते हुए भारत के लिए अपनी पनडुब्बी रोधी क्षमता को सुदृढ़ करना आवश्यक हो गया है। हाल के वर्षों में चीनी पनडुब्बियों की हिंद महासागर में उपस्थिति ने भारत की समुद्री सुरक्षा को नई चुनौतियां दी हैं। ऐसे परिदृश्य में आईएनएस अंजदीप जैसे विशेषीकृत पोत भारत को उथले जल क्षेत्रों में सामरिक बढ़त प्रदान करते हैं। ये पोत संभावित खतरों की अग्रिम पहचान कर उन्हें निष्क्रिय करने में सक्षम हैं। इसके अतिरिक्त, तटीय राज्यों (विशेषकर तमिलनाडु, कर्नाटक और पुडुचेरी) के समुद्री हितों की सुरक्षा में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

भारत की समुद्री शक्ति का विस्तार

वर्तमान में भारतीय नौसेना के पास लगभग 145-150 परिचालन युद्धपोत और पनडुब्बियां हैं। इस वर्ष 19 नए युद्धपोतों के शामिल होने की योजना है, जो इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी संख्या है। यह दर्शाता है कि भारत अपनी समुद्री शक्ति को नए स्तर पर ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है। आईएनएस अंजदीप का कमीशन होना भारतीय नौसेना के इस व्यापक आधुनिकीकरण कार्यक्रम का हिस्सा है। यह न केवल समुद्री रक्षा को सुदृढ़ करता है बल्कि भारत की वैश्विक समुद्री भूमिका को भी मजबूत बनाता है। वर्तमान में लगभग 54 जहाजों का निर्माण कार्य विभिन्न भारतीय शिपयार्डों में चल रहा है, जो मेक इन इंडिया की सफलता का प्रमाण है।

बहरहाल, आईएनएस अंजदीप केवल एक युद्धपोत नहीं बल्कि भारत की तकनीकी प्रगति, आत्मनिर्भरता और सामरिक दूरदर्शिता का प्रतीक है। ‘डॉल्फिन हंटर’ के रूप में इसकी पहचान इसे विशिष्ट बनाती है। उन्नत सोनार प्रणाली, आधुनिक हथियारों, उच्च गति और बहुआयामी भूमिका के कारण यह पोत भारतीय नौसेना की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि करता है। बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा परिदृश्य में आईएनएस अंजदीप भारत की उस संकल्पशक्ति का प्रतीक है, जो हर चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है। अब हिंद महासागर की गहराइयों में छिपे खतरों के लिए स्पष्ट संदेश है कि भारत की समुद्री निगाहें और अधिक सजग, सक्षम और शक्तिशाली हो चुकी हैं। आईएनएस अंजदीप न केवल कारवार के ऐतिहासिक अंजदीप द्वीप की विरासत को आगे बढ़ाएगा बल्कि अपनी ‘डॉल्फिन’ जैसी चपलता और ‘हंटर’ जैसी सटीकता से भारतीय समुद्री सीमाओं की रक्षा करेगा।

Topics: सबमरीनभारतीय सेनाIndian Armyभारतीय नौसेनाIndian NavysubmarineINS Ins Anjdipआईएनएस अंजदीप
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