वरदान अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल : अंगदान और देहदान को सिनेमा की भाषा में जन-आंदोलन बनाया
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वरदान अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल : अंगदान और देहदान को सिनेमा की भाषा में जन-आंदोलन बनाया

गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय में आयोजित वरदान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ने अंगदान, देहदान और नेत्रदान पर जागरूकता बढ़ाने का अनूठा प्रयास किया। 70 से अधिक फिल्मों के जरिए समाज को जीवनदान का संदेश दिया गया।

Written byआशीष कुमार 'अंशु'आशीष कुमार 'अंशु' — edited by Shivam Dixit
Feb 28, 2026, 05:03 pm IST
in भारत, दिल्ली

दिल्ली के जीवन में बड़े-बड़े आयोजन अक्सर लुटियंस दिल्ली या उसके आसपास के क्षेत्रों में ही होते हैं, जहां संसाधन और पहुंच आसानी से उपलब्ध होती है। ऐसे में पूर्वी दिल्ली के गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय (जीजीएसआईपीयू) में 26 और 27 फरवरी 2026 को आयोजित वरदान अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल एक सराहनीय और दूरदर्शी कदम साबित हुआ। यह दुनिया का पहला ऐसा फिल्म महोत्सव था, जो विशेष रूप से अंगदान, देहदान और नेत्रदान जैसे संवेदनशील, मानवीय और जीवनदायी विषयों पर केंद्रित था।

दधीचि देहदान समिति और संप्रेषण मल्टीमीडिया के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस दो दिवसीय फेस्टिवल ने सिनेमा की शक्ति का उपयोग करके समाज में जागरूकता फैलाने का अभिनव प्रयास किया। जहां एक ओर दिल्ली के पूर्वी हिस्से को इस तरह के महत्वपूर्ण राष्ट्रीय-स्तरीय आयोजन का मंच मिला, वहीं दूसरी ओर अंगदान जैसी महान परंपरा को जन-आंदोलन का रूप देने की दिशा में एक ऐतिहासिक शुरुआत हुई।

उद्देश्य और महत्व : सिनेमा से सामाजिक परिवर्तन

अंगदान और देहदान भारत में अभी भी अपेक्षाकृत कम प्रचलित हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत में मृत्यु के बाद अंगदान करने वाले लोगों का प्रतिशत बेहद कम है-लगभग 0.01 प्रतिशत। इसके पीछे जागरूकता की कमी, धार्मिक मान्यताएं, अंधविश्वास और कानूनी जटिलताएं प्रमुख कारण हैं। वरदान फिल्म फेस्टिवल ने ठीक इन्हीं मुद्दों को संबोधित किया।

फेस्टिवल का मूल उद्देश्य था-फिल्मों के माध्यम से लोगों के मन में संवेदना जगाना, मिथकों को तोड़ना और अंगदान को ‘महादान’ के रूप में स्थापित करना। 70 से अधिक फिल्में-शॉर्ट फिल्म्स, डॉक्यूमेंट्री, म्यूजिक वीडियो और रील्स-देश-विदेश से चयनित की गईं। इन फिल्मों ने न केवल अंगदान के वैज्ञानिक और भावनात्मक पक्ष को उजागर किया, बल्कि दर्शकों को यह समझाया कि मृत्यु के बाद भी एक व्यक्ति कई जिंदगियां बचा सकता है।

यह आयोजन पूर्वी दिल्ली में होने से और भी खास हो गया। आमतौर पर ऐसे विषयों पर चर्चा और आयोजन पश्चिमी या केंद्रीय दिल्ली तक सीमित रहते हैं, लेकिन वरदान ने आम जनता—विशेषकर युवाओं और छात्रों—को सीधे जोड़ा। विश्वविद्यालय का ऑडिटोरियम खचाखच भरा रहा, जो इसकी लोकप्रियता और आवश्यकता का प्रमाण है।

फेस्टिवल की झलकियां : प्रतियोगिता और पुरस्कार

फेस्टिवल में विभिन्न श्रेणियों में उत्कृष्ट फिल्मों को सम्मानित किया गया। शॉर्ट फिल्म कैटेगरी में निलेश मांडलेवाला की ‘काया – द मिशन ऑफ लाइफ’ को बेस्ट फिल्म अवॉर्ड मिला। ‘थैंक्यू ज़िंदगी’ ने द्वितीय और ‘उमंग’ ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। डॉक्यूमेंट्री श्रेणी में ‘मिथ सराउंडिंग किडनी’ ने बेस्ट डॉक्यूमेंट्री का पुरस्कार जीता।

म्यूजिक वीडियो कैटेगरी में रश्मि जैन का ‘एक धड़कन’ बेस्ट म्यूजिक वीडियो रहा, जबकि निलेश मांडलेवाला का “अंगदान करवे रे मानव तू” रनर्स-अप। ये पुरस्कार न केवल फिल्मकारों की प्रतिभा को सम्मान देते हैं, बल्कि संदेश को और मजबूत बनाते हैं कि सृजनशीलता से समाज को प्रेरित किया जा सकता है।

प्रेरणा और संकल्प का क्षण

समापन समारोह फेस्टिवल का सबसे भावपूर्ण हिस्सा था। सांसद, अभिनेता और गायक मनोज तिवारी ने “चुनरिया झीनी रे झीनी” की मधुर प्रस्तुति दी, जिसमें शरीर की नश्वरता और अंगदान की महत्ता को छुआ गया। उन्होंने इसे ‘महादान’ की संज्ञा दी, जो दर्शकों के दिल को छू गया।

दधीचि देहदान समिति के संरक्षक आलोक कुमार ने मार्मिक प्रसंगों का जिक्र करते हुए फिल्मों को सामाजिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम बताया। उन्होंने फेस्टिवल को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार देने का संकल्प लिया। केंद्रीय राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा ने उनके साथ मिलकर विजेताओं को सम्मानित किया।

वरिष्ठ पत्रकार और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता समीक्षक अनंत विजय की मास्टर क्लास ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने पहले ही संस्करण में मिले उत्साह को ऐतिहासिक बताते हुए भविष्यवाणी की कि अगले संस्करण में 200 से अधिक फिल्में प्राप्त होंगी।

सांस्कृतिक रंग और अतिथि गण

फेस्टिवल में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने गरिमा बढ़ाई। पद्मश्री सम्मानित नृत्य गुरु नलिनी-कमलिनी की शिष्याओं ने तिरंगा और तराना से देशभक्ति और सौंदर्य का संगम किया। ग़ज़ल गायक जाज़म शर्मा की सुमधुर आवाज ने सबको भावविभोर कर दिया।

वरदान अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल ने सिनेमा को ‘मनोरंजन मात्र’  से आगे बढ़ाकर सामाजिक जिम्मेदारी का माध्यम बनाया। यह आयोजन संदेश देता है कि संवेदना, संस्कृति और सृजनशीलता जब एक साथ आते हैं, तो समाज में सकारात्मक बदलाव की धारा बह सकती है। पूर्वी दिल्ली में इसका होना एक संकेत है कि जागरूकता का प्रकाश अब हर कोने तक पहुंचेगा।

दधीचि देहदान समिति के 27 वर्षों के प्रयास और पिछले 13 वर्षों में 1250+ अंगदान तथा 500+ देहदान के आंकड़े इसकी विश्वसनीयता दर्शाते हैं। वरदान न केवल एक फेस्टिवल था, बल्कि जीवनदान की दिशा में एक जन-आंदोलन की शुरुआत। आइए, हम सब इस संदेश को आगे बढ़ाएं-अंगदान करें, देहदान करें और दूसरों को प्रेरित करें। क्योंकि एक निर्णय से कई जिंदगियां संवार सकती हैं।

Topics: गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालयसामाजिक फिल्म महोत्सवअंगदान भारतVardaan International Film Festival Delhiorgan donation awareness Indiabody donation campaign India‘दधीचि देहदान समिति’eye donation awareness film festivalनेत्रदानIP University Delhi film festivalवरदान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवलDadhichi Dehdaan Samiti organ donationअंगदान जागरूकताorgan donation awareness India cinemaदेहदान अभियान
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार अंशु पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों तक मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान STEP से जुड़े रहे हैं। [Read more]
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