यह मान लेना कि विपक्षी पार्टी के नेता (जैसे अरविंद केजरीवाल) को मिली न्यायिक राहत से भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक स्थिति पर गहरा प्रभाव पड़ेगा, भारतीय राजनीति की वास्तविक संरचना को समझे बिना की गई जल्दबाजी है। भारत में चुनाव अदालतों के फैसलों से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक वैचारिक स्थिरता, संगठनात्मक विस्तार और मतदाताओं की मनोवैज्ञानिक दिशा से तय होते हैं।
पिछले एक दशक में भाजपा का उभार किसी तात्कालिक घटना का परिणाम नहीं रहा। यह एक सुनियोजित सामाजिक-राजनीतिक विस्तार का परिणाम है। पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, असम और उत्तर प्रदेश इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
बंगाल मॉडल : रिक्त स्थान कौन भरता है.?
पश्चिम बंगाल में दशकों तक वाम दलों का प्रभुत्व रहा, विशेषकर ज्योति बसु के दौर में। कांग्रेस धीरे-धीरे अपनी जमीन खोती गई। जब वाम दल कमजोर हुए, तो वह राजनीतिक रिक्त स्थान कांग्रेस को नहीं मिला। पहले तृणमूल कांग्रेस उभरी और बाद में भाजपा मुख्य चुनौतीकर्ता के रूप में सामने आई।
यह परिवर्तन केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था; यह मतदाताओं की पहचान आधारित राजनीति की ओर झुकाव का संकेत था। तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीति से असंतुष्ट एक वर्ग सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ओर गया। परिणामस्वरूप वाम और कांग्रेस दोनों हाशिए पर चले गए।
बिहार, महाराष्ट्र और ओडिशा : कांग्रेस का क्षरण
बिहार में कांग्रेस लगभग अप्रासंगिक हो चुकी है। मुख्य मुकाबला क्षेत्रीय दलों और भाजपा के बीच केंद्रित है। भाजपा का कोर वोट बैंक स्थिर और प्रतिबद्ध बना हुआ है, चाहे गठबंधन समीकरण बदलते रहें।
महाराष्ट्र में भी कांग्रेस की भूमिका घटती गई है। वहां क्षेत्रीय दलों और भाजपा के बीच राजनीतिक ध्रुवीकरण स्पष्ट है। कांग्रेस कई क्षेत्रों में निर्णायक शक्ति से अधिक सहायक भूमिका में सिमटती दिखी।
ओडिशा में लंबे समय तक क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व रहा, लेकिन भाजपा ने वहां भी अपना आधार मजबूत किया। कांग्रेस वहां मुख्य प्रतिद्वंद्वी की भूमिका से बाहर होती गई। भाजपा का वोट प्रतिशत लगातार बढ़ता गया, जिससे वह प्रमुख विकल्प के रूप में उभरी।
इन राज्यों का विश्लेषण यह संकेत देता है कि कांग्रेस का क्षरण न्यायिक घटनाओं का परिणाम नहीं बल्कि दीर्घकालिक संगठनात्मक और वैचारिक शिथिलता का परिणाम है।
वैश्विक संदर्भ और उसका प्रभाव
पश्चिमी लोकतंत्रों में भी राष्ट्रवादी दलों का उभार देखा गया है। यूरोप और उत्तरी अमेरिका में आव्रजन, सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय संप्रभुता जैसे मुद्दों ने राजनीतिक विमर्श को बदल दिया है। बहुसंख्यक समुदाय के एक हिस्से में यह भावना बनी कि उनकी सांस्कृतिक पहचान हाशिए पर जा रही है।
इंटरनेट युग में वैश्विक घटनाएं सीमाओं में सीमित नहीं रहतीं। विश्व के किसी भी हिस्से की राजनीतिक हलचल भारत के मतदाताओं की सोच को प्रभावित करती है। इससे सांस्कृतिक संरक्षण और राष्ट्रीय स्वाभिमान का विमर्श और मजबूत हुआ है।
वोट बैंक की वास्तविकता
भाजपा का मूल समर्थन आधार वैचारिक प्रतिबद्धता पर आधारित है। एक-दो न्यायिक फैसले उस मनोवृत्ति को नहीं बदल सकते। कई राष्ट्रवादी मतदाताओं के बीच यह धारणा गहरी है कि वे सांस्कृतिक और सामाजिक संतुलन की रक्षा कर रहे हैं।
कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बहुकोणीय मुकाबलों में विपक्षी वोटों का विभाजन भाजपा को लाभ पहुंचाता है। जहां कांग्रेस क्षेत्रीय दलों से गठबंधन करती है, वहां उसका स्वतंत्र आधार कमजोर होता है; और जहां अकेले लड़ती है, वहां उसे कठिनाई होती है।
पिछले दशक का राजनीतिक परिदृश्य यह स्पष्ट करता है कि अदालतों के फैसले सुर्खियां बदल सकते हैं, लेकिन मतदाताओं की दीर्घकालिक वैचारिक दिशा को नहीं। राजनीति में स्थायी प्रभाव जमीनी संगठन, स्पष्ट विचारधारा और मतदाता मनोविज्ञान से आता है, और वर्तमान परिदृश्य में यही तत्व भाजपा के पक्ष में दिखाई देते हैं।











