धर्म-संस्कृति

रंगभरी एकादशी : जब काशी में बाबा विश्वनाथ खेलते हैं होली और खाटू में सजता है श्याम का दरबार

रंगभरी एकादशी के दिन ही भगवान शिव माता पार्वती से विवाह के बाद पहली बार उन्हें काशी नगरी लाए थे और शिवगणों ने अबीर गुलाल उड़ाकर नाच-गाकर उनका स्वागत किया था।

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पूनम नेगी

सनातन हिन्दू धर्म में एकादशी पर्वों को ‘व्रतराज’ की संज्ञा यूं ही नहीं दी गयी है। वैदिक ऋषियों ने गहन चिंतन-मनन के उपरांत प्रत्येक माह के शुक्ल व कृष्ण पक्ष की 11वीं तिथि जगत पालक श्रीहरि विष्णु के अर्चन-वंदन का विधान बनाया था। सामान्य रूप से सालभर में 24 एकादशी पड़ती हैं जबकि अधिक मास होने पर 26 एकादशी पर्व पड़ते हैं। इन व्रत पर्वों का मूल उद्देश्य भगवान विष्णु की आराधना से शारीरिक शुद्धि व इंद्रिय संयम द्वारा आध्यात्मिक उन्नति, पापों से मुक्ति और मोक्ष प्राप्त करना है। इन पर्वों में फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली रंगभरी एकादशी (आमलकी एकादशी ) की अलग ही महत्ता है।

भगवान विष्णु के साथ महादेव और माता पार्वती की पूजा

रंगभरी एकादशी एकमात्र ऐसी दुर्लभ तिथि है जब भगवान विष्णु के साथ देवाधिदेव महादेव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। यह एकादशी पर्व श्री विश्वेश्वर भगवान विश्वनाथ का क्रीड़ा पर्व है। रंगभरी एकादशी के दिन ही भगवान शिव माता पार्वती से विवाह के बाद पहली बार उन्हें काशी नगरी लाए थे और शिवगणों ने अबीर गुलाल उड़ाकर नाच-गाकर उनका स्वागत किया था। विश्व की इस प्राचीनतम नगरी में वही परंपरा सदियों से आज तक कायम है। विभिन्न पौराणिक प्रसंग इस एकादशी पर्व का महत्ता को उजागर करते हैं। हिन्दू तिथि पंचांग के अनुसार इस वर्ष यह पर्व 27 फरवरी को मनाया जाएगा।

काशी में ‘होली’ के पर्वकाल का शुभारम्भ

काशी विद्वत परिषद् के महामंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी के अनुसार इसी दिन से काशी में ‘होली’ के पर्वकाल का शुभारम्भ होता है। इस दिन बाबा विश्वनाथ का विशेष शृंगार होता है। रंगभरी एकादशी के अवसर पर बाबा विश्वनाथ को दूल्हे के रूप में सजाया जाता है और मां गौरा का गौना करवाया जाता है। यह पर्व काशी में मां पार्वती के प्रथम स्वागत का प्रतीक है। वर्ष भर में केवल चार बार- दीपावली, अन्नकूट, महाशिवरात्रि तथा रंगभरी एकादशी पर ही बाबा विश्वनाथ का विशेष शृंगार होता है। इस दिन बाबा विश्वनाथ और पूरे शिव परिवार यानि माता पार्वती, श्री गणपति भगवान और कार्तिकेय जी का विशेष रूप से साज-श्रृंगार किया जाता है। इसके अलावा भगवान को हल्दी, तेल चढ़ाने की रस्म निभाई जाती है और भगवान के चरणों में अबीर-गुलाल चढ़ाया जाता है। साथ ही शाम के समय भगवान की रजत मूर्ति, यानि चांदी की मूर्ति को पालकी में बिठाकर बड़े ही भव्य तरीके से रथयात्रा निकाली जाती है। इस शुभ अवसर पर शिव परिवार की चल प्रतिमायें काशी विश्वनाथ मंदिर में लाई जाती हैं। फिर बाबा श्री काशी विश्वनाथ मंगल वाद्ययत्रों की ध्वनि के साथ अपने काशी क्षेत्र के भ्रमण पर अपनी जनता, भक्त, श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देने सपरिवार निकलते हैं।

शिवगण उनकी प्रतिमाओं पर व समस्त जनता पर रंग व गुलाल उड़ाते, खुशियां मनाते चलते हैं। इस प्रकार काशी की सभी गलियां रंग अबीर से सराबोर हो जाती हैं और हर हर महादेव का उद्गोष सभी दिशाओं में गुंजायमान हो उठता है। इसके बाद श्री विश्वनाथ को सपरिवार मंदिर गर्भ स्थान में ले जाकर श्रृंगार कर अबीर, रंग, गुलाल आदि चढ़ाया जाता है। इस दिन से वाराणसी में रंग खेलने का सिलसिला प्रारंभ होता है। यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सौहार्द का भी संदेश देता है। सभी वर्ग, जाति और आयु के लोग एक साथ मिलकर इस उत्सव में भाग लेते हैं, जिससे समाज में समरसता और भाईचारे की भावना सुदृढ़ होती है। आध्यात्मिक दृष्टि से रंगभरी एकादशी आत्मिक आनंद और ईश्वर से जुड़ने का विशेष अवसर प्रदान करती है। भक्तजन इस दिन भगवान शिव की आराधना कर अपने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। रंगों का यह उत्सव जीवन में सकारात्मकता, प्रेम और नई ऊर्जा का संचार करता है। यह संदेश देता है कि जैसे रंग जीवन को सुंदर बनाते हैं, वैसे ही प्रेम और सद्भावना समाज को सशक्त बनाते हैं। इस अवसर पर काशी नगरी में अद्भुत उल्लास और भक्ति का संगम देखने को मिलता है।

आंवला वृक्ष के पूजन का विधान

रंगभरी एकादशी के दिन आंवला वृक्ष के पूजन का भी विधान है। इसी वजह से इसे ‘आमलकी एकादशी’ के नाम से भी जाना जाता है। शास्त्रीय मान्यता है कि जब भगवान विष्णु ने सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा जी को उत्पन्न किया, उसी समय उन्होंने आंवले के वृक्ष को भी प्रकट किया। इसीलिए आंवले के वृक्ष को ‘आदि वृक्ष’ कहा जाता है। पौराणिक मान्यता है कि आंवले के वृक्ष की जड़ में विष्णु, तने में ब्रह्मा और शाखाओं में रुद्र का निवास होता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी आंवला ‘अमृतफल’ है। यह विटामिन-C का सबसे समृद्ध स्रोत है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में सर्वाधिक उपयोगी है। शास्त्रों के अनुसार आंवले का पूजन और दान करने से जातक को आरोग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। जो व्यक्ति इस दिन विधि-विधान से आंवले के वृक्ष की पूजा करता है, उसे समस्त पापों से मुक्ति मिलती है और शरीर की नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है। आमलकी एकादशी हमें आध्यात्मिकता, प्रकृति के प्रति सम्मान और उत्सव की भावना से जोड़ती है। यह हमें यह स्मरण कराती है कि धार्मिक पर्व केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि समाज और प्रकृति के साथ हमारे गहरे संबंध का भी प्रतीक हैं, जो जीवन में आनंद और सकारात्मकता भरते हैं।

श्याम कुंड में प्रकट हुआ था खाटू श्याम का मस्तक

एक अन्य मान्यतानुसार इसी दिन श्याम बाबा का मस्तक पहली बार श्याम कुंड में प्रकट हुआ था। इसलिए इस दिन लाखों श्याम भक्त श्याम दर्शन हेतु खाटू जाते हैं। फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही राजस्थान के सीकर में खाटूश्‍याम जी का फाल्गुन मेला लगता है। यह मेला अपने अद्भुत भक्तिमय स्वरूप और विराट जनभागीदारी के कारण राजस्थान में ही नहीं, परन्तु पूरे विश्व में विख्यात है। सीकर के खाटू मंदिर में पाण्डव महाबली भीम के पौत्र एवं घटोत्कच के पुत्र वीर बर्बरीक का शीश विग्रह रूप में विराजमान है।

बर्बरीक को उनकी अतुलनीय वीरता व त्याग के कारण भगवान कृष्ण से यह वरदान मिला था कि कलियुग में वह स्वयं कृष्ण के नाम एवं स्वरूप में पूजे जाएंगे। बर्बरीक श्री श्याम बाबा के रूप में खाटू धाम में पूजे जाते हैं। बर्बरीक का शीश फाल्गुन शुक्ल एकादशी को प्रकट हुआ था। इसलिए इस उपलक्ष्य में फाल्गुन मास में शुक्ल पक्ष की दशमी से द्वादशी तक विशाल मेला लगता है, जिसमें विश्व भर से लाखों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिये आते हैं।

 

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