'भारंगम' संग सजा सांस्कृतिक महाकुंभ
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‘भारंगम’ संग सजा सांस्कृतिक महाकुंभ

कला जब लोक से जुड़ती है, तो वह उत्सव बन जाती है। डीएलसी सुपवा का परिसर चार दिनों तक सृजन, संवाद और संवेदना का जीवंत केंद्र बना रहा। यह केवल एक महोत्सव नहीं था, बल्कि परंपरा और आधुनिकता के समागम का सांस्कृतिक घोष था

Written byPanchjanyaPanchjanya
Feb 27, 2026, 08:01 am IST
inभारत, विश्लेषण, धर्म-संस्कृति
महोत्सव में प्रस्तुति देता सुपवा के छात्रों का बैंड

महोत्सव में प्रस्तुति देता सुपवा के छात्रों का बैंड

जब मंच पर रोशनी पड़ती है, तब सिर्फ कलाकार ही नहीं चमकते, उसके साथ चमकती है संस्कृति, परंपरा, स्मृतियां व सामूहिक संवेदनाएं। दादा लख्मी चंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ परफॉर्मिंग एंड विजुअल आर्ट्स (डीएलसी सुपवा) रोहतक में गत 9 से 12 जनवरी तक तक ऐसा ही दृश्य देखने को मिला, जब नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) की ओर से आयोजित ‘भारंगम’ और यूनिवर्सिटी के अपने ‘सारंग’ महोत्सव ने कला के असंख्य रंग बिखेर दिए। यह सिर्फ एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं था, बल्कि भारतीय व वैश्विक रंग-संस्कृति के संवाद का जीवंत मंच था, जहां लोक व शास्त्र, परंपरा के साथ आधुनिकता, संगीत, थिएटर एक साथ उपस्थित थे। हरियाणा के इतिहास में यह महोत्सव मील का पत्थर साबित हुआ। महोत्सव में सुर थे, संगीत था, परंपरा थी और साथ ही एक संदेश भी था कि यदि संकल्प दृढ़ हो तो छोटे शहरों में भी ऐसे बड़े महोत्सवों का आयोजन किया जा सकता है।

डीएलसी सुपवा में भारत रंग महोत्सव (भारंगम) के 25वें संस्करण का आयोजन किया गया। यह पहली बार था, जब नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा ने दिल्ली से बाहर देश-दुनिया के 44 शहरों में ‘भारंगम’ आयोजित किया है। डीएलसी सुपवा हरियाणा का पहला संस्थान बना, जहां इस विश्व स्तरीय महोत्सव का आयोजन हुआ। एनएसडी की तरफ से देश व दुनिया के 107 कलाकार व टेक्नीशियन इस महोत्सव में हिस्सा लेने के लिए विश्वविद्यालय में पहुंचे थे। ‘सारंग’ महोत्सव के दौरान रंगमंच, संगीत, नृत्य, कविता पाठ, लोक नृत्य व संवाद सत्रों का आयोजन किया गया। इसमें देश के अलग-अलग राज्यों की कला व संस्कृतियों की झलक कलाकारों ने प्रस्तुत की। विवि के 50 से अधिक छात्र-छात्राओं ने भी अपनी प्रस्तुति मंच पर दी।

‘भारंगम’ व ‘सारंग’ महोत्सव के मुख्यातिथि गायक, अभिनेता व सांसद मनोज तिवारी को स्मृति चिन्ह देती रजिस्ट्रार डॉ गुंजन मलिक, साथ में कुलगुरु डॉ. अमित आर्य

पहले दिन गायक,अभिनेता व लोकसभा सांसद मनोज तिवारी ने सूर्य कवि लख्मी चंद की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने के बाद महोत्सव का शुभारंभ किया। उन्होंने अपने लोकप्रिय गीत “हे राजा जी…” से माहौल को उत्साह से भर दिया। यूनिवर्सिटी के 14 छात्रों ने देवेंद्र अहिरवार के निर्देशन में तैयार की गई रंग संगीत प्रस्तुत किया। मयूरभंज छऊ और ओडिसी नृत्य ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। दिल्ली की टीम प्रज्ञा थियेटर ग्रुप ने नाटक ‘उम्मीद : मनुष्य जिंदा है’ का मंचन किया। लक्ष्मी रावत द्वारा निर्देशित नाटक में भारत-पाकिस्तान से बंटवारे का दर्द दिखाई दिया। पहले दिन ओलंपिक पदक विजेता पहलवान योगेश्वर दत्त, फिल्म अभिनेता यशपाल सिंह, पहलवान व मॉडल संग्राम सिंह, एनएसडी के वरिष्ठ रंगकर्मी विद्यानिधि, रोहतक के डीसी सचिन गुप्ता, हरियाणा राज्य महिला आयोग की चेयरपर्सन रेनू भाटिया, फिल्म निर्माता अतुल गंगवार और अन्य गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति ने आयोजन की गरिमा बढ़ाई।

सांस्कृतिक एकता के नाम रहा दूसरा दिन

‘सारंग’ केवल प्रस्तुतियों की श्रृंखला नहीं था, वह संवाद का मंच था। यहां विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे और कई राज्यों से आए कलाकारों ने एक-दूसरे की कला-परंपराओं को देखा, समझा व सराहा। संवाद सत्र में अभिनेता यशपाल शर्मा व जतिन सरना ने विद्यार्थियों के साथ अपने अभिनय अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि रंगमंच कलाकार को गढ़ता है, उसे धैर्य और अनुशासन सिखाता है। तमिलनाडु की टीम द्वारा प्रस्तुत नाटक “पेन नदई कूथु – महिलाओं की चाल” ने स्त्री जीवन, संघर्ष और सामाजिक दृष्टिकोण को तमिल और अंग्रेजी भाषा में प्रभावशाली ढंग से मंचित किया। इस प्रस्तुति भाषा की सीमाओं से पार लोगों को भावनाओं से जोड़ने का काम किया। ‘मंडी हाउस – द बैंड’ के संस्थापक देवेंद्र अहिरवार की प्रस्तुति ने युवाओं को आधुनिक संगीत की धुनों से जोड़ा। ‘भारंगम’ के तहत शाम के सत्र में पंजाब की टीम ने निर्देशक केवल धालीवाल द्वारा निर्देशित नाटक ‘सांदल बार’ मंचित किया। नाटक के माध्यम से विस्थापित लोगों के दर्द और उनकी पहचान के संकट को अभिव्यक्त किया। यह प्रस्तुति दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर गई कि इतिहास केवल किताबों में नहीं, बल्कि मनुष्यों की स्मृतियों में भी जीवित रहता है।

युवाओं की रचनात्मक उड़ान

‘सारंग’ महोत्सव यूनिवर्सिटी की आंतरिक रचनात्मक ऊर्जा का मंच बना। तीसरे दिन सुबह का सत्र राग के सुर व तबले की मधुर थाप के साथ शुरू हुआ। डीएलसी सुपवा के छात्रों के म्यूजिक बैंड ने समां बांधने का काम किया। जींद से आए कवि अंकित ने ललित के साथ मिलकर ‘पैगाम ए मोहब्बत’ कविता की प्रस्तुति दी। पूर्व छात्र एवं प्रसिद्ध हरियाणवी गायक मासूम शर्मा ने भी अपने गीतों पर छात्रों को झूमने को मजबूर किया। हास्य कवि डॉ. जगबीर राठी ने भी अपने चुटकुलों से छात्रों व दर्शकों गुदगुदाने का काम किया। पंजाब के बठिंडा के केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रदर्शन व ललित कला विभाग की तरफ से नाटक ‘उमर का परवाना’ मंचित किया गया। नाटक में एक परिवार के प्रेम, समर्पण व संघर्ष को दिखाया गया। खास बात यह रही कि इस नाटक में असम, यूपी, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली के अलावा श्रीलंका से आए छह कलाकारों ने मिलकर अभिनय किया। सभी ने हिंदी व राजस्थानी में संवाद बोले व गीत गाए। नाटक का निर्देशन डॉ आदिश कुमार वर्मा ने किया।

लोक धुनों पर थिरके लोग

महोत्सव का चौथा दिन समापन दिवस रहा। ‘सारंग’ के मंच पर असम के शास्त्रीय नृत्य की मनोहारी प्रस्तुति ने पूर्वोत्तर भारत की समृद्ध परंपरा की झलक दिखाई। नर्तकों की लयबद्ध गति, पारंपरिक वेशभूषा और भावाभिव्यक्ति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद म्यूजिक बैंड ने गीत, भजन और गजल की श्रृंखला प्रस्तुत कर महोत्सव को संगीतमय बना दिया। चार दिवसीय उत्सव का समापन गुरुवार की शाम एक ऐसे सुरमयी वातावरण में हुआ, जिसने पूरे परिसर को लोक रस में डुबो दिया। सुप्रसिद्ध लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने जैसे ही मंच संभाला, वातावरण में ऊर्जा की एक लहर दौड़ गई। उनके लोकप्रिय गीत “नखरे वाली बन्नो आई पिया” की धुन पर न केवल दर्शक, बल्कि मंचासीन अतिथि और कलाकार भी झूम उठे। अभिनेत्री मेघना मलिक खुद को उनके साथ नाचने से नहीं रोक संकी। यह दृश्य केवल मनोरंजन का नहीं था, बल्कि उस सांस्कृतिक निरंतरता का उत्सव था, जिसमें लोकगीत आज भी दिलों को उसी तरह छूते हैं, जैसे सदियों पहले छुआ करते थे।

‘विवि के लिए ऐतिहासिक क्षण’

डीएलसी सुपवा विश्वविद्यालय के कुलगुरू डॉ अमित आर्य ने कहा कि यह पहली बार है, जब एनएसडी के बाहर ‘भारंगम’ का आयोजन हुआ और डीएलसी सुपवा को यह अवसर मिला।इतने बड़े आयोजन की सफलता सामूहिक प्रयास का परिणाम है। इन चार दिनों ने यह सिद्ध कर दिया कि रोहतक केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि सांस्कृतिक गतिविधियों का भी उभरता हुआ मंच है। अगर संकल्प और सहयोग हो, तो राष्ट्रीय स्तर के आयोजन भी स्थानीय धरातल पर सफलतापूर्वक आयोजित किए जा सकते हैं। यह उत्सव समाप्त जरूर हुआ, पर इसकी स्मृतियां लंबे समय तक शहर और विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक इतिहास में दर्ज रहेंगी। कला के यह अद्भुत रंग आने वाले वर्षों में और भी गहराई से खिलें, इसी उम्मीद के साथ ‘भारंगम’ और ‘सारंग’ ने इस वर्ष को एक अविस्मरणीय अध्याय बना दिया।

 

Topics: रंग संगीतअंतर्राष्ट्रीय थिएटर उत्सवसारंग महोत्सवसांस्कृतिक उत्सवसांस्कृतिक महाकुंभसृजन और संवादडीएलसी सुपवासूर्य कवि लख्मी चंदपाञ्चजन्य विशेषलोक और शास्त्रकला और संस्कृतिसांस्कृतिक घोषसांस्कृतिक निरंतरतासामूहिक संवेदनाएंभारंगम
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