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तकनीक के साथ सही कदमताल से बनेगी बात

मोबाइल की डिजिटल दुनिया से वास्ता रखने वाले खुद को एआई से अलग नहीं मान सकते। इसमें बच्चे भी शामिल हैं, युवा, कारोबारी और नेता भी, अब एक ऐसी तकनीकि जो सर्व सुलभ हो उसे नियंत्रित या सीमित करना काफी चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

Written byनिशि भाटनिशि भाट
Feb 24, 2026, 05:19 pm IST
in भारत
बच्चों को मोबाइल नहीं, आपका साथ और परिवार चाहिए। बच्चों को डिजिटल कैद से बचाने की पाञ्चजन्य की मुहिम।

बच्चों को मोबाइल नहीं, आपका साथ और परिवार चाहिए। बच्चों को डिजिटल कैद से बचाने की पाञ्चजन्य की मुहिम।

डिजिटल दुनिया और एआई एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, एआई आभाषी दुनिया का एक विस्तृत संसार है, जहां सोच को आकार मिलता है भावनाएं कैनवस की तरह स्क्रीन पर उकेरी जाती हैं और संवादों को डिजिटल बोल मिल जाते हैं।

मोबाइल की डिजिटल दुनिया से वास्ता रखने वाले खुद को एआई से अलग नहीं मान सकते। इसमें बच्चे भी शामिल हैं, युवा, कारोबारी और नेता भी, अब एक ऐसी तकनीकि जो सर्व सुलभ हो उसे नियंत्रित या सीमित करना काफी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। बात साझा करनी हो तनाव की या फिर विषयों की समझ मजबूत करनी हो, गूगल के बाद अब चैटजीपीटी सबसे विश्वसनीय माध्यम बन गया है, जिसकी प्रमाणिकता अभी साबित होना बाकी है।

भारत मंडपम में देश के पहले एआई इंपैक्ट समिट ने खूब सुर्खियां बटोरी। छात्रों से लेकर, युवा, कारोबारी और आमजन काफी आर्कषित हुए। अब एआई में शामिल होना महज फोटो सेशन कराने भर का नहीं होना चाहिए, इससे जुड़े कई पहलुओं पर भी विस्तृत चर्चा होनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एआई सुरक्षा और प्रमाणिकता से जुड़े मुद्दों पर विचार विमर्श करने के लिए एक संगठन बनाया गया है। वर्ष 2014 में बनाए गए संगठन द फ्यूचर ऑफ लाइफ साइंस के एआई सेफ्टी कनेक्ट ने एआई के सुरक्षित इस्तेमाल के लिए सिफारिशें प्रस्तुत की हैं।

फ्यूचर ऑफ लाइफ साइंस इंस्टीट्यूट की सह संस्थापक निकोलस मियाही की प्रमुख सिफारिशों में सबसे पहले इंडिया एआई सेफ्टी इंस्टीट्यूट का गठन किया जाना है, जिससे एआई सुरक्षा मानकों में देश की एजेंसी अतंराषट्रीय मानकों का पालन कर सकें, जो अभी यूके, कोरिया और फ्रांस में लागू की गई हैं। गलत जानकारी, डीपफेक, सीमा सुरक्षा, साइबर अटैक आदि ऐसे मामलें हैं, जिनसे भारत अभी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। विशेषज्ञों ने इस बात की भी चेतावनी दी कि एआई का इतना भी अधिक प्रयोग न हो कि यह सुपर इंटेलिजेंस यानि मानवीय मस्तिष्क की कुशलता को प्रभावित कर सके। एआई ड्रिवेन जेन जी या भावी पीढ़ी यदि सही तरीके से एआई टूल का प्रयोग करेगी तो बेहतर परिणामों की उम्मीद की जा सकती है।

डिजिटल शिक्षा, बेहतर भविष्य

तकनीक के साथ सही तरीके से कदमताल करने से ही अवसरों का फायदा उठाया जा सकता है। साल 2000 में कार्यालयों और ऑफिस में कंप्यूटर के अनिवार्य प्रयोग पर चर्चा शुरू हो गई कि कंप्यूटर नौकरियां खत्म कर देगा, इसके बाद स्मार्ट फोन की बारी आई और डिजिटल युग की बारी आई, जिसे लगभग सभी ने धीरे धीरे अपने जीवन का हिस्सा बना लिया। तकनीकी से दूर रहने वाले एक सामान्य व्यक्ति भी एक अदद स्मार्ट फोन और इंटरनेट उपभोक्ता है। उस दौर की जेनरेशन को नौकरियां नहीं मिलने का डर था और आज भी वही डर है, लेकिन कंप्यूटर के प्रयोग ने काम को आसान बनाया, वहीं प्रक्रिया एआई और डिजिटल युग में भी दोहराई जा रही है। भविष्य में नौकरियों के अवसर पर खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी कई बार कह चुके हैं कि युवाओं को नौकरियां जाने से कहीं अधिक ध्यान इस बात पर देना चाहिए कि वह अपनी स्किल कैसे मजबूत करें।

डिजिटल क्लास रूम से मिलेगी गति

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 इस बात का ध्यान रखा गया कि भावी पीढ़ी को तकनीकी के साथ कैसे जोड़ा जाए, डिजिटल क्लॉस रूप की अवधारणा को पहली बार एनईपी में प्रमुखता से जगह दी गई। जिसमें दीक्षा (डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर फॉर नॉलेज शेयरिंग) के प्रारूप को शामिल किया गया, जो इंटरनेट प्लेटफार्म से संचालित एनिमेशन, वीडियो क्विज आदि को जोड़ा गया। इसी क्रम में समग्र शिक्षा अभियान के तहत आईसीटी (इंफॉर्मेशन एंड कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी) लैब बनाई जा रही हैं, दिल्ली सरकार सहित झारखंड और नागपुर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में एआई आधारित डिजिटल क्लॉस रूप संचालित किए जा रहे हैं, जो इंटरनेट के प्रयोग में छात्रों का सही मार्ग दर्शन करेगें। हालांकि सभी स्कूल अभी पूरी तरह डिजिटली अपडेट नहीं हो पाए हैं, बावजूद इसके पूरी प्रयास किया जा रहा है कि एआई और तकनीक का प्रयोग सही दिशा में किया जाए, इससे भावी पीढ़ी कृत्रिम बौद्धिकता का सही फायदा उठा सके।

अभिभावकों की जिम्मेदारी

आपका बच्चा स्कूल से घर वापस आता है, प्रॉम्ट, एलगोरिदम, परप्लेक्सिटी, आदि जाने कितने शब्द उसकी जुबान पर हैं, जिनके बारे में आपको पता भी नहीं। 15 साल तक के एक औसत किशोर को जिसे पहले माता-पिता डांट-डपट कर पढ़ने बैठाते थे, आज वह संभव नहीं, तकनीकी उधेड़बुन में हर माता-पिता यही कहते हैं तुम जानो तुम्हारा काम जाने, नंबर कम नहीं आने चाहिए बस यही यही एक लाइन जिस पर सबसे अधिक ध्यान देना है। चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट डॉ प्रवीन मखीजा कहते हैं बच्चों के जीवन में पढ़ाई का तरीका और तकनीकी के बीच परिवार एक मजबूत कड़ी के रूप में काम करता है। बदलाव के समय में यदि माता-पिता साथ नहीं देंगे तो बच्चे अपने तरह के लोगों का साथ ढूंढते हैं, बदलाव को स्वीकार करने की पहल माता-पिता को भी करनी चाहिए। जेनरेशन गैप को कम करने के लिए यदि नई चीजों को समझना पड़े तो कुछ बुराई नहीं है।

डिजिटल लर्निंग टूल्स बढ़ाने की जरूरत

हेल्थ टेक में काम करने वाली कंपनी ब्लूएआई के जय नागी कहते हैं कि सरकार एआई के सही इस्तेमाल के लिए गंभीर चिंतन कर रही है, हम यह कह सकते हैं कि भविष्य में ऐसे लर्निंग टूल होगें जो स्मार्ट फोन से अलग केवल पढ़ाई के लिए प्रयोग किए जाएंगे, जिसमें हर विषय से जुड़ी जानकारियां रोचक तरीके से समाहित होगी। कुछ तकनीकी प्लेटफार्म काफी हद तक इसमें आगे, हालांकि विशेषज्ञ अधिक गोपनीय जानकारियों के लिए स्वदेशी इंटरनेट प्रोवाइटर और स्वदेशी एआई एप प्रयोग करने की सलाह देते हैं। जिसमें सुरक्षा की गारंटी अधिक रहती हैं। आधुनिक लर्निंग टूल से बच्चे पढ़ाई को प्रैक्टिकल करके सीखेंगे, जिससे उनको बोरियत नहीं होगी और विषयों के प्रति उनकी रुचि बढ़ेगी। हम भविष्य में रिमोट क्लॉस रूम की भी परिकल्पना कर सकते हैं।

 

 

Topics: मोबाइल की लतएआई इम्पैक्टडिजिटल दुनियाएआईपाञ्चजन्य विशेषडिजिटल एडिक्शन
निशि भाट
निशि भाट
निशि भाट, स्वास्थ्य क्षेत्र में बीते 15 साल से काम कर रही हैं, कोविड टीकाकरण से लेकर पोलियो मुक्त भारत सहित तमाम विषयों पर आपके लेख प्रकाशित हो चुके हैं। हिंदुस्तान, अमर उजाला सहित जनसत्ता में स्वास्थ्य पत्रकार के तौर पर लंबे समय तक काम किया है। [Read more]
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