2020 Delhi Riots: उमर खालिद और दिल्ली दंगों का ब्लूप्रिंट, FIR 59/2020
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2020 Delhi Riots: उमर खालिद और दिल्ली दंगों का ब्लूप्रिंट, FIR 59/2020

चार्जशीट के अनुसार, दंगे अचानक नहीं हुए थे। उमर खालिद ने दिसंबर 2019 से ही 'मुस्लिम बाहुल्य' इलाकों में गुप्त बैठकें शुरू कर दी थीं।

Written byआशीष कुमार 'अंशु'आशीष कुमार 'अंशु'
Feb 24, 2026, 04:27 pm IST
inभारत, दिल्ली
दिल्ली दंगा 2020

दिल्ली दंगा 2020

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा दाखिल हजारों पन्नों की चार्जशीट में उमर खालिद की भूमिका को ‘रिमोट कंट्रोल’ के रूप में परिभाषित किया गया है। चार्जशीट के डेटा और गवाहों के बयानों के आधार पर कुछ बातें समझी जा सकती है।

सुनियोजित साजिश और चक्का जाम

चार्जशीट के अनुसार, दंगे अचानक नहीं हुए थे। उमर खालिद ने दिसंबर 2019 से ही ‘मुस्लिम बाहुल्य’ इलाकों में गुप्त बैठकें शुरू कर दी थीं। चार्जशीट में उल्लेख है कि खालिद ने ‘चक्का जाम’ को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की योजना बनाई ताकि सरकार को घुटनों पर लाया जा सके। पुलिस का डेटा बताता है कि उत्तर-पूर्वी दिल्ली के 25 से ज्यादा जगहों पर एक साथ विरोध प्रदर्शन शुरू करना और फिर उन्हें हिंसक दंगों में बदलना एक सोची-समझी रणनीति थी।

डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा और भारत की छवि खराब करने की साजिश

चार्जशीट का सबसे गंभीर हिस्सा वह है जहाँ उमर खालिद के भाषणों और मीटिंग्स का जिक्र है। 17 फरवरी 2020 को अमरावती में दिए गए उसके भाषण को पुलिस ने आधार बनाया है, जिसमें उसने लोगों से सड़कों पर उतरने की अपील की थी। आरोप है कि खालिद और उसके साथियों ने जानबूझकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा का समय चुना ताकि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत की छवि एक ‘अस्थिर और हिंसक देश’ के रूप में पेश की जा सके। यह एक प्रकार का ‘सॉफ्ट टेररिज्म’ था जिसे मानवाधिकारों की आड़ में अंजाम दिया गया।

हथियारों और फंडिंग का नेटवर्क

चार्जशीट में डिजिटल सबूतों (WhatsApp चैट्स) के आधार पर दावा किया गया है कि खालिद ‘DPSG’ (दिल्ली प्रोटेस्ट सपोर्ट ग्रुप) जैसे समूहों के जरिए दंगाइयों को निर्देश दे रहा था। इसमें ताहिर हुसैन और पिंजरा तोड़ जैसे संगठनों के साथ उसके समन्वय का विवरण है। पुलिस का कहना है कि खालिद ने यह सुनिश्चित किया कि ‘ग्राउंड फुट सोल्जर्स’ के पास पत्थर, तेजाब और पेट्रोल बम जैसे संसाधन उपलब्ध हों।

आरोपी का ‘बौद्धिक महिमामंडन’ और अर्बन नक्सल इकोसिस्टम

यह देश का दुर्भाग्य और एक ‘हार्ड फैक्ट’ है कि जिस व्यक्ति पर देश की राजधानी को जलाने और ‘यूएपीए’ (UAPA) जैसे गंभीर आरोपों के तहत मुकदमा चल रहा है, उसे एक ‘बौद्धिक नायक’ के रूप में पेश करने की कोशिश लेफ्ट लिबरल समूहों और कांग्रेसी इको सिस्टम के माध्यम से की जा रही है।

किताब और प्रेस क्लब का मंच: लोकतंत्र का उपहास

उमर खालिद पर किताबें लिखना और उनके विमोचन के लिए प्रेस क्लब ऑफ इंडिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों का उपलब्ध होना, उस ‘अर्बन नक्सल’ तंत्र की शक्ति को दर्शाता है जो शैक्षणिक और बौद्धिक संस्थानों में गहराई तक घुसा हुआ है। जब एक आरोपी जेल में है और कोर्ट उसकी जमानत बार-बार खारिज कर चुका है (यह मानते हुए कि प्रथम दृष्टया आरोप सही हैं), तब उसके पक्ष में साहित्य रचना और सार्वजनिक लोकार्पण करना सीधे तौर पर न्यायपालिका को चुनौती देना है।

प्रतिष्ठित बुद्धिजीवियों की भागीदारी

इन आयोजनों में शामिल होने वाले ‘प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी’—जिनमें वरिष्ठ पत्रकार और वामपंथी नेता शामिल होते हैं—एक खतरनाक नैरेटिव सेट करते हैं। यह वही वर्ग है जो अंकित शर्मा के 51 घावों पर मौन रहता है, लेकिन उमर खालिद की ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के लिए मोमबत्तियां जलाता है। जो लोग बार बार प्रश्न पूछते हैं कि अर्बन नक्सल क्या है? उन्हें यह बात समझनी चाहिए कि इसे ही ‘अर्बन नक्सलिज्म’ कहा जाएगा, जहाँ हिंसा के मास्टरमाइंड को ‘विचारधारा का सिपाही’ बताकर कानूनी कार्रवाई को ‘राजनैतिक प्रतिशोध’ का नाम दे दिया जाता है।

पीड़ित के जख्मों पर नमक

प्रेस क्लब जैसे मंचों से जब उमर खालिद जैसे लोगों का महिमामंडन होता है, तो यह उन हिंदू परिवारों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है जिन्होंने इन दंगों में सब कुछ खो दिया। ‘अर्बन नक्सल’ इकोसिस्टम यह स्थापित करना चाहता है कि ‘अपराधी’ का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन अगर अपराधी उनकी विचारधारा का है, तो वह ‘क्रांतिकारी’है।

2026 में सड़क नहीं, प्रेस क्लबों में लड़ी जा रही लड़ाई

आज 2026 में, जब कोर्ट ने चार्जशीट के आधार पर उमर खालिद की संलिप्तता को ‘गंभीर और केंद्रीय’ माना है, तब इस प्रकार का ‘बौद्धिक सक्रियतावाद’ यह साबित करता है कि भारत के खिलाफ जंग केवल सीमाओं पर या सड़कों पर नहीं, बल्कि बंद कमरों और प्रेस क्लबों के ‘एसी हॉलों’ में भी लड़ी जा रही है।

यह ‘अर्बन नक्सल’ नेटवर्क का ही कमाल है कि एक दंगा आरोपी को ‘लेखक’ और ‘दार्शनिक’ बनाकर पेश किया जा रहा है, जबकि असली पीड़ित आज भी न्याय की फाइलों के नीचे दबे हुए हैं। FIR 59/2020 की सच्चाई को झुठलाने के लिए जो ‘बुद्धिजीवी’ एकजुट हो रहे हैं, वे दरअसल भारत के सुरक्षा तंत्र को कमजोर करने वाली उस मशीनरी के पुर्जे हैं, जिसका पर्दाफाश होना राष्ट्रहित में अनिवार्य है।

Topics: उमर खालिददिल्ली दंगा-2020एफआईआर 59डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रासॉफ्ट टेररिज्म
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार अंशु पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों तक मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान STEP से जुड़े रहे हैं। [Read more]
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