हल्द्वानी : बनभूलपुरा रेलवे अतिक्रमण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त! CJI ने की कड़ी टिप्पणी
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हल्द्वानी : बनभूलपुरा रेलवे अतिक्रमण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त! CJI ने की कड़ी टिप्पणी

Supreme Court of India में हल्द्वानी के बनभूलपुरा रेलवे भूमि अतिक्रमण मामले पर सुनवाई। Prashant Bhushan और रेलवे-उत्तराखंड सरकार के बीच पुनर्वास व मुआवजे पर बहस। Pushkar Singh Dhami ने भी की उच्चस्तरीय पैरवी। 19 मार्च तक मिली अंतरिम राहत।

Written byउत्तराखंड ब्यूरोउत्तराखंड ब्यूरो — edited by Shivam Dixit
Feb 24, 2026, 04:43 pm IST
inभारत, उत्तराखंड

नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट में हल्द्वानी के बनभूलपुरा स्थित रेलवे भूमि अतिक्रमण मामले पर सुनवाई के दौरान रेलवे और उत्तराखण्ड सरकार ने मुख्य न्यायाधीश श्री सूर्यकांत और न्यायमूर्ति श्री जॉय माला बागची की पीठ के समक्ष अपना हलफनामा पेश किया। मामले में पुनर्वास, मुआवजा और भूमि स्वामित्व को लेकर दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस हुई।

बता दें कि रेलवे की जमीन से अतिक्रमण हटना लगभग तय माना जा रहा है। वहीं कोर्ट ने ईद के बाद पुनर्वास कैंप लगाने, पात्रों को पीएम आवास देने और 6 महीने तक भत्ता देने का निर्देश भी दिया है। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर अप्रैल में दोबारा सुनवाई करेगा तब तक  रेलवे जमीन पर अतिक्रमण हटाने की कोई कार्रवाई नहीं होगी।

रेलवे और राज्य सरकार का पक्ष

रेलवे की ओर से अदालत को बताया गया कि कुल 13 ऐसे मामले हैं जिनमें भूमि फ्रीहोल्ड श्रेणी की है और उन मामलों में मुआवजा दिए जाने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके अतिरिक्त, जिन लोगों को रेलवे भूमि से हटाया गया है, उनके लिए राज्य सरकार द्वारा वैकल्पिक आवासीय व्यवस्था मुहैया कराने का प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया गया है।

रेलवे ने अदालत में कहा कि जिन लोगों को हटाया गया, वे सार्वजनिक भूमि पर अवैध रूप से रह रहे थे। यह निजी भूमि नहीं बल्कि रेलवे की संपत्ति है। इसके बावजूद मानवीय आधार पर मुआवजे का प्रस्ताव दिया जा रहा है। रेलवे ने यह भी अनुरोध किया कि हटाए गए लोगों के पुनर्स्थापन की मांग वाली याचिका को खारिज किया जाए।

याचिकाकर्ता का तर्क

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Prashant Bhushan ने अदालत में कहा कि प्रभावित लोगों की संख्या 50 हजार से अधिक है। उन्होंने दलील दी कि इनमें से बहुत कम लोग प्रधानमंत्री आवास योजना की पात्रता में आते हैं। ऐसे में शेष परिवारों के पुनर्वास की स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए।

भूषण ने यह भी कहा कि संबंधित भूमि राज्य सरकार की है और लोग वर्षों से वहां रह रहे थे। उनका कहना था कि लंबे समय से बसे होने के कारण इन बस्तियों के नियमितिकरण पर विचार किया जाना चाहिए था और इस मामले का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य भी महत्वपूर्ण है।

सीजेआई की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि लोगों की संख्या 50 हजार हो सकती है, लेकिन परिवारों की संख्या उतनी नहीं होगी। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनते हुए मामले की गंभीरता को रेखांकित किया।

मामले की अगली सुनवाई में पुनर्वास, मुआवजा और भूमि स्वामित्व के कानूनी पहलुओं पर विस्तृत चर्चा होने की संभावना है।

हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र से जुड़े इस मामले पर पूरे प्रदेश की नजर बनी हुई है। भूषण ने कहा कि हाईकोर्ट में जनहित याचिका नदी में खनन को रोकने के लिए थी। जहां लोगों को ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर रहने वाला बताया गया और फिर रेलवे ने अपने विस्तार प्रोजेक्ट के नाम पर हटाया गया।

प्रशांत भूषण ने कहा कि बगल में एक ख़ाली ज़मीन जो 30 एकड़ से ज़्यादा है, वो है। इसके पास उन्हें हटाया गया।

सीजेआई ने कहा कि आप सार्वजनिक भूमि पर ऐसे दावा कर रहे हैं। जैसे मालिकाना हक हो, जबकि अनाधिकृत तरीक़े से रह रहे थे।

सीजेआई ने एएसजी ऐश्वर्या भाटी से पूछा कि आपके सरकारी आवास देने का प्रस्ताव क्या है।रेलवे वकील सुश्री भाटी ने कहा कि तीन कैटेगरी हैं ईडब्ल्यूएस, लो कैटेगरी और सेमी लो कैटेगरी है जिसमें आवास दिया जाएगा।

सीजेआई ने कहा कि इस क्षेत्र में बेसिक सुविधा भी नहीं है। सीवेज तक नहीं है, ऐसे में हाउसिंग योजना के तहत घर लेने में क्या समस्या है।*

कब्जे दारो की तरफ से प्रशांत भूषण ने कहा कि एकपक्षीय आदेश जारी हुए थे कोविड के आसपास। इसके बाद यहां अपील दाखिल हुई। उन्होंने कहा कि तब सुप्रीम कोर्ट ने बहुत ही विस्तृत आदेश दिया था कि कैसे क्या होगा? सीजेआई ने भाटी से पूछा कि पीएम आवास योजना के तहत सभी परिवारों को आवास मुहैया कराना चुनौती नहीं है।

सीजेआई ने कहा कि कोई अन्य प्रस्ताव नहीं है।

सुश्री भाटी ने कहा कि रेलवे के पास जमीन सीमित है और बड़े पैमाने पर जमीन पर अनाधिकृत क़ब्ज़ा है। रेलवे को एक्सटेंशन भी करना है।

तमाम दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल 19 मार्च रमजान खत्म होने तक कब्जे दारो को एक तरह से राहत दी है।

19 मार्च के बाद जिला विधिक प्राधिकरण की देखरेख में कैंप लगेंगे जिनमें उन लोगों के चयन किया जाएगा जोकि पीएम आवास योजना आदि के पात्र होंगे।

रेलवे और राज्य सरकार ने दलील दी है कि जो यहां के रहने वाले है उनमें से ही पात्र होंगे ,बाहर से आकर कब्जे करने वाले पात्र नहीं हो सकते वो अपने राज्य में जाकर आवेदन करें।

अगली सुनवाई 19 मार्च के बाद की जाएगी।

सरकार भी रही सजग

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने दिल्ली प्रवास के दौरान सुप्रीम कोर्ट में चल रहे बनभूलपुरा रेलवे अतिक्रमण मामले को लेकर ,इस केस को देख रहे अधिवक्ता अभिषेक आत्रेय से बातचीत की। इस मामले में श्री धामी भारत सरकार के अटॉर्नी जनरल तुषार मेहता से भी बातचीत कर चुके है।

कुछ समय पहले श्री धामी ने रेल मंत्री अश्वनी वैष्णव से भी निवेदन किया था कि वे इस मामले में रेल मंत्रालय के अधिवक्ताओं को दिशा निर्देश दे।

मुख्यमंत्री धामी और रेल मंत्री श्री वैष्णव इस बात से चिंतित रहे है कि हल्द्वानी रेलवे भूमि पर अतिक्रमण से कुमायूं मंडल के लिए नई रेल योजनाएं नहीं बन पा रही है।

श्री धामी कहते आए है कि काठगोदाम और हल्द्वानी में ट्रेनों के खड़े करनी की समस्या को देखते हुए वंदे भारत जैसी ट्रेन काठगोदाम या हल्द्वानी से नहीं चल पा रही है जिससे पर्यटन उद्योग प्रभावित हो रहा है। हल्द्वानी तक आने वाली रेल पटरी भी गौला नदी के भू कटाव की चपेट में है और इन्हीं मुद्दों को रेलवे के अधिवक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में पुरजोर ढंग से रखा है।

उत्तराखंड सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में ये बात कही है कि गुजरात के एक मामले की तरह वे भी पात्र प्रभावित लोगों के पुनर्वास के लिए विचार कर सकती है।

बीजेपी नेता भी पहुंचे सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई के दौरान बीजेपी नेता और राज्यमंत्री दायित्वधारी शंकर कोरंगा भी अपने कार्यकर्ताओं के साथ सुप्रीम कोर्ट में नजर आए। उनका कहना था कि इस मामले के सुलझ जाने से सालों से चली आ रही असमंजस्य की स्थिति खत्म होगी और जनहित में रेलवे के प्रोजेक्ट कुमायूं में आयेंगे।

श्री कोरंगा का ये भी कहना था कि कांग्रेस,सपा ने वोट बैंक,,तुष्टिकरण की राजनीति से इस मसले को उलझाया है, हाई कोर्ट के निर्णय के बाद रेलवे को अपनी भूमि वापिस मिल जाती तो ये नौबत नहीं आती।

विपक्ष की वोटबैंक राजनीति

इस प्रकरण पर कांग्रेस विधायक सुमित हृदयेश के अलावा समाजवादी पार्टी के नेता मतीन अहमद सिद्दीकी ने ये मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया है। बनभूलपुरा क्षेत्र में रेलवे की भूमि पर ज्यादातर कब्जेदार मुस्लिम समुदाय से है और ये मामला बरसो से रेलवे और उनके बीच चला आ रहा है।इस मामले में हाईकोर्ट ने रेलवे और सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया हुआ है।जिसपर विपक्ष के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट से स्टे लिया और इस मामले को चीफ जस्टिस की कोर्ट में सुना जा रहा था।

Topics: सुप्रीम कोर्ट सुनवाईरेलवे भूमि विवादPushkar Singh DhamihaldwaniIndian Railwaysउत्तराखंड सरकारपीएम आवास योजनाबनभूलपुरा अतिक्रमणSupreme Court of Indiaपुनर्वास नीतिPrashant Bhushan
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