देहरादून। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के उत्तराखंड प्रवास के दूसरे दिन देहरादून के निम्बूवाला स्थित हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र, गढ़ी कैंट में पूर्व सैनिकों एवं पूर्व सेना अधिकारियों के साथ विशेष संवाद गोष्ठी में शामिल हुए। कार्यक्रम में थलसेना, नौसेना, आईटीबीपी, तटरक्षक बल एवं अन्य सैन्य क्षेत्रों से सेवानिवृत्त अनेक पूर्व सैनिक एवं अधिकारी उपस्थित रहे।
अपने ओजस्वी संबोधन में डॉ. भागवत ने कहा कि देश के भाग्य निर्माण में समाज की भूमिका सर्वोपरि होती है। समाज मजबूत होगा तो राष्ट्र की रक्षा भी सशक्त होगी। समाज का संगठित बल ही प्रत्येक नागरिक को शक्तिसंपन्न बनाता है, इसीलिए समाज के नेतृत्व का चरित्रवान एवं अनुशासित होना अनिवार्य है।

भारत के स्वाधीनता संघर्ष की गौरवशाली परंपरा का स्मरण कराते हुए सरसंघचालक जी ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस काल में वीरों ने अदम्य साहस के साथ संघर्ष किया और भले ही तत्काल विजय न मिली, किंतु स्वतंत्रता की ज्योति कभी मंद नहीं पड़ी। द्वितीय विश्वयुद्ध के संदर्भ में विंस्टन चर्चिल का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इतिहास से सीख लेकर आगे बढ़ना ही राष्ट्रीय चेतना का प्रमाण है। क्रांतिकारी आंदोलनों ने उस संघर्ष को निरंतरता दी और अंततः देश स्वतंत्र हुआ। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष तभी सफल हो सका जब समाज सुधार को उसका आधार बनाया गया और जातिगत विभेद से ऊपर उठकर समाज एकजुट हुआ।
संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी की राष्ट्रनिष्ठा का स्मरण करते हुए भागवत जी ने कहा कि वे जन्मजात राष्ट्रभक्त थे और स्वतंत्रता आंदोलन में उन्होंने निर्भीकता के साथ भाग लिया। उस युग में भारत का पराक्रम विश्व में सुविख्यात था, किंतु आंतरिक विघटन और जातीय कमजोरियों का लाभ शत्रुओं ने बार-बार उठाया यही इतिहास की सबसे बड़ी सीख है।
संघ का एकमात्र लक्ष्य व्यक्ति निर्माण
भागवत जी ने भारत की सांस्कृतिक विविधता को उसकी अद्वितीय शक्ति बताते हुए कहा कि भाषा, पंथ, देवी-देवता और परंपराएं चाहे कितनी भी भिन्न हों, किंतु हम सबको जोड़ने वाला एक अटूट सूत्र है और उसी सूत्र को सुदृढ़ करना संघ का मूल कार्य है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ किसी राजनीतिक दल का अंग नहीं है और न ही चुनावी राजनीति उसका ध्येय है। संघ का एकमात्र लक्ष्य व्यक्ति निर्माण है, क्योंकि जब व्यक्ति सुदृढ़ होता है तभी व्यवस्था और राष्ट्र दोनों सुदृढ़ होते हैं।
भारत का स्वभाव विविधता में एकता
सेक्युलर शासन की यूरोपीय अवधारणा का उल्लेख करते हुए भागवत जी ने कहा कि भारत का स्वभाव तो विविधता में एकता का है। हमारे ऋषियों और पूर्वजों ने विश्व कल्याण की भावना से इस राष्ट्र की आधारशिला रखी थी और उसी सनातन चेतना को पुनः जागृत करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
स्वतंत्रता की रक्षा के लिए रक्षा व्यवस्था जरूरी
पूर्व सैनिकों को विशेष रूप से संबोधित करते हुए भागवत जी ने कहा कि “देश स्वतंत्र है, लेकिन उसकी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सेना की आवश्यकता सदैव बनी रहती है।” समाज में असामाजिक तत्वों और बाहरी खतरों से सुरक्षा के लिए एक सशक्त एवं सजग रक्षा व्यवस्था अनिवार्य है। संघ बिना किसी बाह्य साधन के खड़ा हुआ और दो बार कठोर प्रतिबंध झेलने के बाद भी समाज की आत्मशक्ति के बल पर आगे बढ़ता रहा।
पूर्व सैनिकों का आह्वान
डॉ भागवत ने उपस्थित पूर्व सैनिकों से आह्वान किया कि वे संघ के शिविरों और कार्यक्रमों में आकर स्वयंसेवकों के समर्पित कार्य को निकट से देखें और अपनी रुचि तथा सामर्थ्य के अनुसार सेवा कार्यों से जुड़ें। उन्होंने बताया कि संघ के देशभर में 1 लाख 30 हजार से अधिक सेवा प्रकल्प सक्रिय रूप से चल रहे हैं। शताब्दी वर्ष में यह सक्रियता और अधिक व्यापक हुई है।
संघ का उद्देश्य कभी प्रचार नहीं रहा
कार्यक्रम का समापन करते हुए डॉ भागवत ने अपने चिंतन का सार इन शब्दों में प्रस्तुत किया “संघ नहीं, समाज के कारण देश बड़ा हुआ यह इतिहास में दर्ज होना चाहिए।” संघ का उद्देश्य कभी प्रचार नहीं रहा, अपितु समाज का संगठन और राष्ट्र का उत्थान ही उसकी एकमात्र प्रेरणा है। कार्यक्रम का समापन राष्ट्र गान के साथ हुआ।
कार्यक्रम के आरंभ में जनरल गुलाब सिंह रावत , कर्नल अजय कोठियाल एवं कर्नल मयंक जी ने सरसंघचालक भागवत जी का शाल ओढ़ाकर एवं पारंपरिक टोपी से सम्मानपूर्वक स्वागत एवं अभिनंदन किया। इसके साथ ही विभिन्न सैन्य क्षेत्रों से पधारे पूर्व अधिकारीयों एवं सैनिकों सेवा निवृत जनरल. वाईस एडमिरल, ब्रिगेडयर, और कर्नल रैंक से लेकर अनेक पदों पर देश की सेवा कर चुके सैनिक पुरे जोश से कार्यक्रम में सम्मिलित रहें। कार्यक्रम में मंच का संचालन प्रान्त विशेष टोली संपर्क सदस्य राजेश सेठी जी ने किया।
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