भुवनेश्वर/बुर्ला (संबलपुर): भारत की दीर्घकालीन प्रगति गांवों की मजबूती पर निर्भर करती है। इसलिए शोधकर्ताओं को भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित ग्रामीण विकास को अपने शोध का केंद्र बनाना चाहिए । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह होसबाले ने संबलपुर के बुर्ला स्थित वीर सुरेन्द्र साई प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (वीएसएसयूटी) आयोजित शिक्षकों और शोधार्थियों के सम्मेलन में विद्वानों से यह आह्वान किया ।
यह सम्मेलन विश्वविद्यालय के ई-लर्निंग केंद्र में श्री रामकृष्ण परमहंस प्रोफेसर्स फोरम के तत्वावधान में आयोजित किया गया, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी वर्ष समारोह का हिस्सा था। कार्यक्रम में विभिन्न उच्च शिक्षण संस्थानों के प्राध्यापक, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।
अपने संबोधन में होसबाले ने संघ की सौ वर्ष की यात्रा का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करते हुए उसके प्रमुख पड़ावों और चुनौतियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि संघ हिंदुत्व को राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से देखता है और जो भी व्यक्ति राष्ट्रसेवा में समर्पित होकर कार्य करता है, वह देश की प्रतिष्ठा को बढ़ाता है। संघ समाज में चरित्र निर्माण, व्यक्तित्व विकास, परिवार सुदृढ़ीकरण तथा राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि विभिन्न आपदाओं और संकटों के समय संघ ने निस्वार्थ भाव से समाज के साथ खड़े होकर सेवा की है, जिसे किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं।

उन्होंने आगे कहा कि संगठन निरंतर सामाजिक उत्तरदायित्व और सामूहिक सहयोग की भावना को प्रोत्साहित करता रहा है। स्वतंत्रता के बाद भारत की विकास यात्रा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि खाद्य प्रौद्योगिकी, शिक्षा, खेल और रक्षा जैसे क्षेत्रों में देश ने उल्लेखनीय प्रगति की है। भारत अब खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बन चुका है और अपनी मूलभूत खाद्य आवश्यकताओं के लिए किसी अन्य देश पर निर्भर नहीं है। राष्ट्रीय एकता पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि विविधता से भरे समाज में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन जब बात राष्ट्र गौरव की आती है तो सभी नागरिक एक हो जाते हैं। ओलंपिक में पदक जीतने वाले खिलाड़ी या वैश्विक स्तर पर देश का नाम रोशन करने वाले व्यक्ति की पहचान या पृष्ठभूमि नहीं देखी जाती, बल्कि पूरा देश सामूहिक गर्व महसूस करता है। उन्होंने इसे भारतीय सभ्यता की विशेषता बताते हुए कहा कि एकता और अखंडता ही राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति है।
आत्मनिर्भरता पर चर्चा करते हुए होसबाले ने कोविड-19 महामारी के दौरान भारत की भूमिका का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत ने अनेक देशों को चिकित्सा उपकरण और मानवीय सहायता प्रदान कर विश्व के सामने मानवीय दृष्टिकोण का उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने इसे “वसुधैव कुटुंबकम्” अर्थात विश्व एक परिवार है, की भारतीय सांस्कृतिक भावना से जोड़ते हुए कहा कि यही विचार संघ के सामाजिक दृष्टिकोण का मार्गदर्शन करता है। उन्होंने कहा कि इस एकता को बनाए रखना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। उन्होंने औपनिवेशिक काल के उन विचारों का भी उल्लेख किया जिनमें भारतीयों को कमजोर और कम शिक्षित बताया गया था। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने हमें यह विश्वास दिलाया और हमने इसे सहजता से स्वीकार भी कर लिया, जो हमारी कमजोरी बन गई और इसी का लाभ उठाकर वे लंबे समय तक शासन करते रहे।

पिछले सौ वर्षों से संघ भारतीय समाज में उसी आत्मविश्वास को पुनर्जीवित करने का कार्य कर रहा है, जिससे लोग अपनी शक्तियों और कमियों दोनों को पहचान सकें। उन्होंने कहा कि इस शताब्दी यात्रा में अनेक बाधाएं आईं, फिर भी संघ अपने लक्ष्य और मार्ग से कभी विचलित नहीं हुआ। प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान शिक्षकों और शोधार्थियों ने सामाजिक परिवर्तन और विकास की प्राथमिकताओं पर प्रश्न पूछे। इसके उत्तर में होसबाले ने कहा कि भारत का विकास ग्रामीण परिवर्तन से जुड़ा हुआ है। समृद्ध, सुरक्षित और आत्मनिर्भर गांव ही देश की संस्कृति और अर्थव्यवस्था को मजबूत करेंगे। उन्होंने शोधकर्ताओं से आग्रह किया कि वे गांवों की पारिस्थितिकी का अध्ययन करें, स्थानीय परंपराओं को संरक्षित करें और ग्रामीण समस्याओं के व्यावहारिक समाधान विकसित करें।
उन्होंने विशेष रूप से भारतीय ज्ञान प्रणालियों को शोध में शामिल करने तथा ग्रामीण आधारभूत संरचना, आजीविका और सामाजिक सुदृढ़ता को मजबूत करने में योगदान देने का आह्वान किया। साथ ही, पलायन और तीव्र आधुनिकीकरण के कारण संकटग्रस्त गांवों की सुरक्षा और संरक्षण के उपायों पर भी चर्चा हुई।
कार्यक्रम का संचालन डॉ.जसविंदर जी(असिस्टेंट प्रोफेसर, वीर सुरेंद्र साए तकनीकी विश्वविद्यालय)ने किया और धन्यवाद ज्ञापन डॉ.सत्यनारायण बेहेरा जी(असिस्टेंट प्रोफेसर,स्त्रीरोग विभाग,वीर सुरेंद्र साए इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च)ने किया।इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कार्यकारी कुलपति प्रो.देवदत्त मिश्र तथा विभिन्न विश्वविद्यालय और महाविद्यालय के विद्वान प्राध्यापक एवं शोधार्थी उपस्थित रहे।

















