समाज के रक्त में है लोकतंत्र, उसे दबाने वाला मिट्टी में मिल जाएगा : भैयाजी जोशी
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समाज के रक्त में है लोकतंत्र, उसे दबाने वाला मिट्टी में मिल जाएगा : भैयाजी जोशी

भोपाल में आपातकाल के 50 वर्ष पर आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक भैयाजी जोशी ने 1975 की आपातकाल अवधि को लोकतंत्र पर आघात बताया। उन्होंने कहा— भारत का समाज तानाशाही कभी सहन नहीं करेगा।

Written byएजेंसीएजेंसी
Feb 19, 2026, 08:38 pm IST
inभारत, संघ @100, मध्य प्रदेश

भोपाल (हि.स.) । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य सुरेश जोशी उपाख्य भैयाजी जोशी ने कहा कि आपातकाल की घटना सिखाती है कि कोई तानाशाह बनने की कोशिश करेगा तो ये समाज, ये देश सहन नहीं करेगा। समाज के रक्त में लोकतंत्र है, जनतंत्र है, उसे दबाने को कोशिश कने वाला मिट्टी में मिल जाएगा।

‘आपातकाल और युवा’ विषय पर राष्ट्रीय विमर्श का आयोजन

भैयाजी जोशी गुरुवार को आपातकाल के 50 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में ‘आपातकाल और युवा‘ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय विमर्श को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम का आयोजन हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषी संवाद समिति और सैम ग्लोबल यूनिवर्सिटी के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।

आपातकाल की स्मृतियां भुलाना असंभव

भैयाजी जोशी ने कार्यक्रम के आयोजन के लिए हिन्दुस्थान समाचार का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यहां शायद ही कुछ लोग होंगे, जिन्होंने उस आपातकाल का अनुभव किया है और बहुत से लोग हैं, जिन्होंने उस घटना के बारे में सुना है। जिन्होंने अनुभव किया, उनके लिए स्मृति से कई बातों को हटाना असंभव है।

संविधान और अधिकारों के दुरुपयोग पर प्रश्न

उन्होंने कहा कि स्वतंत्र होने के बाद अपने संविधान के आधार पर देश चलेगा, इस नाते एक विशिष्ट अध्ययनशील व्यक्तियों की समिति के द्वारा एक संविधान का निर्माण किया गया। संविधान का उद्देश्य है कि भविष्य में देश किस प्रकार चले, किसके क्या अधिकार होंगे, किसके क्या कर्तव्य होंगे। देश की सुरक्षा के संदर्भ में समय-समय पर क्या करने की आवश्यकता रहेगी, इस प्रकार से देश को सुरक्षित, सुनियोजित संचालित करने के लिए संविधान बनाया गया था। देश की सुरक्षा के लिए कुछ कानून बनाए गए थे। साल 1962, 1965, 1972-73 पर देश पर आक्रमण हुए, उस समय इस प्रकार के कानून बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ी, लेकिन जब हम देखते हैं कि 1975 में इस प्रकार के शासन से प्राप्त अधिकारों का कैसे दुरुपयोग किया गया। उस समय देश में कोई संकट की घड़ी नहीं थी, विदेशी शक्तियां भी यहां सक्रिय नहीं थी। देश के स्वाभिमान, सम्मान और सुरक्षा को कोई चुनौती नहीं थी, जिसके आधार पर इस देश के समाज को सुरक्षा की गारंटी दी जाए और समाज-राष्ट्रविरोधी तत्वों को नियंत्रित किया जाए। फिर प्रश्न आता है कि इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी?

26 जून 1975 से मार्च 1977 तक का कालखंड

भैयाजी जोशी ने कहा कि देश का दुर्भाग्यपूर्ण काला इतिहास 26 जून 1975 को शुरू हुआ और मार्च 1977 को वह कालखंड समाप्त हुआ। क्या हुआ था उस समय, सत्ता में बैठी हुई व्यक्ति निरंकुश सत्ता चलाना चाहती थीं। हम कुछ भी करेंगे, उसके विरोध में कोई स्वर उठा न सके, हमें कोई रोक न सके, इस प्रकार का व्यक्ति केन्द्रित विचार करते हुए इस कानून का सहारा लेते हुए 25 जून की मध्य रात्रि को ये आपातकाल घोषित किया गया। सब हक्के-बक्के थे। अगले दिन के समाचार पत्र खाली थे, कोई कुछ लिख नहीं पाया था। जब लोगों ने समाचार पत्र देखा तो समझ में नहीं आया कि क्या हुआ?

मीसा कानून और लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन

उन्होंने कहा कि सब प्रकार के जनतंत्र द्वारा प्राप्त अधिकारों का हनन करते हुए केवल और केवल एक व्यक्तिगत इच्छा की पूर्ति के लिए उसने यह सब कानून बनाया। उस समय के प्रधानमंत्री के निर्वाचन को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी गई, उनके खिलाफ चुनाव लड़ने वाले राजनारायण थे। उन्होंने उस निर्णय को चुनौती दी। न्यायालय में मामला चला, फैसला आ गया कि निर्वाचन अनुचित है, लेकिन इंदिरा गांधी ने हटने का मार्ग चयन नहीं किया, सारे देश को जेल बनाने का निर्णय लिया। अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को दांव पर लगाकर इस देश के लोकतंत्र को समाप्त करने का एक वेदनादायक कदम उठाया। जो कानून लाया गया, उसे मीसा के नाम से जाना जाता है।

विरोधियों की गिरफ्तारी और दमनचक्र

भैयाजी जोशी ने कहा कि उस समय कोई आतंरिक सुरक्षा के प्रश्न नहीं थे। कोई बड़ा विद्रोह नहीं था, पर इस एक कानून का आधार लेते हुए सब देश में अशांति है, देश में असंतोष, कई प्रकार की दुर्घटनाएं हो सकती हैं, ऐसा प्रकट करते हुए इस एक कानून के आधार पर अपने विरोधियों को सब प्रकार से प्रतिबंधित किया गया, जेल में डाला गया। क्या कोई कह सकता है कि अटल बिहारी वाजपेयी देशद्रोही थे, क्या कोई कल्पना कर सकता है कि लालकृष्ण आडवाणी देश के विरोध में कुछ कर सकते हैं, क्या कोई सोच सकता है कि जार्ज फर्नांडिज इस देश के खिलाफ विदेशियों की सहायता लेकर देश की आंतरिक सुरक्षा को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इस कानून का भयानक सूत्र था कि इसके खिलाफ न्यायालय में भी नहीं जा सकते, इसके खिलाफ कुछ लिख नहीं सकते, जनसभाएं नहीं ले सकते, कोई आंदोलन खड़ा नहीं कर सकते। जो करेगा उसे देशद्रोही-समाजद्रोही माना जाएगा और उसे जेल के अंदर जाना पड़ेगा।

सत्ता को चुनौती देना अपराध नहीं

उन्होंने कहा कि क्या सतापक्ष को चुनौती देना कोई अपराध है। क्या सत्ता के सामने प्रश्न खड़े करना देशद्रोह है। ये तो देश की आत्मा का स्वर था, जो गूंज उठा और उस स्वर के परिणामस्वरूप सत्ता में बैठे एकाधिकार निरंकुश सत्ता को लगा कि हम नहीं कुछ करेंगे तो हम नहीं रहेंगे और फिर आगे आने वाले महीनों में जिस प्रकार दमनचक्र चला, हम सब जानते हैं। सत्ता के सामने जो आवाज कर सकते थे, ऐसी सारी संस्थाओं को प्रतिबंधित कर दिया गया, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद, विद्यार्थी परिषद भी शामिल रहे। कई प्रकार के 20 सूत्री कार्यक्रम लाए गए, ताकि हम जो चाहे कर सकें। तानाशाह अपने अहम में रहता है, उसे लगता है कि अब ऐसी स्थिति में कोई कुछ नहीं कर सकता, लेकिन वे न भारत की आत्मा को जानते हैं, न भारत के मन को जानते हैं, न भारत के आंतरिक ताने-बाने को जानते हैं।

1977 का चुनाव और जनता की निर्णायक भूमिका

भैयाजी जोशी ने कहा कि इसी बीच किसी ने सलाह दी कि अब चुनाव घोषित कर दीजिए। अब कौन रहेगा आपके सामने। इसके बाद निर्वाचन घोषित कर दिया गया। चुनाव में 20-25 दिन बचे हैं। उन्हें लगा कि अलग-अलग दलों के जो नेता जेलों में हैं, उनकी आवाज दबी हुई है, वे क्या कर लेंगे। इस प्रकार के विचार करते हुए बड़े-बडे राजनेताओं को बाहर निकाला। आश्चर्य की बात है कि सोया हुआ समाज नहीं था, जागृत समाज था। इसलिए जैसे ही अवसर प्राप्त हुआ समाज की शक्ति खुलकर सामने आ गई थी। 1977 का निर्वाचन इन नेताओं का निर्वाचन नहीं था, ये तो जनता का निर्वाचन था। उस डर के वातावरण में भी नेता बिना किसी भय के साहस के साथ जनता के बीच गए। नियोजित समय पर निर्वाचन हुआ और जनता ने उन्हें दिखा दिया कि तुम्हारा स्थान क्या है। इस देश का युवा वर्ग अपनी सूझ-बूझ के साथ खड़ा हुआ और काले कानून से मुक्त होते हुए मूल परम्पराओं के साथ चलना प्रारंभ किया।

आपातकाल की दो बड़ी सीख

ये घटना दो बातें सिखाती हैं। एक बात है कि कोई तानाशाह बनने की कोशिश करेगा ये भारत यहां का समाज कभी भी इसका सहन करने वाला नहीं। दूसरी बात आती है समाज के रक्त में लोकतंत्र-जनतंत्र है, ये भारत की हजारों वर्षों की परम्परा है, यहां सभी को मत रखने का अधिकार है। इस अधिकार को जो भी समाप्त करने की कोशिश करेगा, वह मिट्टी में मिलेगा, यही उसकी नियति है।

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