शिक्षा और स्वास्थ्य सबको सुलभ होना चाहिए : डॉ. मोहन भागवत जी
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शिक्षा और स्वास्थ्य सबको सुलभ होना चाहिए : डॉ. मोहन भागवत जी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने लखनऊ प्रवास क्रम में दूसरे दिन लखनऊ विश्वविद्यालय में आयोजित शोधार्थी संवाद में कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य मूलभूत अधिकार हैं, व्यवसाय नहीं। उन्होंने संघ के लक्ष्य, वैश्वीकरण, धर्म और पर्यावरण संरक्षण पर भी रखे विचार।

Written byलखनऊ ब्यूरोलखनऊ ब्यूरो
Feb 18, 2026, 04:52 pm IST
inभारत, उत्तर प्रदेश, संघ @100

लखनऊ । शिक्षा और स्वास्थ्य मूलभूत आवश्यकता है। यह व्यवसाय नहीं हो सकते। शिक्षा और स्वास्थ्य सबके लिए सुलभ होने चाहिए। ये बातें सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने बुधवार को लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय सभागार में आयोजित शोधार्थी संवाद कार्यक्रम में कहीं। उन्होंने कहा कि पश्चिम के लोगों ने शिक्षा के साथ खिलवाड़ किया। हमारी शिक्षा व्यवस्था हटाकर अपनी थोपी। जिससे उन्हें काम करने के लिए काले अंग्रेज मिल जाए। अंग्रेजों ने जो बिगाड़ा उसको ठीक करना होगा।

संघ का लक्ष्य भारत को परम वैभव सम्पन्न बनाना

उन्होंने कहा कि संघ का कार्य देश को परम वैभव सम्पन्न बनाना है। मैं और मेरा परिवार ही सबकुछ है, यह न सोच कर पूरे देश के लिए सोचना होगा। संघ समाज की एकता और गुणवत्ता की चिंता करता है। संघ को समझना है तो संघ के अंदर आकर कर देखिये। संघ को पढ़ कर नहीं समझा जा सकता है। संघ को सम्पूर्ण हिन्दू समाज को संगठित करने वाला एक ही काम करना है। संघ किसी के विरोध में नहीं है। संघ को लोकप्रियता, प्रभाव और शक्ति नहीं चाहिए।

शोध की बड़ी भूमिका महत्वपूर्ण

सरसंघचालक जी ने कहा कि भारत की दिशा और दशा बदलने में शोध की बड़ी भूमिका है। सत्य परक बातें सामने आनी चाहिए। अज्ञानता से भारत को हम समझ ही नहीं पाएंगे। उन्होने शोधार्थियों से कहा कि जो भी शोध करें उसे उत्कृष्ट रूप से, प्रामाणिकता पूर्वक, तन-मन-धन से, निःस्वार्थ भाव से देश के लिए करें। उन्होंने कहा कि संघ को लेकर बहुत दुष्प्रचार होता है। शोधार्थियों को सत्य सामने लाना चाहिए।

सभी क्षेत्रों में शक्तिशाली बनाना होगा

वैश्वीकरण पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि यह कोई बहुत बड़ी चुनौती नहीं है। आज वैश्वीकरण का मतलब बाजारीकरण से है, जो खतरनाक है। हम वसुधैव कुटुंबकम् की बात करते हैं। यानी पूरे विश्व को अपना परिवार मानते हैं। जब तक सब सुखी नहीं होंगे, एक व्यक्ति सुखी नहीं हो सकता है। इसलिए हमारा जीवन संयमित होना चाहिए, उपभोगवादी नहीं होना चाहिए। संयम, त्याग का जीवन हमारे संस्कृति आत्मबोध में है। पश्चिमी देशों ने जड़वाद फैलाया। उन देशों की सोच है कि बलशाली बनकर खुद जियो और बाकी को छोड़ दो, जो बाधक बने, उन्हें मिटा दो।यही काम आज अमेरिका, चीन कर रहे हैं। लेकिन आज दुनिया भर की समस्याओं के प्रश्नों का उत्तर भारत के पास है। विश्व गुरु बनना है तो सभी क्षेत्रों में शक्तिशाली बनना होगा। दुनिया तभी मानती है जब सत्य के पीछे शक्ति हो।

धर्म का स्वरूप शाश्वत है

उन्होंने कहा कि धर्म का शाश्वत स्वरूप सदैव प्रासंगिक है। सृष्टि जिन नियमों से चलती है, वह धर्म है। धूल का एक भी कण धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकता है। धर्म सबको सुख पहुंचाता है। हमारी सभी बातों में धर्म लागू है। आचरण धर्म, देश, काल के अनुसार बदलता रहता है। धर्म बताता है कि हमें अकेले नहीं सबके साथ जीना है।

पर्यावरण संरक्षण में योगदान दें

सरसंघचालक जी ने कहा कि पर्यावरण के प्रति हम लोगों को मित्र भाव से जीवन को जीना चाहिए । पेड़ लगाना, पानी बचाना, एकल प्लास्टिक का प्रयोग न करना जैसे कार्य पर्यावरण संरक्षण में सहायक हो सकते हैं। हमें आधुनिक तकनीक का भी पर्यावरण संरक्षण में उपयोग करना चाहिए।

Topics: RSS chief on education healthराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघLucknow University speech newsमोहन भागवतBhagwat on globalization and dharmaपर्यावरण संरक्षणRSS vision Bharat vaibhavलखनऊ विश्वविद्यालयशिक्षा नीतिवसुधैव कुटुंबकम्संघ विचारस्वास्थ्य व्यवस्थावैश्वीकरण बहसMohan Bhagwat statement Lucknow
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