राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष पर आयोजित हो रहे देशव्यापी कार्यक्रमों की अनवरत श्रृंखला में ‘हिंदू सम्मेलन’ समाज में एकता और बंधुता स्थापित करने की दिशा में एक सार्थक प्रयास है। ‘हिंदू सम्मेलन’ के अंतर्गत राष्ट्रीय स्तर पर 1 लाख से अधिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना है। देशव्यापी आयोजन को सफल बनाने में समाज के विभिन्न वर्गों – संत समाज, सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रबुद्ध जनों की भागीदारी सुनिश्चित की गई है। ये सभी वर्ग हिंदू समाज को सामाजिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक रूप से मजबूत करने में भूमिका निभाते आए हैं और हिंदू सम्मेलन इन सभी वर्गों को एकत्रित मंच प्रदान करेगा।
सामाजिक चुनौतियों की पहचान और समाधान की दिशा में पहल
‘हिंदू सम्मेलन’ का आयोजन समाज को एकजुट करने का ही नहीं वरन् हमारे समक्ष उपस्थित सामाजिक चुनौतियों की पहचान करने एवं उनका हल ढूंढने में सहयोगी होगा। हिंदू सम्मेलन समाज में जाति, भाषा अथवा क्षेत्र के स्तर पर व्याप्त भेद को पूरी तरह से समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है और इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हम सभी का आवश्यक सहयोग अपेक्षित है।
सनातन मूल्यों, परिवार संवर्धन और आत्मनिर्भरता पर चर्चा
इसके साथ कार्यक्रमों में सनातन मूल्यों के प्रचार-प्रसार, परिवार संवर्धन, नागरिक कर्तव्य एवं आत्मनिर्भरता जैसे बहुआयामी और अति आवश्यक पहलुओं पर भी गहन चर्चा की जा रही है।
युवा शक्ति, अध्ययन और सामाजिक सहभागिता
मंच से आधुनिक पीढ़ी को सनातन के गौरवशाली इतिहास और गरिमापूर्ण संस्कृति से जुड़े रहने के साथ निरंतर ज्ञानवर्धक अध्ययन हेतु भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। युवाओं को चाहिए कि वे समाज के अन्य वर्गों को भी मुख्यधारा में लाने का प्रयास करे। सोशल मीडिया का उपयोग इस कड़ी में प्रभावी साबित हो सकता है। इसके अतिरिक्त नियमित अंतराल पर संगोष्ठी, तीज – पर्वों पर स्नेह मिलन कार्यक्रमों का आयोजन भी समाज को एक सूत्र में पिरोने में सहयोगी हो सकता है।
नारी शक्ति और चरित्र निर्माण पर विशेष बल
साथ ही सम्मेलन, समाज में ‘नारी शक्ति’ की सक्रिय और सकारात्मक भूमिका पर भी बल दे रहा है। अल्पायु से ही बालक – बालिकाओं के सक्षम एवं सफल चरित्र निर्माण का रास्ता हमारी माताओं व बहनों द्वारा दी गई प्रारंभिक शिक्षा पर ही आश्रित होगा।
वैश्विक संदर्भ में हिंदू सम्मेलन की प्रासंगिकता
आज जब दुनिया पहले से कहीं अधिक वैश्विक तो हुई है लेकिन इसके साथ ही राष्ट्रों में आपसी टकराव एवं संघर्ष में भी बढ़ोतरी हुई है। पूरा विश्व असामयिक तनाव और आकस्मिक युद्ध की आशंका से चिंतित है। ऐसे समय में हिंदू सम्मेलनों का सफल आयोजन अपितु भारत में ही नहीं बल्कि विश्व शांति, सद्भाव, एकता और बंधुत्व का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
वसुधैव कुटुम्बकम् और वैश्विक नेतृत्व की भूमिका
एक राष्ट्र के रूप में भारत ने हमेशा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसे सार्वभौमिक सिद्धांत की परिकल्पना प्रस्तुत की है और ‘हिंदू सम्मेलन’ से उपजे विचारों के सहारे भारत निश्चित रूप से इस दिशा में वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभा सकता है.
















