बांग्लादेश में ‘जमात झटका’! : चुनाव नए, सरकार और नेता पुराने, यूनुस युग का अंत?
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बांग्लादेश में ‘जमात झटका’! : चुनाव नए, सरकार और नेता पुराने, यूनुस युग का अंत?

Jamaat-e-Islami Bangladesh, अल्पसंख्यक हिंसा, भारत-विरोध और अवामी लीग की गैरमौजूदगी के बीच चुनाव परिणामों का विश्लेषण।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by Shivam Dixit
Feb 15, 2026, 10:00 pm IST
in विश्व, विश्लेषण

बांग्लादेश में नए चुनाव हो गए हैं और मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार की विदाई तय हो गई है। इसके साथ ही सबसे महत्वपूर्ण है जमात का हारना एवं कथित छात्र आंदोलन के नेताओं की पार्टी का हारना। इन चुनाव परिणामों ने किसी को चौंकाया हो, ऐसा भी नहीं लगता है। हाँ, जमात को जिस प्रकार से प्रमोट किया जा रहा था और जिस प्रकार से यह कहा जा रहा था कि जमात के साथ शेख हसीना के समय में अन्याय हुआ है, आदि आदि और वही लोगों की पहली पसंद है, वह गुब्बारा फूट गया है।

शेख हसीना सरकार के बाद की स्थिति और अल्पसंख्यकों पर हिंसा

जब से शेख हसीना के नेतृत्व वाली सरकार को कथित क्रांति ने गिराया था और उसके बाद हिंदुओं एवं अन्य अल्पसंख्यकों के साथ हिंसा का जो नंगा नाच शुरू हुआ था, वह किसी से भी छिपा नहीं है। कैसे मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने लगातार पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया था और भारत का विरोध ही अपनी अंतरिम सरकार की गतिविधियों की धुरी बना दिया था। भारत और हिंदुओं का विरोध ही जैसे उस बांग्लादेश की पहचान बन गया था, जिस बांग्लादेश की अस्मिता का निर्माण भारत के ही सक्रिय सहयोग से हुआ था।

भारत विरोध और क्रिकेट विवाद का प्रसंग

भारत की निंदा ही नहीं बल्कि हाल ही में जिस प्रकार बांग्लादेश की क्रिकेट टीम के बहाने जो नाटक बांगलदेश ने किया वह यह दिखाने के लिए पर्याप्त है कि आखिर किस प्रकार से केवल और केवल भारत और हिन्दू विरोध ही उस देश की मुख्य पहचान बन गया है।

जमात का उदय, मीडिया नैरेटिव और वैश्विक छवि

जमात का नाटकीय उदय भी चिंता भर रहा था और मीडिया में जमात को स्वाभाविक विजेता माना जा रहा था। बांग्लादेश की वैश्विक छवि एक कट्टरपंथी मुल्क की बनती जा रही थी। एक ऐसे मुल्क के रूप में मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के दौर में उभरा, जिसमें माहिलाओं के पास कोई अधिकार नहीं थे, जिसमें अल्पसंख्यकों के पास कोई अधिकार नहीं थे।

बीएनपी, महिला नेतृत्व और चुनावी विडंबना

हालांकि बीएनपी को भी पाकिस्तान के निकट माना जाता है, परंतु वह जमात नहीं है, यह भी सत्य है। उस पार्टी का नेतृत्व हाल तक ही एक महिला के हाथों में था। हाँ, इस बार महिलाओं को लेकर यह चुनाव निराशाजनक रहा है, परंतु जिस मुल्क में अभी तक दो महिलाएं ही प्रधानमंत्री रही थीं, उस मुल्क में महिलाओं को राजनीति में टिकट ही बामुश्किल दिया गया, यह भी एक विडंबना ही रही। जमात के नेता ने जिस प्रकार चुनावों से पहले महिलाओं को लेकर जो पिछड़ा बयान दिया था, उससे भी बांग्लादेश की छवि को नुकसान पहुंचा और ऐसा प्रतीत हुआ कि लोकतंत्र की आड़ में बांग्लादेश एक ऐसे अंधे कुएं में जा रहा रहा है, जहां पर कम से कम महिलाओं के लिए तो केवल अंधेरा ही अंधेरा है।

महिलाओं पर बयान और सामाजिक दृष्टिकोण

और यह अंधेरा भी महिला होने के नाम पर पहचान पर है। जैसे महिलाओं को बच्चे पालने हैं, तो यह महत्वपूर्ण काम है राजनीति में वे कैसे आ पाएंगी आदि आदि! एक बयान यह भी आया कि अक्सर लोग महिलाओं का हिजाब हटा देते हैं, इसलिए महिलाओं को टिकट नहीं दिए गए।

कट्टरपंथी सोच और अंतर्राष्ट्रीय चिंता

महिलाओं को लेकर बहुत ही कट्टरपंथी और पिछड़े बयान दिए गए थे। जिन्हें सुनकर अंतर्राष्ट्रीय जगत में यह डर व्याप्त होता जा रहा था कि कहीं बांग्लादेश भी उन्हीं तत्वों के हाथों में न चला जाए, जो महिलाओं को केवल पर्दे में ही रखना चाहते हैं और जिनके लिए महिलाएं केवल और केवल बच्चे पैदा करने वाली मशीन हैं।

चुनाव टालने की रणनीति और अंतरिम सरकार का रुख

मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने जितना हो सका चुनाव टाला था। एक अनिर्वाचित सरकार चलाने का उनका काफी लंबा इरादा था। जिसे उन्होनें कई अवसरों पर कहा भी था। उन्होनें लगातार यह कहा था कि जब समय अनुकूल होगा और जब कथित सुधार पूरे हो जाएंगे। जब प्रशासनिक मशीनरी बदल जाएगी, तो चुनाव कराए जाएंगे।

राजनीतिक कैदियों की रिहाई और संविधान बदलाव की चर्चा

राजनीतिक कैदियों को स्वतंत्र कराने के बहाने कई कट्टरपंथी लोगों को भी मोहम्मद यूनुस ने रिहा किया। और मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार में एक नहीं कई बार उस संविधान को बदलने की बात हुई, जिसे शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व वाली सरकार ने बनाया था।

मुक्ति संग्राम, पाकिस्तान समर्थक तत्व और पहचान का विवाद

और इस संविधान का विरोध करने वाले वही तत्व थे, जिन्होनें बांगलदेश मुक्ति संग्राम में बांगलदेश निर्माण का विरोध किया था और पाकिस्तान का साथ दिया था।

शेख मुजीबुर्रहमान की विरासत और अवामी लीग पर प्रतिबंध

यह भी सभी ने देखा कि कैसे बांग्लादेश की उस पहचान का लगातार विरोध हुआ, जो पहचान भारत से जुड़ी हुई थी। शेख मुजीबुर्रहमान से जुड़ी हर निशानी को नष्ट कर दिया गया। स्मारक, स्मृति चिह्न, यहाँ तक कि अवकाश भी समाप्त कर दिए गए। उनके पुश्तैनी घर को भी जला दिया गया। और यहाँ तक कि उनकी पार्टी अवामी लीग को भी प्रतिबंधित कर दिया गया,। इन चुनावों में वह थी ही नहीं।

अवामी लीग का वोटर और चुनावी प्रश्न

ऐसे में प्रश्न उठता है कि जो अवामी लीग का वोटर था, क्या वह उस जमात को वोट दे सकता था, जो जमात बांग्लादेश की पूर्वी पाकिस्तान की पहचान का समर्थन कर रहा था? क्या हिन्दू जमात के साथ जा सकते थे या फिर बांग्लादेश का उदारवादी समाज और महिलाएं भी जमात के साथ जा सकते थे?

बीएनपी की जीत और राजनीतिक संकेत

ऐसे तमाम प्रश्नों के उत्तर इस जीत में मिल गए हैं, जो बीएनपी के हाथों में आई है। इस जीत ने कम से कम मोहम्मद यूनुस के जिहादी एजेंडे पर ब्रेक लगा दिया है और जमात के बहाने पाकिस्तानी आईएसआई को भी कहीं न कहीं आईना दिखा दिया है।

Topics: Muhammad Yunus interim government exitJamaat-e-Islami defeatBNP victory analysisbangladesh-india-relationsAwami League banminority violence BangladeshBangladesh election results
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