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mahashivratri: चेतना और ऊर्जा के परिणय से सृष्टि के आरंभ की दिव्य रात्रि है महाशिवरात्रि

"मैं न तो पृथ्वी हूँ, ना जल, ना अग्नि, ना वायु, ना आकाश और ना ही कोई पदार्थ, मैं इन्द्रिय भी नहीं हूँ, और ना ही मन,.. मैं शिव हूँ, चेतना का अविभाज्य सार"..।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Feb 15, 2026, 10:43 am IST
inधर्म-संस्कृति
भगवान शिव और माता पार्वती

भगवान शिव और माता पार्वती

महाशिवरात्रि में शिव-पार्वती का परिणय वस्तुतः चेतना और ऊर्जा का मिलन है,और यही रात्रि सृष्टि के आरंभ की रात्रि है। मूलतः आदि शक्ति ब्रम्ह का एकाकार स्वरूप, अर्धनारीश्वर के रूप में अभिव्यक्त, दो स्वरूपों में पृथक चेतना-निर्गुण-शिव और ऊर्जा-सगुण-पार्वती का अद्वैत होना ही महाशिवरात्रि है। द्वैत से अद्वैत की समझ ही जीवन का अंतिम रहस्य है। यही सत्य है, यही सुंदर है, यही शिव है, यही चेतना है, यही ब्रम्ह है। इसीलिये सनातन धर्म सत्य और शाश्वत है।

 


अद्वैत, आदि शंकराचार्य ने सरलतम रूप से अभिव्यक्त किया है कि मैं क्या हूँ?

“मैं न तो पृथ्वी हूँ, ना जल, ना अग्नि, ना वायु, ना आकाश और ना ही कोई पदार्थ, मैं इन्द्रिय भी नहीं हूँ, और ना ही मन,.. मैं शिव हूँ, चेतना का अविभाज्य सार”..।

रात्रि शब्द सिद्धि का प्रतीक माना जाता है, इसलिए भारत में रात्रि का विशेष महत्व है।भारतीय पर्वों के मूल में आध्यात्मिक चेतना के साथ वैज्ञानिकता उसके मूल में निहित है। वैज्ञानिक तथ्य है कि दिन में अन्य तरंगों के कारण ध्वनि तरंगों में अवरोध उत्पन्न होता है इसलिए रात्रि काल में उपासना पर विशेष रूप से भारतीय मनीषियों ने बल दिया है।

सृजन की प्रक्रिया ही रहस्यमय है क्योंकि सृजन का बीज अंधेरे में फूटता है, उजाले में नहीं। चेतना का अस्तित्व मन की अतल गहराईयों के अंधकार में होता है। समाधि का जन्म, ध्यान का जन्म भी अंधकार में होता है, यहां गहन अंधकार का अर्थ है जहाँ बुद्धि का प्रकाश जरा भी नहीं पहुँचता।

महाशिवरात्रि, नवरात्र, दीपावली और होली जैसे अधिकांश पर्व में पूजा रात्रि में ही होती है, ताकि ध्वनि की तरंगों का ठीक प्रकार से विस्तार हो। मंत्र, तंत्र और यंत्र के साथ विभिन्न वाद्य यंत्रों और शंख बजाकर वातावरण को न केवल रोगाणु मुक्त किया जाता है वरन् अपकारी शक्तियों के साथ आसुरी प्रवृत्तियों का भी शमन भलीभाँति होता है।

भारतीय अवधारणा में हिरण्यगर्भ,जिसे पाश्चात्य विज्ञान बिग बैंग के रूप में समझता है, तद्नुसार क्वांटम फिजिक्स के आलोक में जड़ – चेतन की ही व्याख्या करता है। वह शिव-शक्ति का अद्वैत है,जो चेतना के रूप में विद्यमान है।

यजुर्वेद में स्पष्ट है कि ‘यद् पिण्डे, तद् ब्रम्हाण्डे’। इसी के परिप्रेक्ष्य में भौतिकी में अल्बर्ट आइंस्टीन ने भी अपने द्रव्य – ऊर्जा समीकरण (E=mc2) के माध्यम से अद्वैत की पुष्टि की है। ऊर्जा से ही सब गतिमान हैं। आंध्र ऊर्जा (डार्क एनर्जी )और आंध्र पदार्थ(डार्क मैटर) के संबंध में भी यही अवधारणा है। विज्ञान में पदार्थ और ऊर्जा का अध्ययन वास्तव में शिव-पार्वती का ही अन्वेषण है।

यह भी स्पष्ट है कि मूर्ति पूजा हमारे यहां प्रतीकात्मक है, यजुर्वेद कहता है कि
“ना तस्य प्रतिमा अस्ति”।

बौद्धों के पूर्व मूर्ति पूजा शिरोधार्य नहीं थी वरन् आकृतियों का निर्माण कर पूजा की गई है,जैसे शिवलिंग, शालिग्राम और पिंडी का पूजन। देवी के लिए पिंडी पूजन क्योंकि वह गर्भ का द्योतक है।

ईश्वास्योपनिषद के शांति पाठ में स्पष्ट है कि

” ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते..पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।”

जिसका अर्थ है,वह भी पूर्ण है और यह जगत् भी पूर्ण है, पूर्ण से पूर्ण प्रकट होता है, और फिर भी पूर्ण शेष बचता है, पूर्ण से पूर्ण निकल जाए फिर भी पूर्ण शेष बचे, वही ईश्वर है, वही ब्रम्ह है, वही शिव हैं।।

दुनिया में विविध धर्म हैं, परन्तु शायद ही इनके अधिष्ठाताओं ने नारी शक्ति को अभिव्यक्त किया हो। शक्ति के दो स्वरूपों के मधुर मिलन की रात्रि पर विश्व कल्याण निहित है। वहीं दूसरी ओर जनजातीय अवधारणा – जय सेवा, जय बड़ा देव,जोहार,सेवा जोहार -का मूल-कोयापुनेम अर्थात् मानव धर्म और प्रकृति की शाश्वतता, में निहित है, जो “वसुधैव कुटुम्बकम् ” के रुप में भारतीय संस्कृति में शिरोधार्य है।

विश्व में भारत से ही जनजाति समाज का आरंभ हुआ और उनके हमारे आदि देव एक ही हैं, अर्थात् अद्वैत है। हमारा मूल एक ही है,बड़ा देव ही महादेव हैं, इसलिए विघटनकारी तत्वों की बाँटने की कोशिश सफल नहीं होगी। जनजातियों में “शम्भू महादेव दूसरे शब्दों में शम्भू शेक के आलोक में महादेव की 88 पीढ़ियों का उल्लेख मिलता है – प्रथम-शंभू-मूला, द्वितीय-शंभू-गौरा और अंतिम शंभू-पार्वती ही हैं”। शंभू मादाव का अपभ्रंश – महादेव ही है।

महाशिवरात्रि को सृष्टि का आरंभ का होता है, क्योंकि आज के दिन ही प्रकाश स्तंभ लिंग, अग्नि स्तंभ लिंग, उर्जा स्तंभ लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ लिंग से सृष्टि का शुभारंभ होता है। विज्ञान भी इसी सिद्धांत के आलोक में आगे बढ़ता है,फलस्वरूप विश्व के निर्माण की बिग बैंग थ्योरी तथा डमरू से दोलन सिद्धांत अर्थात् पल्सेटिंग थ्योरी का जन्म हुआ।

शिव ही सृष्टि है,शिव में ही सृष्टि है, वही ब्रह्म हैं ! ऋग्वेद की सृष्टि के सृजन के रहस्य का विकास शिव में ही निहित हो जाता है।

“सृष्टि से पहले सत् नहीं था, असत् भी नहीं,
अंतरिक्ष भी नहीं था,
आकाश भी नहीं,
छिपा था क्या कहाँ,
किसने देखा था,
उस पल तो अगम,
अटल जल भी कहाँ था “…
सृष्टि का कौन है कर्ता,
कर्ता है व अकर्ता,
ऊँचे आकाश में रहता,
सदा अध्यक्ष बना रहता,
वही सचमुच में जानता,
या नहीं भी जानता,
है किसी को नहीं पता,
नहीं है पता,…

वो था हिरण्यगर्भ सृष्टि से पहले विद्यमान,
वही तो सारे भूत जगत का स्वामी महान्,
जो है अस्तित्व में धरती आसमान धारण कर,
ऐंसे किस देवता की उपासना करें हम हवि देकर…

जिस के बल पर तेजोमय है अम्बर,
पृथ्वी हरी भरी स्थापित स्थिर,
स्वर्ग और सूरज भी स्थिर,
गर्भ में अपने अग्नि धारण कर पैदा कर,
व्यापा था जल इधर-उधर नीचे ऊपर,
जगा चुके वो एकमेव प्राण बनकर किस देवता की उपासना करें हवि देकर,
ओऽम! सृष्टि निर्माता स्वर्ग रचियता पूर्वज रक्षा कर,
सत्य धर्म पालक अतुल जल नियामक रक्षा कर,
फैली हैं दिशायें बाहू जैंसी उसकी सब में सब पर,
ऐंसे ही देवता की उपासना करें हम हवि देकर…

ऐसे ही देवता की उपासना करें हम हवि देकर “ऐसे ही देवता की उपासना करें हवि देकर” का तात्पर्य वस्तुतः ब्रम्ह अर्थात् शिव से ही है तब यही था शिवलिंग, यही पिंडी पूजन का निहितार्थ है। यहीं हिरण्यगर्भ से सृष्टि का निर्माण हुआ। विश्व के निर्माण का मूलाधार शिवलिंग है।

वस्तुतः ॐ वेदों में ब्रह्म के रूप में ब्रह्मांड की ध्वनि का द्योतक होकर अभिव्यक्त है, और अनुसंधान में ॐ की व्युत्पत्ति भगवान् शिव के श्रीमुख हुई है। इसलिए बीज मंत्र “ॐ नमः शिवाय” है। ॐ ही ब्रह्म का नाद है, जो उसके अस्तित्व की ध्वनि के रुप अभिव्यक्ति है।

ॐ की ध्वनि स्वयं में शाश्वत है, इसके बिना संपूर्ण ब्रह्मांड अधूरा है। अगर मंत्रोच्चारण करते समय ॐ की ध्वनि उच्चारित न की जाए तो मंत्रोच्चारण अधूरा रहता है। इसका नाद सभी से अलग विशेष है, जब आप ध्यान की चरम अवस्था में पहुंचते हैं, तब आपको ॐ की ध्वनि स्वयं सुनाई देने लगती है।

ॐ भगवान शिव का पर्याय है, उनका प्रतीक है, ॐ की ध्वनि शांत भी है और तीव्र भी है। ॐ का महत्व शब्दों में नहीं पिरोया जा सकता है, केवल इसकी अनुभूति की जा सकती है। ओ, उ, और म, तीन अक्षरों से बने ॐ की महिमा अपार है। यह तीनों देवों ब्रह्मा, विष्णु, महेश के साथ तीनों लोकों का भी प्रतीक है। शास्त्रों में ॐ की ध्वनि के सौ से भी अधिक अर्थ विभिन्न संदर्भों में शिरोधार्य हैं।

महाशिवरात्रि की दिव्य रात्रि चेतना और ऊर्जा के अद्वैत को आत्मसात कर,जीवन को सार्थक बनाने की अलौकिक रात है।वहीं अखंड मंडलाकार बृहद ब्रम्हांड का आकार शिव लिंग सदृश्य है,अतः सम्पूर्ण सृष्टि का कल्याण एवं विकास भगवान् शिव की आराधना में समाहित है। “ॐ नमः शिवाय” बीज मंत्र है।

‘ॐ नमः शिवाय-जय बड़ा देव-जय महादेव “

 

Topics: Mahashivratriमहाशिवरात्रि का महत्वmaha shivaratri 2026shivratri images 2026beautiful mahashivratri images
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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