महाशिवरात्रि में शिव-पार्वती का परिणय वस्तुतः चेतना और ऊर्जा का मिलन है,और यही रात्रि सृष्टि के आरंभ की रात्रि है। मूलतः आदि शक्ति ब्रम्ह का एकाकार स्वरूप, अर्धनारीश्वर के रूप में अभिव्यक्त, दो स्वरूपों में पृथक चेतना-निर्गुण-शिव और ऊर्जा-सगुण-पार्वती का अद्वैत होना ही महाशिवरात्रि है। द्वैत से अद्वैत की समझ ही जीवन का अंतिम रहस्य है। यही सत्य है, यही सुंदर है, यही शिव है, यही चेतना है, यही ब्रम्ह है। इसीलिये सनातन धर्म सत्य और शाश्वत है।

अद्वैत, आदि शंकराचार्य ने सरलतम रूप से अभिव्यक्त किया है कि मैं क्या हूँ?
“मैं न तो पृथ्वी हूँ, ना जल, ना अग्नि, ना वायु, ना आकाश और ना ही कोई पदार्थ, मैं इन्द्रिय भी नहीं हूँ, और ना ही मन,.. मैं शिव हूँ, चेतना का अविभाज्य सार”..।
रात्रि शब्द सिद्धि का प्रतीक माना जाता है, इसलिए भारत में रात्रि का विशेष महत्व है।भारतीय पर्वों के मूल में आध्यात्मिक चेतना के साथ वैज्ञानिकता उसके मूल में निहित है। वैज्ञानिक तथ्य है कि दिन में अन्य तरंगों के कारण ध्वनि तरंगों में अवरोध उत्पन्न होता है इसलिए रात्रि काल में उपासना पर विशेष रूप से भारतीय मनीषियों ने बल दिया है।
सृजन की प्रक्रिया ही रहस्यमय है क्योंकि सृजन का बीज अंधेरे में फूटता है, उजाले में नहीं। चेतना का अस्तित्व मन की अतल गहराईयों के अंधकार में होता है। समाधि का जन्म, ध्यान का जन्म भी अंधकार में होता है, यहां गहन अंधकार का अर्थ है जहाँ बुद्धि का प्रकाश जरा भी नहीं पहुँचता।

महाशिवरात्रि, नवरात्र, दीपावली और होली जैसे अधिकांश पर्व में पूजा रात्रि में ही होती है, ताकि ध्वनि की तरंगों का ठीक प्रकार से विस्तार हो। मंत्र, तंत्र और यंत्र के साथ विभिन्न वाद्य यंत्रों और शंख बजाकर वातावरण को न केवल रोगाणु मुक्त किया जाता है वरन् अपकारी शक्तियों के साथ आसुरी प्रवृत्तियों का भी शमन भलीभाँति होता है।
भारतीय अवधारणा में हिरण्यगर्भ,जिसे पाश्चात्य विज्ञान बिग बैंग के रूप में समझता है, तद्नुसार क्वांटम फिजिक्स के आलोक में जड़ – चेतन की ही व्याख्या करता है। वह शिव-शक्ति का अद्वैत है,जो चेतना के रूप में विद्यमान है।
यजुर्वेद में स्पष्ट है कि ‘यद् पिण्डे, तद् ब्रम्हाण्डे’। इसी के परिप्रेक्ष्य में भौतिकी में अल्बर्ट आइंस्टीन ने भी अपने द्रव्य – ऊर्जा समीकरण (E=mc2) के माध्यम से अद्वैत की पुष्टि की है। ऊर्जा से ही सब गतिमान हैं। आंध्र ऊर्जा (डार्क एनर्जी )और आंध्र पदार्थ(डार्क मैटर) के संबंध में भी यही अवधारणा है। विज्ञान में पदार्थ और ऊर्जा का अध्ययन वास्तव में शिव-पार्वती का ही अन्वेषण है।
यह भी स्पष्ट है कि मूर्ति पूजा हमारे यहां प्रतीकात्मक है, यजुर्वेद कहता है कि
“ना तस्य प्रतिमा अस्ति”।
बौद्धों के पूर्व मूर्ति पूजा शिरोधार्य नहीं थी वरन् आकृतियों का निर्माण कर पूजा की गई है,जैसे शिवलिंग, शालिग्राम और पिंडी का पूजन। देवी के लिए पिंडी पूजन क्योंकि वह गर्भ का द्योतक है।

ईश्वास्योपनिषद के शांति पाठ में स्पष्ट है कि
” ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते..पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।”
जिसका अर्थ है,वह भी पूर्ण है और यह जगत् भी पूर्ण है, पूर्ण से पूर्ण प्रकट होता है, और फिर भी पूर्ण शेष बचता है, पूर्ण से पूर्ण निकल जाए फिर भी पूर्ण शेष बचे, वही ईश्वर है, वही ब्रम्ह है, वही शिव हैं।।
दुनिया में विविध धर्म हैं, परन्तु शायद ही इनके अधिष्ठाताओं ने नारी शक्ति को अभिव्यक्त किया हो। शक्ति के दो स्वरूपों के मधुर मिलन की रात्रि पर विश्व कल्याण निहित है। वहीं दूसरी ओर जनजातीय अवधारणा – जय सेवा, जय बड़ा देव,जोहार,सेवा जोहार -का मूल-कोयापुनेम अर्थात् मानव धर्म और प्रकृति की शाश्वतता, में निहित है, जो “वसुधैव कुटुम्बकम् ” के रुप में भारतीय संस्कृति में शिरोधार्य है।
विश्व में भारत से ही जनजाति समाज का आरंभ हुआ और उनके हमारे आदि देव एक ही हैं, अर्थात् अद्वैत है। हमारा मूल एक ही है,बड़ा देव ही महादेव हैं, इसलिए विघटनकारी तत्वों की बाँटने की कोशिश सफल नहीं होगी। जनजातियों में “शम्भू महादेव दूसरे शब्दों में शम्भू शेक के आलोक में महादेव की 88 पीढ़ियों का उल्लेख मिलता है – प्रथम-शंभू-मूला, द्वितीय-शंभू-गौरा और अंतिम शंभू-पार्वती ही हैं”। शंभू मादाव का अपभ्रंश – महादेव ही है।
महाशिवरात्रि को सृष्टि का आरंभ का होता है, क्योंकि आज के दिन ही प्रकाश स्तंभ लिंग, अग्नि स्तंभ लिंग, उर्जा स्तंभ लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ लिंग से सृष्टि का शुभारंभ होता है। विज्ञान भी इसी सिद्धांत के आलोक में आगे बढ़ता है,फलस्वरूप विश्व के निर्माण की बिग बैंग थ्योरी तथा डमरू से दोलन सिद्धांत अर्थात् पल्सेटिंग थ्योरी का जन्म हुआ।

शिव ही सृष्टि है,शिव में ही सृष्टि है, वही ब्रह्म हैं ! ऋग्वेद की सृष्टि के सृजन के रहस्य का विकास शिव में ही निहित हो जाता है।
“सृष्टि से पहले सत् नहीं था, असत् भी नहीं,
अंतरिक्ष भी नहीं था,
आकाश भी नहीं,
छिपा था क्या कहाँ,
किसने देखा था,
उस पल तो अगम,
अटल जल भी कहाँ था “…
सृष्टि का कौन है कर्ता,
कर्ता है व अकर्ता,
ऊँचे आकाश में रहता,
सदा अध्यक्ष बना रहता,
वही सचमुच में जानता,
या नहीं भी जानता,
है किसी को नहीं पता,
नहीं है पता,…
वो था हिरण्यगर्भ सृष्टि से पहले विद्यमान,
वही तो सारे भूत जगत का स्वामी महान्,
जो है अस्तित्व में धरती आसमान धारण कर,
ऐंसे किस देवता की उपासना करें हम हवि देकर…
जिस के बल पर तेजोमय है अम्बर,
पृथ्वी हरी भरी स्थापित स्थिर,
स्वर्ग और सूरज भी स्थिर,
गर्भ में अपने अग्नि धारण कर पैदा कर,
व्यापा था जल इधर-उधर नीचे ऊपर,
जगा चुके वो एकमेव प्राण बनकर किस देवता की उपासना करें हवि देकर,
ओऽम! सृष्टि निर्माता स्वर्ग रचियता पूर्वज रक्षा कर,
सत्य धर्म पालक अतुल जल नियामक रक्षा कर,
फैली हैं दिशायें बाहू जैंसी उसकी सब में सब पर,
ऐंसे ही देवता की उपासना करें हम हवि देकर…
ऐसे ही देवता की उपासना करें हम हवि देकर “ऐसे ही देवता की उपासना करें हवि देकर” का तात्पर्य वस्तुतः ब्रम्ह अर्थात् शिव से ही है तब यही था शिवलिंग, यही पिंडी पूजन का निहितार्थ है। यहीं हिरण्यगर्भ से सृष्टि का निर्माण हुआ। विश्व के निर्माण का मूलाधार शिवलिंग है।

वस्तुतः ॐ वेदों में ब्रह्म के रूप में ब्रह्मांड की ध्वनि का द्योतक होकर अभिव्यक्त है, और अनुसंधान में ॐ की व्युत्पत्ति भगवान् शिव के श्रीमुख हुई है। इसलिए बीज मंत्र “ॐ नमः शिवाय” है। ॐ ही ब्रह्म का नाद है, जो उसके अस्तित्व की ध्वनि के रुप अभिव्यक्ति है।
ॐ की ध्वनि स्वयं में शाश्वत है, इसके बिना संपूर्ण ब्रह्मांड अधूरा है। अगर मंत्रोच्चारण करते समय ॐ की ध्वनि उच्चारित न की जाए तो मंत्रोच्चारण अधूरा रहता है। इसका नाद सभी से अलग विशेष है, जब आप ध्यान की चरम अवस्था में पहुंचते हैं, तब आपको ॐ की ध्वनि स्वयं सुनाई देने लगती है।
ॐ भगवान शिव का पर्याय है, उनका प्रतीक है, ॐ की ध्वनि शांत भी है और तीव्र भी है। ॐ का महत्व शब्दों में नहीं पिरोया जा सकता है, केवल इसकी अनुभूति की जा सकती है। ओ, उ, और म, तीन अक्षरों से बने ॐ की महिमा अपार है। यह तीनों देवों ब्रह्मा, विष्णु, महेश के साथ तीनों लोकों का भी प्रतीक है। शास्त्रों में ॐ की ध्वनि के सौ से भी अधिक अर्थ विभिन्न संदर्भों में शिरोधार्य हैं।
महाशिवरात्रि की दिव्य रात्रि चेतना और ऊर्जा के अद्वैत को आत्मसात कर,जीवन को सार्थक बनाने की अलौकिक रात है।वहीं अखंड मंडलाकार बृहद ब्रम्हांड का आकार शिव लिंग सदृश्य है,अतः सम्पूर्ण सृष्टि का कल्याण एवं विकास भगवान् शिव की आराधना में समाहित है। “ॐ नमः शिवाय” बीज मंत्र है।
‘ॐ नमः शिवाय-जय बड़ा देव-जय महादेव “

















