आसमान में सुराख हो सकता है-यह बात अब कहावत भर नहीं रह गई। केंद्र और राज्य सरकार ने मिलकर इसे चरितार्थ कर दिखाया है। छत्तीसगढ़ में ‘राज्य प्रायोजित लाल आतंक’ अब अपने अंत की ओर बढ़ रहा है। नक्सलवाद के खिलाफ आर-पार की निर्णायक लड़ाई जारी है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बस्तर पंडुम-2026 के समापन समारोह में दोहराया कि 31 मार्च, 2026 तक देशभर से माओवाद का समूल समापन कर दिया जाएगा। इस बार उनकी इस बात पर किसी के मन में संशय नहीं था। उन्होंने कहा कि जिस समय माओवाद का प्रादुर्भाव हुआ, उसी दौर में देश में सौ से अधिक जिले ऐसे थे, जो बस्तर से भी अधिक पिछड़े थे। इसलिए यह कहना उचित नहीं कि माओवाद केवल पिछड़ेपन या विकास के अभाव की देन है, बल्कि यह एक हिंसक विचारधारा की उपज है, जिसने परिस्थितियों का लाभ उठाकर जड़ें जमाईं। कांग्रेस सरकार ने राज्य में माओवादी आंदोलन को प्रोत्साहन दिया। इसमें कोई संशय नहीं होना चाहिए।
छत्तीसगढ़ में 2024 में भाजपा की सरकार बनने के साथ ही माओवादियों के विरुद्ध स्पष्ट और निर्णायक अभियान शुरू किया गया। केंद्र और राज्य, दोनों स्तरों पर जब साझा राजनीतिक इच्छाशक्ति एक साथ सक्रिय हुई, तो उसका असर जमीन पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा।
2024-25 के दौरान कई बड़ी घटनाएं और मुठभेड़ें हुईं, किंतु परिणामों की दिशा बदलती नजर आई। एक ओर बलिदान होने वाले जवानों की संख्या नगण्य स्तर पर सिमटने लगी, तो दूसरी ओर बड़ी संख्या में माओवादी मारे गए। 2025 के आंकड़ों पर ही नजर डालें, तो स्पष्ट हो जाता है कि किस प्रकार सुनियोजित रणनीति के तहत माओवाद का उन्मूलन किया जा रहा है।

नक्सल उन्मूलन अभियान
2025 में सुरक्षाबलों और माओवादियों के बीच 99 मुठभेड़ हुई, जिनमें 256 माओवादी मारे गए। प्रभावी प्रतिकार रणनीति ने नक्सली अभियानों में हताहत होने वाले सुरक्षाकर्मियों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है। 2025 में मात्र 23 जवान बलिदान हुए। पहले यह संख्या सैकड़ों में होती थी। केंद्र-राज्य समन्वय, अबूझमाड़ में गहन पैठ और आक्रामक कार्रवाइयों ने माओवादियों की कमर तोड़ दी है। माओवादियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराने और प्रशासन पर दबाव बनाने के उद्देश्य से 46 निर्दोष नागरिकों की हत्या की। इसी अवधि में 884 माओवादी गिरफ्तार किए गए, जबकि 1,562 ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया। सुरक्षाबलों ने विभिन्न अभियानों तथा आत्मसमर्पण की प्रक्रियाओं के दौरान 645 हथियार और 875 आईईडी बरामद किए। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि नक्सल उन्मूलन अभियान सही दिशा में आगे बढ़ रहा है।
2026 के आते-आते यह लगभग स्पष्ट हो गया कि ‘पशुपति से तिरुपति’ का सपना देखने वालों को भारत की एक इंच भूमि भी प्राप्त नहीं होगी। उनके अस्तित्व के अंत की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है, जिसका निर्णायक क्षण इसी वर्ष 31 मार्च को प्रतिध्वनित होगा। इसी संदर्भ में गृह मंत्री अमित शाह ने अपने संबोधन में कहा, “जो बस्तर कुछ वर्ष पहले नक्सलियों के भय से सहमा रहता था, जहां मोर्टार के गोले, बंदूकों की गोलियां और आईईडी के धमाके हमारे वनवासी भाई-बहनों में डर पैदा करते थे, आज उसी बस्तर में 55,000 लोगों ने खान-पान, गीत, नृत्य, नाटक, वेशभूषा, परंपरा और वन-औषधि सहित 12 विधाओं के माध्यम से यहां की संस्कृति को पुनर्जीवित करने का कार्य किया है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण परिवर्तन है।” निस्संदेह, बस्तर संभाग के सात जिलों, 1,885 ग्राम पंचायतों और 32 जनपद मुख्यालयों से आए 55,000 प्रतिभागियों के बीच गृहमंत्री का यह संदेश एक ओर ‘लाल आतंक’ की समाप्ति का संकेत है, तो दूसरी ओर नए परिवर्तन की दिशा और दशा भी स्पष्ट करता है।
ऐसा होगा भविष्य का बस्तर
गृह मंत्री का वक्तव्य माओवाद उन्मूलन के बाद बस्तर के विकास का एक स्पष्ट रोडमैप भी प्रस्तुत करता है। उन्होंने कहा कि अगले पांच वर्ष में सभी वनवासी क्षेत्रों में बस्तर को सबसे विकसित क्षेत्र बनाया जाएगा। उनके भाषण से 31 मार्च के बाद के बस्तर की जो तस्वीर उभरती है, उसे निम्न बिंदुओं में समझा जा सकता है—
- बस्तर की पहचान अब बारूद से नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध संस्कृति और विरासत से होगी। नक्सल भय समाप्त होने के बाद कई ऐसे गांव हैं, जहां चार दशक बाद राष्ट्रध्वज तिरंगा फहराया गया है।
- नई पर्यटन गतिविधियों के माध्यम से बस्तर को रोजगार के अवसरों से समृद्ध किया जाएगा। एडवेंचर टूरिज्म, होम-स्टे, कैनोपी वॉक और ग्लास ब्रिज जैसी पर्यटन की नई विधाएं विकसित की जाएंगी।
- बंद पड़े प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, अस्पताल और स्कूल दोबारा शुरू किए जाएंगे। साथ ही हायर सेकेंडरी स्कूल और कॉलेजों की स्थापना भी की जाएगी।
- मोबाइल टावर लगाए जा रहे हैं और गांवों को जोड़ने वाली सड़कों का निर्माण किया जा रहा है। हर पांच किलोमीटर पर पोस्ट ऑफिस या बैंक शाखा खोलने की योजना है।
- हर वनवासी का धान 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से खरीदा जाएगा तथा प्रति व्यक्ति प्रति माह पांच किलो अनाज निःशुल्क दिया जाएगा।
- पंचायत, जनपद (तहसील) पंचायत और जिला पंचायत में केवल चुने हुए प्रतिनिधि ही नेतृत्व करेंगे।
- बस्तर में 118 एकड़ में नया औद्योगिक क्षेत्र और ऑटो-गिग (या ऑटोमोबाइल/औद्योगिक) क्षेत्र विकसित किया जा रहा है, जिससे वनवासी युवाओं को रोजगार मिलेगा।
- 3,500 करोड़ की लागत से रावघाट-जगदलपुर रेल परियोजना का कार्य प्रारंभ हो चुका है।
- 90,000 से अधिक युवाओं को विभिन्न व्यवसायों के प्रशिक्षण और मूल्यांकन की प्रक्रिया से जोड़ा जा रहा है।
- 36 करोड़ रुपये की लागत से इंद्रावती नदी पर नई सिंचाई योजना लाई जाएगी, जिससे 120 मेगावाट बिजली उत्पादन की भी संभावना है।
बोलते आंकड़े
l 2025 में 256 नक्सली मारे गए, 884 गिरफ्तार और 1562 ने आत्मसमर्पण किया।
l 2004 से 2014 के बीच नक्सली हिंसा की कुल 16,463 घटनाएं दर्ज की गई थीं।
l 2014 से 2024 के बीच हिंसक घटनाओं की संख्या 53 प्रतिशत घटकर 7,744 रह गईं।
l 1851 से 73 प्रतिशत घटकर 509 रह गई इस अवधि में बलिदान होने वाले जवानों की संख्या।
l 70 प्रतिशत कमी आई नागरिकों की मृत्यु में, इस अवधि में यह संख्या 4766 से 1495 रह गई।
l 2014 तक कुल 66 फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशन थे, जो 10 वर्ष में बढ़कर 612 हो गईं।
l 2014 में देश में 126 जिले नक्सल प्रभावित थे, 2024 में सर्वाधिक प्रभावित जिले 12 रह गए।
l 5 वर्ष में कुल 302 नए सुरक्षा शिविर और 68 नाइट लैंडिंग हेलीपैड्स बनाए गए।
टूटती कमर
l 16 अप्रैल, 2024 : कांकेर के छोटेबेठिया में 29 नक्सली मारे गए, इनमें 25 लाख का इनामी शंकर भी था।
l 9 फरवरी, 2025 : बीजापुर में नक्सल विरोधी कार्रवाई में सबसे बड़ी सफलता, 31 नक्सली मारे गए।
l 16 जनवरी, 2025: बीजापुर-सुकमा में 18 और 20 जनवरी को गरियाबंद में 16 नक्सली मारे गए।
l जनवरी-फरवरी, 2026 : पूरे देश में 150-200 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया। 30-50 नक्सली मारे गए।
l चुनिंदा शीर्ष नक्सलियों सहित मात्र 300-400 हथियारबंद नक्सली टुकड़ियों में बंट कर भटक रहे जंगलों में।
सटीक रणनीति और सुदृढ़ समन्वय
बस्तर में संभावित परिवर्तनों का विश्लेषण करने से पहले यह देखना आवश्यक है कि अब तक कौन-से प्रमुख बदलाव घटित हो चुके हैं। लंबे समय तक माओवादियों के बीच यह धारणा बनी रही कि अबूझमाड़ की लड़ाई सबसे अंत में लड़ी जाएगी। किंतु सुरक्षाबलों ने देशभर में संचालित नक्सल उन्मूलन अभियानों के समानांतर इस दुर्गम वन क्षेत्र में भी अपने अभियान क्रमशः सघन कर दिए। बदली हुई रणनीति के तहत जिस क्षेत्र को अंतिम युद्धक्षेत्र माना जा रहा था, वहीं से निर्णायक पहल की गई।
अत्यंत आक्रामक रणनीति और सुदृढ़ आपसी समन्वय के साथ सीआरपीएफ, एसटीएफ, बीएसएफ, बस्तर बटालियन, बस्तर फाइटर्स तथा डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड जैसे विभिन्न सुरक्षाबलों ने माओवाद की रीढ़ पर प्रहार करने के उद्देश्य से अबूझमाड़ के भीतर गहरी पैठ बना ली। पिछले डेढ़ वर्ष के आंकड़ों पर दृष्टि डालें तो माओवादी संगठन के शीर्ष नेतृत्व को गंभीर क्षति पहुंची है। शीर्ष माओवादी नेता वसवराजू मारा गया तथा संगठन के तथाकथित ‘पोस्टर बॉय’ माड़वी हिड़मा को भी मार गिराया गया। पिछले अठारह महीनों में कई प्रमुख माओवादी मारे गए हैं।
माओवादियों का महाराष्ट्र–मध्यप्रदेश–छत्तीसगढ़ (एमएमसी) जोन पूरी तरह समाप्त हो चुका है। उत्तर बस्तर और माड़ डिवीजन से भी नक्सलियों का लगभग सफाया हो गया है। दक्षिण बस्तर के जंगलों में पापाराव अपने साथियों के साथ अलग-अलग टुकड़ियों में छिपा हुआ है, जबकि मिसिर बेसरा झारखंड में है।

बीते 18 माह में मारे गए प्रमुख माओवादी
वसवाराजू, चलपति (जयराम), प्रयाग माझी (विवेक), माड़वीहिडमा, नरसिम्हा चालम(गौतम), गजरला रवि, मोडेम बालकृष्णन(भास्कर), सहदेव सोरेन (प्रयाग), कट्टा रामचंद्र रेड्डी (राजू), कादरी सत्यनारायण रेड्डी (कोसा), माड़वीहिड़मा (संतोष), गणेश उइके, सुधीर (सुधाकर), रेणुका (भानु), जंगू नवीन (मधु), मुंडूगुला भास्कर राव, रणधीर, नीति (निर्मला), रूपेश, जोगन्ना, दसरू राजे।
संगठन में पद
महासचिव, पोलित ब्यूरो (शीर्ष नेतृत्व)
सेंट्रल कमेटी के सदस्य– सेंट्रल कमेटी भाकपा (माओवादी) की पोलित ब्यूरो/महासचिव पद के पश्चात् सबसे ऊंची इकाई है।
सेंट्रल कमेटी के सदस्य– ये माओवादी संगठन के मस्तिष्क, कमांड और नियंत्रणतीनों की भूमिका निभाते हैं। नीति बनाते हैं, युद्ध चलाते हैं और पूरे नेटवर्क को निर्देशित करते हैं।
दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी सदस्य– यह माओवादी संगठन में दंडकारण्य क्षेत्र का शीर्ष रणनीतिक व सैन्य नेतृत्व स्तर है।इस पद के कैडरों का कार्य सैन्य गतिविधियों का संचालन, संगठन विस्तार, कैडर प्रबंधन, हथियार/IED नेटवर्क, जनसंगठन और वैचारिक दिशा जैसी गतिविधियों सहित नीति-निर्माण और निगरानी होता है।
दोबारा खड़े नहीं हो पाएंगे
मोटे तौर पर देखें तो संगठन में अब गणपति (पूर्व महासचिव), देवजी (पोलित ब्यूरो सदस्य), मिसिर बेसरा (पोलित ब्यूरो सदस्य) और पापाराव (दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी सदस्य) जैसे गिने-चुने नेता ही शेष रह गए हैं, जिन्हें शीर्ष नेतृत्व कहा जा सकता है। इनके साथ तथा अन्य क्षेत्रों में छोटी-छोटी टुकड़ियों में हथियारबंद होकर जंगलों में भटक रहे कैडरों की संख्या महज 300-400 बताई जा रही है। शेष संगठन का सुरक्षाबलों ने सफाया कर दिया है। स्थिति यह है कि संख्या इतनी सिमट चुकी है कि संगठन को दोबारा खड़ा करना लगभग असंभव है। फिलहाल कुछ बड़े कैडर अपनी नेतृत्व की लड़ाई को खींचते हुए आगे बढ़ा रहे हैं, जिसमें उनके साथ जुड़े छोटे कैडर भी पिस रहे हैं।
बस्तर संभाग में केंद्रीय गृह मंत्री लगातार दौरे कर रहे हैं और वहां काफी मुखर भी हैं। बस्तर पंडुम में दिए गए संबोधन में उन्होंने स्पष्ट कहा, “नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई का मूल आधार वनवासी किसानों, निर्दोष बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा है। नक्सली जब आईईडी लगाते हैं, क्या उन्हें यह मालूम नहीं होता कि किसी जनजातीय किसान का पैर उस पर पड़ सकता है और वह हमेशा के लिए दिव्यांग हो सकता है? क्या उन्हें यह अहसास नहीं है कि कोई निर्दोष बच्ची इसका शिकार बन सकती है?”
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार आत्मसमर्पण करने वालों की हर प्रकार से चिंता करेगी और उनका सम्मानपूर्वक पुनर्वास किया जाएगा। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा बनाया गया पुनर्वास पैकेज अत्यंत आकर्षक है। यह वक्तव्य संकेत देता है कि भले ही माओवादी संगठन संख्या में सिमट गया हो, सरकार अपने निर्धारित लक्ष्य और समयसीमा के प्रति सजग है। एक ओर वह उन लोगों के खिलाफ सख्ती से कार्रवाई कर रही है जो हथियार छोड़ने को तैयार नहीं हैं, वहीं दूसरी ओर मुख्यधारा में लौटकर नई शुरुआत करने वालों के लिए दरवाजे भी खुले रखे हैं।
यह नई सुबह का आह्वान है। लेकिन यह भी याद रखना जरूरी है कि विचारधारा की लड़ाई में अंतिम विजय केवल सैन्य सफलता से नहीं मिलती। यह विजय तभी संभव है, जब इस रावण की नाभि अर्थात् उसकी वैचारिक, सामाजिक और प्रचारात्मक जड़ों पर निर्णायक प्रहार किया जाए। सुरक्षा बल अपना दायित्व पूरी निष्ठा और साहस के साथ निभा रहे हैं। फिर भी, नक्सल मोर्चे की इस लड़ाई में सबसे बड़ी भूमिका उस ‘आधे मोर्चे’ की है, जिसका उल्लेख दिवंगत थल सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने किया था। यही वह मोर्चा है, जहां निर्णायक सफलता अभी बाकी है।
माओवाद ने देशभर को, और विशेष रूप से छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र को, केवल विनाश और मौत ही दी है। आज, जब माओवाद अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है, तो सिर्फ सरकार की नहीं, हम सबकी जिम्मेदारी है कि इस नासूर का एक भी अंश न बचे।

















