डॉ. रामचंद्र गोडबोले ने 1990 में अपनी पत्नी सुनीता गोडबोले के साथ दंतेवाड़ा जिले के बारसूर क्षेत्र को अपनी कर्मभूमि बनाया। यह इलाका उस समय स्वास्थ्य सुविधाओं और शिक्षा के मामले में बेहद पिछड़ा था। नक्सल प्रभावित और दुर्गम क्षेत्र होने के बावजूद इस डॉक्टर दंपति ने यहां रहकर जनजाति समाज की सेवा का संकल्प लिया और निस्वार्थ भाव से उसी संकल्प को पूरा करने में जुटे हुए हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में पद्मश्री मिलने पर पाञ्चजन्य प्रतिनिधि ललित फुलारा ने डॉ. रामचंद्र गोडबोले से विशेष बातचीत की। प्रस्तुत हैं उसके प्रमुख अंश—
जब पद्मश्री सम्मान की सूचना मिली, उस समय आप कहां थे?
उस समय महाराष्ट्र के गढ़ चिरौली में था। लोगों ने फोन के जरिए बधाइयां दीं। हमें यह तो पता था कि पिछले पांच-छह वर्ष से जिला प्रशासन हमारे सामाजिक कार्यों को देखते हुए हमारे लिए पद्मश्री की अनुशंसा कर रहा है, लेकिन यह सम्मान 2026 में हमें मिलेगा, इस बात का आभास नहीं था।
कैसी अनुभूति हो रही है?
मेरा मानना है कि यह सम्मान भारत माता का दिया हुआ सम्मान है। मां जब अपने बेटे को पुरस्कार देती है तो आनंद का क्षण होता है।
नक्सल प्रभावित क्षेत्र में काम करने के दौरान किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
मार्च, 1990 में हम लोग बस्तर के बारसूर क्षेत्र में आए। तब से चिकित्सा क्षेत्र में काम कर रहे हैं। जैसे-जैसे हमने वनवासियों के बीच उनके स्वास्थ्य को लेकर काम करना शुरू किया तो कुपोषण की समस्या निकलकर सामने आई। दूर-दराज का इलाका होने के कारण आने-जाने में काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन हम डटे रहे। अब स्थिति ऐसी है कि कुपोषण को जड़ से खत्म करने के लिए हम आठवीं से लेकर बारहवीं तक के बच्चों के बीच जाते हैं और जागरूकता अभियान चलाते हैं। जनजातीय समाज के बच्चों में कुपोषण और मलेरिया भयंकर समस्या है। इन बीमारियों को दूर करना हमारा कर्तव्य है। पहले हम लोग ओ.पी.डी. चलाते थे। अब चिकित्सा शिविर लगाते हैं। कुपोषण के साथ ही हम बच्चों को नशाखोरी और स्वच्छता के प्रति भी जागरूक करते हैं।

डॉ. रामचंद्र गोडबोले और उनकी धर्मपत्नी सुनीता गोडबोले बस्तर के वनवासी इलाकों में घर-घर जाकर काम करना पड़ता है। क्या दिक्कतें आती हैं?
इंद्रावती नदी के उस पार रहने वाले वनवासियों के बीच जाने में समस्या जरूर होती है। बारिश में काफी दिक्कत होती है, क्योंकि नदी को पार करके आबादी में जाना पड़ता है। हमारे यहां से यह नदी चार किलोमीटर दूर है। उस पार का इलाका अबूझमाड़ कहलाता है। अबूझमाड़ से मरीज को इस पार लाने में काफी समस्या होती है। उनको अबूझमाड़ से लाना, देखना और फिर अच्छे अस्पताल में इलाज के लिए भेजना, इसमें कुछ चुनौतियां रहती हैं। ये चुनौतियां पहले भी थीं और अभी भी वैसी ही हैं, लेकिन हम अपना काम करते हैं और वनवासियों का भी हमको सहयोग मिलता है।
आपको कभी नक्सलियों की धमकी मिली?
नहीं, बिल्कुल नहीं। लोगों को पता है कि हम लोग कुपोषण दूर करने के लिए कार्य कर रहे हैं। यदि कभी कोई मिलता भी है, तो कहता है कि यह अच्छा कार्य है, करते रहें। नक्सलवादी विचारधारा को मानने वाले लोग भी हमसे कहते हैं कि जंगल में जाइए और अधिक से अधिक लोगों का कुपोषण मिटाइए।
वनवासियों के बीच काम करने की प्रेरणा कहां से मिली?
जर्मनी के एक चिकित्सक थे अल्बर्ट श्वाइट्जर। उन्होंने अफ्रीका के जंगलों में वनवासियों की सेवा की। उस पर उनको नोबेल पुरस्कार मिला था। उनका चरित्र मैंने पढ़ा था। और उसके बाद किताबों में बाबा आम्टे के काम के बारे में भी पढ़ा। उसके बाद बस्तर में आने का विचार हुआ। बचपन से ही मेरे अंदर सेवा की भावना थी। दरअसल, मेरी मां सभी महिलाओं से स्नेह करती थीं, उनकी सेवा करती थीं, सबकी मदद करती थीं। मेरे अंदर भी मां के ये संस्कार आए।
बस्तर में आप एक दशक में क्या सुधार देखते हैं?
स्वास्थ्य सेवाएं पहले से बेहतर हुई हैं। शिक्षा का स्तर बढ़ा है। सबको शिक्षा मिल रही है। यह सब प्रशासन के कारण हो रहा है। सरकारी डॉक्टर भी लगातार स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने में लगे हैं और कुपोषण को दूर कर रहे हैं।
जब आपको लोग डॉक्टर भैया कहते हैं, तब आपके अंदर क्या भाव आता है?
बहुत अच्छा भाव आता है और ऐसा लगता है कि हम जिनके लिए आए, वे हमें सम्मान से देख रहे हैं। हमारी सेवा का लाभ उठा रहे हैं। मुझे लगता है कि हम लोग जो काम कर रहे हैं, उसके पीछे एक शक्ति है, जिसे आप भगवान कह सकते हैं। वही शक्ति राह दिखा रही है, वही प्रेरणा दे रही है।
आपके परिवार में कौन-कौन हैं?
मेरे माता-पिता गुजर गए। मैं और मेरी पत्नी ही परिवार में हैं। हमको कोई संतान नहीं है। यहां के वनवासी बच्चे ही भगवान के रूप में हमारी संतान हैं। इनकी सेवा ही हम दोनों का लक्ष्य है।
युवा पीढ़ी के लिए क्या संदेश देना चाहेंगे?
वनवासी समाज की जो समस्याएं हैं, उन्हें दूर करने के लिए युवा आगे आएं। जनजाति समाज का भविष्य हमारे हाथ में है। हमारे समाज का भविष्य कोई दूसरा तय करे, इसकी जरूरत नहीं है। हम ही तय करें। इसी में हमारी भारत माता प्रसन्न हो जाएगी, भारत आगे बढ़ेगा। यह भगवान का दिया हुआ काम है। हमको अपने समाजको खड़ा करने के लिए उसकी मदद करनी चाहिए। यही भगवान की पूजा है।
















