113 साल का भारतीय सिनेमा: राजा हरिश्चंद्र से ‘पोंगा पंडित’ और अब ‘घूसखोर पंडित’, कड़वे अनुभवों तक का सफर
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113 साल का भारतीय सिनेमा: राजा हरिश्चंद्र से ‘पोंगा पंडित’ और अब ‘घूसखोर पंडित’, कड़वे अनुभवों तक का सफर

एक सदी पहले, 1913 में भारतीय सिनेमा का सफर राजा हरिश्चंद्र से शुरू हुआ था और आज वह घूसखोर पंडित के रिलीज से पहले उठे आक्रामक सवालों के अग्निपथ पर खड़ा है।

Written byराजेश शांडिल्यराजेश शांडिल्य — edited by Lalit Fulara
Feb 9, 2026, 07:12 pm IST
in मनोरंजन

भारतीय सिनेमा 3 मई 2026 को पूरे 113 वर्ष का हो रहा है। एक सदी पहले, 1913 में भारतीय सिनेमा का सफर राजा हरिश्चंद्र से शुरू हुआ था और आज वह घूसखोर पंडित के रिलीज से पहले उठे आक्रामक सवालों के अग्निपथ पर खड़ा है। भारतीय सिनेमा की शुरुआत सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र पर आधारित फिल्म से हुई। आरंभिक दौर में पौराणिक कथाओं पर आधारित फिल्मों का निर्माण हुआ, लेकिन समय के साथ अपराध, अश्लीलता, भेदभाव और एजेंडा आधारित फिल्मों ने भी जगह बना ली। इस प्रक्रिया में कुछ खास समुदाय सिनेमा के टारगेट बने। भेदभाव करने वाला ब्राह्मण, अन्याय करने वाला ठाकुर, लूट-खसोट और भ्रष्टाचार में लिप्त सूदखोर लाला। ये पात्र बार-बार पर्दे पर उभरे। ताजा विवाद फिल्म घूसखोर पंडित को लेकर है, जिसे बनाने वाले भी ब्राह्मण हैं और मुख्य किरदार भी।

समाज में ब्राह्मण समुदाय के लोगों को ‘पंडित’ का सम्मान प्राप्त है। ठीक उसी तरह जैसे कारोबारी लाला चाहे किसी वर्ग से हो,समाज में सर्वमान्य ‘लाला’ की पहचान अग्रवाल समाज से जुड़ती है। हमारे यहां की व्यवस्था में सरदार कोई भी हो सकता है, लेकिन बड़ी पहचान और सम्मान सिख समाज को इंगित करती है। इसी प्रकार घूसखोर पंडित फिल्म के कारण देशभर में ब्राह्मण समाज इसे अपने सम्मान पर आघात मानते हुए संघर्ष के लिए उतर आया है।समाज पंडित को ज्ञान, धर्म और नैतिकता के प्रतीक के रूप में देखता है। यह संभव नहीं कि पूरा ब्राह्मण समुदाय इन अपेक्षाओं पर खरा उतरे, लेकिन परंपरागत रूप से उनके योगदान ऋषि, गुरु और कर्मकांडी पुरोहित की भूमिका के कारण यह सम्मान इस समाज के हिस्से आया है। 113 वर्षों के सिनेमा इतिहास में यह समुदाय खट्टे, मीठे और बेहद कड़वे अनुभवों से गुजरा है।

संयोग से भारतीय सिनेमा के जनक भी इसी पंडित समाज से थे। चितपावन ब्राह्मण धुंडीराज गोविंद फालके, जिन्हें दादा साहेब फालके के नाम से जाना जाता है। उन्होंने पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र बनाई, जो 3 मई 1913 को रिलीज़ हुई। उस समय सिनेमा भारतीय सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने का माध्यम था, इसलिए धार्मिक चरित्रों को सम्मानजनक रूप में प्रस्तुत किया गया।जागरूक समाज जानता है कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जनमत, सामाजिक सोच और सांस्कृतिक धारणाओं को गढ़ने वाला प्रभावशाली माध्यम है। इसलिए सिनेमा से जुड़े लोगों का दायित्व बनता है कि वे इस विधा का उपयोग राष्ट्रहित, सामाजिक एकता और अखंडता को ध्यान में रखते हुए करें।इसके बावजूद, लंबे समय से सिनेमा के नाम पर अश्लीलता, अपराध और अपराधियों के महिमामंडन को एक खास नैरेटिव के तहत परोसा गया। स्वतंत्रता के बाद 1950 और 60 के दशक में सामाजिक फिल्मों का दौर आया, जहाँ मदर इंडिया और गाइड जैसी फिल्मों में आस्था, नैतिकता और सामाजिक संतुलन दिखा।

1975 में रणधीर कपूर की फिल्म पोंगा पंडित आई, जिसे उस दौर में हंसी-मजाक में लिया गया,लेकिन इसके बाद छोटे-बड़े पर्दे पर मर्यादा लांघने का सिलसिला तेज हुआ। 1980 और 90 के दशक में मसाला फिल्मों का दौर आया, जहाँ धार्मिक और सामाजिक प्रतीकों को अलग नजरिये से दिखाया गया। साल 1983 में मंगल पांडे नाम से फिल्म आई।यह फिल्म क्रांतिकारी मंगल पांडे पर नहीं, बल्कि कानून को चुनौती देकर अपराध का रास्ता चुनने वाले कथित मंगल पांडे थी। हालांकि इसके 20 साल बाद भारत के रीयल हीरो मंगल पांडे पर एक फिल्म भी आई थी,जो काफी विवादों के साथ रिलीज हुई थी।

बाद के वर्षों में धर्म, जाति और सत्ता पर सवाल उठाने वाली फिल्मों की धारा और तेज हुई। ओह माय गॉड, पीके, अनुच्छेद 15 और ओएमजी 2,महाराज,फुकरे जैसी फिल्मों ने पंडित और धार्मिक परंपराओं को टारगेट किया। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आई सीरीज मिर्जापुर के त्रिपाठी परिवार को हर क्षेत्र में बुरे से बुरा प्रदर्शित किया। फिल्म बाजीराव मस्तानी में भारत के महान ब्राह्मण योद्धा पेशवा बाजीराव बल्लाल भट्ट को नाच गाना करते दिखाने पर बवाल हुआ,इसके बावजूद फिल्म रिलीज हुई। कुल मिलाकर, भारतीय सिनेमा में ब्राह्मण या पंडित पात्र को शायद ही कभी एक सामान्य इंसान की तरह गहराई से दिखाया गया। बदलते समाज के साथ उसकी छवि भी बदली है और आने वाले समय में यह प्रवृत्ति और तेज होने की संभावना है।

(राजेश शांडिल्य/संपादक विश्व संवाद केंद्र)

 

Topics: indian cinemaManoj Bajpayee113 years of Indian cinemaRaja Harishchandra film'Ponga Pandit' film'Ghoos Khor Pandit' filmcontroversies surrounding Bollywood films
राजेश शांडिल्य
राजेश शांडिल्य
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