समुद्र तट पर बसी आध्यात्मिक नगरी पुरी में जब देशभर से आए हजारों श्रमिक प्रतिनिधि यहां जुटे अंदाजा लगाया जा सकता है कि वातावरण क्या होगा। भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) के 21वें त्रिवार्षिक सम्मेलन को राष्ट्रीय संकल्प के रुप में देखा जा रहा है। आठ फरवरी तक चलने वाले इस सम्मेलन 28 राज्यों से 2500 प्रतिनिधियों के साथ ब्राजील, रूस, नेपाल, इंडोनेशिया और चीन सहित अन्य कई देशों के श्रम संगठनों के प्रतिनिधि भागीदार बने हैं। राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन के साथ मंच से स्पष्ट संदेश दिया गया कि भारत के भविष्य की असली ताकत उसके श्रमिक और युवा हैं।
केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया के संबोधन में भी यह संदेश था। उन्होंने अपने संबोधन में राष्ट्र निर्माण को सीधे श्रम शक्ति से जोड़ा और कहा कि विकसित भारत का सपना न नीतियों से अकेले पूरा होगा, न तकनीक से,बल्कि उसकी मजबूत नींव परिश्रमी लोगों के हाथों से रखी जा सकती है। खेत, कारखाने, निर्माण स्थल, परिवहन, सेवा क्षेत्र सहित हर जगह काम करने वाला वर्ग ही देश की वास्तविक उत्पादक शक्ति है।
उन्होंने याद दिलाया कि भारत ने सदियों की चुनौतियों के बाद भी अपनी श्रम संस्कृति गौण नहीं होने दिया। यही परिश्रम की परंपरा आज नए भारत की ऊर्जा बन रही है। मंत्री ने भरोसा दिलाया कि सरकार श्रमिक संगठनों के सुझावों को औपचारिकता नहीं मानती, बल्कि नीति निर्माण में गंभीरता से शामिल करती है। सम्मेलन से निकलने वाले प्रस्तावों पर प्राथमिकता से विचार किया जाएगा।

बीएमएस की भूमिका पर कहा कि यह संगठन सिर्फ मांग रखने वाला मंच नहीं, बल्कि श्रमिकों को जागरूक करने और राष्ट्रहित से जोड़ने का भी कार्य करता है। श्रमिक आंदोलन को टकराव नहीं, सहयोग और संतुलन के रास्ते पर चलना चाहिए,तभी औद्योगिक विकास और सामाजिक न्याय साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं।नए श्रम कानूनों का जिक्र करते हुए मंत्री ने स्पष्ट किया कि इनका मकसद उद्योगों पर बोझ बढ़ाना नहीं, बल्कि श्रमिकों को सम्मानजनक और सुरक्षित कार्य वातावरण देना है।समान काम के लिए समान वेतन, महिला श्रमिकों के अधिकार, सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा को उन्होंने आधुनिक श्रमिक व्यवस्था की आधारशिला बताया।
इस सम्मेलन की खास बात इसके व्यापक प्रतिनिधित्व और ब्राजील, रूस, नेपाल, इंडोनेशिया और चीन सहित कई देशों के श्रम संगठनों के प्रतिनिधियों की भागीदारी है। अगले दिनों में होने वाले विचार मंथन को अंतरराष्ट्रीय दृष्टि भी मिलेगी,क्योंकि यह तय है कि सम्मेलन के अगले दो दिनों में बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में श्रमिकों की भूमिका कैसे मजबूत की जाए, इस पर चर्चा होगी।
(राजेश शांडिल्य,संपादक विश्व संवाद केंद्र)

















