Mobile Addiction in Children: गाजियाबाद सुसाइड केस ने क्यों बजाई खतरे की बड़ी घंटी?
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गेम, रील और स्क्रीन: क्या यही तय करेगा हमारे बच्चों का कल? आर्थिक सर्वेक्षण की बड़ी चेतावनी

एक कड़वी सच्चाई जो समाज के ज़मीर पर सवाल बनकर खड़ी है वह यह है कि मोबाइल फोन और ऑनलाइन दुनिया बच्चों की ज़िंदगी ही नहीं, पहचान तक बदलने लगी है।

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी
Feb 6, 2026, 04:41 pm IST
in भारत, कुटुम्ब प्रबोधन
बच्चों को डिजिटल एडिक्शन से बचाएं

बच्चों को डिजिटल एडिक्शन से बचाएं

गाजियाबाद से बुधवार को बहुत ही दर्दनाक खबर आई, तीन नाबालिग बहनें (16 वर्ष), (14 वर्ष) और (12 वर्ष) अपने घर की बालकनी से कूद गईं। जांच चल रही है और कई एंगल भी सामने आ रहे हैं। मामला उलझता जा रहा है, लेकिन एक कड़वी सच्चाई जो समाज के ज़मीर पर सवाल बनकर खड़ी है वह यह है कि मोबाइल फोन और ऑनलाइन दुनिया बच्चों की ज़िंदगी ही नहीं, पहचान तक बदलने लगी है। यह घटना हमें मजबूर करती है सोचने पर कि क्या मोबाइल अब केवल मनोरंजन का साधन है, या वह बच्चों की भावनाओं, कल्पनाओं और निर्णयों को अपने हिसाब से गढ़ रहा है? जब कोई बच्चा अपने नाम, अपनी पसंद और अपनी पहचान तक स्क्रीन से तय करने लगे, तो यह महज़ शौक नहीं, खतरे की घंटी है।

आंकड़े और घटनाएं 

भारत में बच्चों और युवाओं के बीच आत्महत्या एक गंभीर और लगातार बढ़ता संकट बन चुकी है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार, वर्ष 2022 में देश में आत्महत्या के लगभग 1 लाख 70 हज़ार मामले दर्ज किए गए। इनमें छात्रों और युवाओं की संख्या चिंताजनक रही। 2023 में यह संख्या बढ़कर लगभग 1 लाख 71 हज़ार पहुँच गई, जबकि छात्रों द्वारा आत्महत्या के मामले 13 हज़ार से अधिक रहे, जो पिछले एक दशक में सबसे अधिक हैं।

इसी पृष्ठभूमि में आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 ने पहली बार डिजिटल लत को स्वास्थ्य और आर्थिक जोखिम के रूप में रेखांकित किया है। सर्वेक्षण में सामाजिक माध्यमों के उपयोग के लिए उम्र-सीमा, आयु सत्यापन, बच्चों के लिए साधारण मोबाइल, पर्दे के सामने बिताए समय का नियंत्रण, विद्यालयों में डिजिटल स्वास्थ्य शिक्षा और शारीरिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की सिफारिश की गई है। साथ ही चेतावनी दी गई है कि यदि डिजिटल व्यवहार नियंत्रित नहीं हुआ, तो इसका असर मानसिक स्वास्थ्य, कार्यक्षमता और भविष्य की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) पर पड़ेगा।

ऑनलाइन गेम बच्चों के लिए ख़तरा क्यों ?

  1. हिंसक और हथियार आधारित गेम – पबजी / बीजीएमआई (PUBG / BGMI). फ्री फायर (Free Fire) ,कॉल ऑफ़ ड्यूटी (Call of Duty) ,फ़ोर्टनाइट (Fortnite) इन खेलों में मारने-मरने को रोमांचक दिखाया जाता है। लगातार जीत-हार का तनाव रहता है और हथियार बच्चों को सामान्य लगने लगते हैं।
  2. टास्क-आधारित / चैलेंज गेम– ब्लू व्हेल जैसे चैलेंज गेम (Blue Whale – नाम बदलकर आते रहते हैं) , ऑनलाइन लव / लॉयल्टी चैलेंज ,गुप्त टास्क समूह (टेलीग्राम / डिस्कॉर्ड) ये गेम धीरे-धीरे आज्ञा-पालन सिखाते हैं, बच्चों के डर और अकेलेपन का इस्तेमाल करते हैं।
  3. चैट एवं गेम वाले प्लेटफ़ॉर्म -रोब्लॉक्स (Roblox) , माइनक्राफ्ट – पब्लिक सर्वर (Minecraft) , वीआर चैट (VR Chat) ये अजनबियों से बातचीत, नकली दोस्ती और बच्चों की मासूमियत का दुरुपयोग आसान हो जाता है।
  4. पैसे लगाने वाले / सट्टे जैसे गेम -तीन पत्ती (Teen Patti) , रम्मी ऐप्स (Rummy Apps) , फैंटेसी गेमिंग (Dream11 जैसे) इनमे हारने पर मानसिक टूटन होती है, पैसे की लालच लगती है और यह लत नशे जैसी बन जाती है।
  5. अत्यधिक लत लगाने वाले साधारण गेम -सबवे सर्फ़र्स (Subway Surfers) , कैंडी क्रश (Candy Crush), क्लैश ऑफ़ क्लैन्स (Clash of Clans) . ये सीधे हिंसक नहीं हैं, लेकिन इनकी लत बहुत तेज़ी से लगती है।

मोबाइल और गेमिंग की लत अचानक नहीं बनती, बल्कि यह तकनीक की बनावट (एल्गोरिदम), बच्चों की मानसिक अवस्था और उनके विकासशील मनोविज्ञान—तीनों के मेल से पैदा होती है। आज के गेम और सोशल मीडिया ऐसे डिज़ाइन किए जाते हैं कि बच्चा ज़्यादा से ज़्यादा समय स्क्रीन पर बिताए। हर जीत, लाइक या लेवल पर दिमाग में डोपामिन निकलता है, जिससे खुशी मिलती है और बच्चा बार-बार वही अनुभव चाहता है। अनिश्चित इनाम (कभी जीत, कभी हार), अंतहीन रील्स-लेवल और दोस्त आगे निकल गया जैसे संदेश दिमाग को रुकने नहीं देते।

दूसरी ओर, बच्चों का दिमाग अभी पूरी तरह विकसित नहीं होता। वे तुरंत संतुष्टि, पहचान और स्वीकार्यता चाहते हैं। पढ़ाई का दबाव, तुलना, अकेलापन और संवाद की कमी में मोबाइल भावनात्मक सहारा बन जाता है। मनोवैज्ञानिक रूप से बच्चा तनाव से बचने के लिए मोबाइल की ओर भागता है, धीरे-धीरे नियंत्रण खो देता है और समय के साथ सहनशीलता बढ़ती जाती है—30 मिनट से कई घंटे तक। जब मोबाइल छीना जाता है तो गुस्सा, रोना और धमकी जैसे वापसी के लक्षण दिखते हैं।

बच्चों में मोबाइल लत के कारण

बच्चों में मोबाइल लत बढ़ने के पीछे कई जुड़े हुए कारण हैं। आज सस्ते स्मार्टफोन, सस्ता इंटरनेट और आकर्षक ऐप्स के कारण बच्चे बहुत कम उम्र में ही मोबाइल से जुड़ जाते हैं। कोविड महामारी के दौरान पढ़ाई, दोस्ती और मनोरंजन ऑनलाइन होने से स्क्रीन टाइम कई गुना बढ़ा और यह अस्थायी उपयोग स्थायी आदत बन गया। ऐप्स का डिज़ाइन—नोटिफिकेशन, रिवॉर्ड, लाइक, शॉर्ट वीडियो—ध्यान को लगातार बाँधता है। साथियों का दबाव (FOMO) और माता-पिता का अधिक फोन उपयोग इसे सामान्य बनाता है, जबकि खेल और सुरक्षित बाहरी गतिविधियों की कमी मोबाइल को आसान विकल्प बना देती है।

इकोनॉमिक सर्वे की चेतावनी

इकोनॉमिक सर्वे 2025–26 ने पहली बार डिजिटल लत को एक स्वास्थ्य और आर्थिक जोखिम के रूप में स्वीकार किया है। सर्वे में सुझाव दिया गया है कि बच्चों को पढ़ाई के लिए स्मार्टफोन की जगह साधारण फोन दिया जाए, सोशल मीडिया के उपयोग के लिए उम्र-सीमा और आयु-सत्यापन लागू किया जाए, स्कूलों में डिजिटल साक्षरता और साइबर सुरक्षा पढ़ाई जाए और शारीरिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए। साथ ही ऑनलाइन कक्षाओं को केवल ज़रूरत पड़ने पर सीमित रखने और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही तय करने की सिफारिश की गई है। सर्वे चेतावनी देता है कि यदि डिजिटल व्यवहार पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो इसका असर बच्चों की मानसिक सेहत, पढ़ाई, कार्यक्षमता और देश की भविष्य की उत्पादकता पर पड़ेगा।

जब परिवार साथ बैठता है, मोबाइल छूटता है

डिजिटल युग में बच्चों को मोबाइल की लत से बचाने का सबसे सशक्त और स्थायी उपाय कुटुंब प्रबोधन है जिसकी जड़ें परिवार, संवाद, संस्कार और सामाजिक जुड़ाव में हैं। जब परिवार एक साथ भोजन करता है, बच्चों से रोज़ खुलकर बात करता है और सही–गलत की दिशा देता है, तो मोबाइल अपने-आप जीवन के केंद्र से हटने लगता है। संस्कार और नीति-शिक्षा, पंचतंत्र–हितोपदेश जैसी नैतिक कथाएँ बच्चों के मन में धैर्य, विवेक और मूल्य बोती हैं। घर के बुज़ुर्गों के साथ समय बच्चों को अनुभव, अपनापन और अनुशासन सिखाता है, जो कोई स्क्रीन नहीं सिखा सकती।

कुटुंब प्रबोधन का एक सरल पर प्रभावी नियम है—रात 7 बजे के बाद मोबाइल बंद, और यह नियम बच्चों के साथ माता-पिता पर भी लागू हो। जब माता-पिता स्वयं उदाहरण बनते हैं, तो बच्चे सम्मान के साथ बात मानते हैं। साथ ही, बच्चों का परिवार, कॉलोनी और मोहल्ले से जुड़ना अनिवार्य है। पड़ोस के बच्चों के साथ खेल, धार्मिक-सामाजिक गतिविधियाँ, खेल-कूद और त्योहारों का सामूहिक उत्सव, ये सब बच्चों में सहयोग, अनुशासन और अपनापन जगाते हैं।

कुटुंब प्रबोधन का संदेश स्पष्ट है ,मोबाइल को नहीं, लोगों को दोस्त बनाइए। जब बच्चे परिवार और समाज से जुड़ते हैं, तो डिजिटल आकर्षण स्वयं फीका पड़ जाता है। यही मार्ग उन्हें संतुलित, संस्कारयुक्त और मानसिक रूप से स्वस्थ बनाता है और हमें हमारी मूल प्रवृत्ति: परिवार और समाज की ओर लौटाता है। आइये बच्चों में डिजिटल की लत को दूर करने का संकल्प लें। उन्हें समय दें, उनसे बातें करें।

 

Topics: गेमिंग रील्स की लतबच्चे मोबाइल गेम्सबच्चे मानसिक स्वास्थ्यगाजियाबादपाञ्चजन्य विशेषस्क्रीन एडिक्शन और बच्चेआर्थिक सर्वेक्षण चेतावनी
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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