Iran 1979 revolution: ईरान की साहसी महिलाओं की अधूरी कहानी, आजादी का सपना और हकीकत का हिजाब
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Iran 1979 revolution: ईरान की साहसी महिलाओं की अधूरी कहानी, आजादी का सपना और हकीकत का हिजाब

इतिहास का क्रूर मज़ाक: शाह से मुक्ति और कट्टरपंथ की गुलामी के बीच फंसी ईरान की महिलाएं

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Feb 5, 2026, 06:02 pm IST
inविश्व
महिलाओं का विरोध ( चित्र- एआई द्वारा निर्मित)

महिलाओं का विरोध ( चित्र- एआई द्वारा निर्मित)

वर्ष 1979 का समय! ईरान के शाह सत्ता से जा रहे थे और ईरान के असंख्य लोगों की क्रांति सफल होने जा रही थी। शाह के खिलाफ महिलाओं ने मोर्चा खोला और उनकी नीतियों की मुखर आलोचना की। परंतु उन्हें यह नहीं पता था कि अब उनका संघर्ष एक नया रूप लेने जा रहा है। जिस क्रांति के लिए उन्होंने अपने जीवन की परवाह नहीं की। जिस क्रांति की लौ उन्होंने जलाई, उन्हें उसे क्रांति के बाद के शासन में अपनी मूलभूत आजादी के लिए भी आंदोलन करना होगा या इसी क्रांति के बाद आए शासन में उन्हें मौत की सजा भी सुनाई जाएगी।

खोमैनी ने भी हिंसा की हद की थी पार

आज ईरान में महिलाओं का जो प्रतिरोध देख रहे हैं, वह खामनेई के लिए नयी बात नहीं है क्योंकि उससे पूर्व के शासक अयातोल्ला खोमैनी ने भी उन महिलाओं के साथ हिंसा की हर सीमा पार कर दी थी, जिनकी की गई क्रांति के कारण ही वह सत्ता में आ पाए थे। वर्ष 1979 में ईरान में हुई क्रांति के मूल में ईरान के लोगों का असंतोष था, क्योंकि लोग ईरान के शाह की कुछ नीतियों से असन्तुष्ट थे, मगर इसमें शाह के खिलाफ कट्टरपंथी अयातोल्ला खुमैनी भी प्रगतिशील लोगों के साथ मिलकर लड़ रहा था। जो लोग शाह के शासन के खिलाफ थे, उन्हें यह पता भी नहीं था कि ईरान के शाह के मुल्क छोड़ने के बाद क्या होगा? विशेषकर महिलाओं को बिल्कुल भी अनुमान नहीं था।

जब क्रांति सफल हुई

फरवरी 1979 में जब क्रांति सफल हुई, तो उसके पीछे विभिन्न वर्ग और सामाजिक शक्तियों की सामूहिक शक्ति थी। परंतु शीघ्र ही तमाम वर्ग एक ऐसे विश्वासघात का शिकार होने वाले थे, जिसकी उन्होनें कल्पना नहीं की थी और जब यह धोखा उनके सामने आया, तब उनके सामने हाथ मलने और एक नए संघर्ष के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं था।

महिलाओं के साथ सबसे बड़ा छल

महिलाओं के लिए इस क्रांति के बाद सबसे बड़ा छल सामने आया। अयातोल्ला खोमैनी ने सत्ता संभालते ही यह घोषणा कर दी कि हर महिला के लिए अनिवार्य हिजाब का कानून है। वे घर से बाहर निकलेंगी तो हिजाब पहनकर। वर्ष 1979 का महिला दिवस अर्थात 8 मार्च का दिन। 8 मार्च का दिन महिला क्रांतिकारियों ने उन महिलाओं को याद करने के लिए रखा हुआ था, जो शाह के खिलाफ क्रांति में शहीद हुई थीं। वे क्रांति अर्थात आजादी के बाद अपना पहला महिला दिवस मनाने जा रही थीं। मगर 7 मार्च को ही खोमैनी ने यह फरमान जारी कर दिया कि महिलाओं को अब सरकारी कार्यालयों में हिजाब पहनकर ही जाना होगा।

हैदह दरगही क्या कहती हैं

वे महिलाएं जो जश्न मनाने जा रही थीं, अब एक बार फिर से प्रदर्शनकारियों की भूमिका में आ गईं। www.cbc.ca/radio में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार तेहरान यूनिवर्सिटी में उस समय साहित्य की प्रोफेसर हैदह दरगही उस दिन को याद करके कहती हैं कि वे लोग 8 मार्च को मुक्त होकर और सार्वजनिक रूप से ईरान के इतिहास में पहली बार महिला दिवस मनाने जा रही थीं। वे बाद में स्वीडन चली गई थीं। 7 मार्च 1979 को जैसे ही खोमैनी का यह फरमान आया, जश्न के लिए इकट्ठी हुई महिलाएं विरोध प्रदर्शन करने लगीं। हजारों महिलाएं नए प्रधानमंत्री के कार्यालय के सामने इकट्ठी हुईं तो वहीं अन्य 3000 महिलाएं खोमैनी के शहर कॉम चली गई थीं। सुबह तेहरान यूनिवर्सिटी में खचाखच भरे ऑडिटोरियम के दरवाजे खोलकर अंदर घुस गई थीं और सेमिनार में बाधा डाली थी। इन महिलाओं ने ऑडिटोरियम में बताया कि उन्हें कैसे सड़कों पर प्रताड़ित किया जा रहा था।

इस दिन के लिए संघर्ष किया था?

दरगही उस दिन को याद करते हुए कहती थीं कि उस दिन महिलाओं ने कहा “बाहर आइए और देखिए कि सड़क पर हमारे जुलूस के साथ उन्होंने क्या किया है?” मगर जैसे ही वे लोग जाने लगीं तो देखा कि उनके लिए गेट बंद हो चुके हैं। इस पर दरगही और अन्य एक महिला गेट पर चढ़ गई और शासन के समर्थक गार्ड्स से कहा कि वे उन्हें बाहर जाने दें। दरगही के शब्दों में “मैं उन पर चीख रही थी। क्या यही वह आजादी है, जिसके लिए हम लोगों ने प्रदर्शन किया था और कष्ट उठाए थे?” सड़कों पर हजारों महिलाओं के साथ उन्होंने नारा लगाया, “हमने पीछे जाने के लिए क्रांति नहीं की थी।“

फ्रेंच फेमिनिस्ट ग्रुप का वीडियो

उस समय का फ्रेंच फेमिनिस्ट ग्रुप का एक वीडियो भी है, जिसमें वर्ष 1979 में सड़कों पर उतरी लड़कियां कह रही हैं कि कई दिनों से हम सड़कों पर आंदोलन कर रही हैं और यह बार-बार कह रही हैं कि हम पर्दा नहीं पहनना चाहती हैं। अगर उन्हें यही करना था तो हमें पहले बताना चाहिए था। उन्हें पहले ही बता देना चाहिए था कि वे महिला और पुरुष के लिए समानता नहीं चाहते हैं। हालांकि उस समय के लिए महिलाओं की बात मान ली गई और ऊंचे ओहदे वाले मजहबी रहनुमा अयातुल्ला तालेघानी ने खोमैनी के बयानों को वापस ले लिया। और इस कथित साफ़ जीत के साथ इस्लामिक रिपब्लिक के खिलाफ पहला बड़ा, सामूहिक विरोध – धीरे-धीरे खत्म होने लगा। परंतु क्या यह वास्तव में महिलाओं की जीत थी या फिर महिलाओं के लिए एक अंधी सुरंग की शुरुआत थी?

Topics: ईरान में महिलाएंहिजाब कानूनपाञ्चजन्य विशेषईरान की क्रांतिमहिलाओं की क्रांतिIran 1979 revolutionईरान क्रांति 1979अयातुल्ला खोमैनी8 मार्च 1979 ईरान
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