महाराष्ट्र के पुणे पोर्श कार सड़क हादसे के में सुप्रीम कोर्ट ने तीन आरोपियों को जमानत तो दे दी। लेकिन, इसके साथ ही कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की कि बच्चों द्वारा नशे में गाड़ी चलाने से होने वाले हादसों के लिए उनके ही माता-पिता को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि नशे में तेज रफ्तार कार चलाना मौज करना नहीं होता है।
क्या है पूरा मामला
19 मई 2024 की रात पुणे के कल्याणी नगर इलाके में एक बड़ा हादसा हुआ था। एक नाबालिग लड़के ने तेज रफ्तार में पोर्श कार चलाई, जिससे एक बाइक सवार दो युवा सॉफ्टवेयर इंजीनियरों – अनीश अवधिया और अश्विनी कोष्टा – की मौत हो गई। ये दोनों निर्दोष लोग थे, जो रात में बाइक पर जा रहे थे। इस हादसे के बाद पूरा मामला सुर्खियों में आ गया, क्योंकि आरोपी नाबालिग था और उसके परिवार पर साक्ष्य छिपाने की कोशिश का आरोप लगा था।
ब्लड सैंपल बदलने की साजिश
पुलिस जांच में पता चला कि कार में बैठे दो अन्य नाबालिगों (जो पीछे की सीट पर थे) के खून में शराब थी। इसे छिपाने के लिए ब्लड सैंपल बदलने की कोशिश हुई। ससून अस्पताल में नमूने जमा करवाए गए, लेकिन वहां कुछ लोगों ने मिलकर नाबालिगों के सैंपल की जगह अपने खून के सैंपल लगा दिए। इस काम में पैसे का लेन-देन भी हुआ। आरोप है कि इससे नाबालिगों की नशे की रिपोर्ट छिपाई गई ताकि केस कमजोर हो।
इस साजिश में शामिल तीन लोग हैं – आशीष सतीश मित्तल, आदित्य अविनाश सूद और अमर संतोष गायकवाड़। तीनों पर सबूतों से छेड़छाड़, रिश्वत और फर्जीवाड़े के आरोप लगे। इनके अलावा नाबालिग के माता-पिता विशाल अग्रवाल और शिवानी अग्रवाल, डॉक्टर अजय तावरे, अस्पताल कर्मचारी श्रीहरि हलनोर और कुछ बिचौलिए भी गिरफ्तार हुए थे। कुल मिलाकर करीब 10 लोग इस मामले में जेल गए।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
2 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने इन तीनों आरोपियों – आशीष मित्तल, आदित्य सूद और अमर गायकवाड़ – को जमानत दे दी। कोर्ट ने कहा कि ये लोग पिछले 18 महीने से जेल में हैं। ट्रायल में ज्यादा प्रगति नहीं हुई है और लंबी हिरासत को देखते हुए जमानत दी जा रही है। जमानत ट्रायल कोर्ट की शर्तों पर होगी, जैसे शर्तें तोड़ने पर जमानत रद्द हो सकती है। कोर्ट ने साफ कहा कि जमानत मिलना मतलब आरोपों से बरी होना नहीं है।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि ऐसे मामलों में गरीब ड्राइवर को फंसाकर अमीर लोग बच निकलते हैं। उन्होंने माता-पिता पर सवाल उठाए कि वे नाबालिग बच्चों को तेज कार, शराब और पैसे देकर अकेला छोड़ देते हैं। बच्चों के साथ समय नहीं बिताते, सिर्फ पैसे और फोन देकर खुश कर देते हैं। नशे में तेज गाड़ी चलाना और लोगों की जान लेना कोई ‘जश्न’ नहीं है। कोर्ट ने कहा कि माता-पिता की गैर-जिम्मेदारी से ऐसे हादसे होते हैं।
मुख्य आरोपी नाबालिग की स्थिति
हादसे का मुख्य आरोपी नाबालिग था। किशोर न्याय बोर्ड ने उसे पहले हल्की शर्तों (जैसे 300 शब्दों का निबंध लिखना) पर जमानत दी थी, जिससे काफी विवाद हुआ। बाद में बोर्ड ने उसे सुधार गृह भेजा। हाईकोर्ट ने भी कुछ राहत दी। उसका केस अलग चल रहा है। यह मामला अब भी जांच और ट्रायल के दौर में है।











