मुस्लिम कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी ने बांग्लादेश में क्यों खेला 'हिंदू कार्ड'? सियासी पाखंड की खुली पोल
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मुस्लिम कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी ने बांग्लादेश में क्यों खेला ‘हिंदू कार्ड’? सियासी पाखंड की खुली पोल

पार्टी के संविधान की शर्तें ऐसी हैं कि कोई भी हिंदू या गैर-मुस्लिम कभी भी पार्टी का पूर्ण सदस्य नहीं बन सकता।

Written byLalit FularaLalit Fulara
Feb 2, 2026, 09:58 pm IST
inविश्व

नई दिल्ली: एक तरफ बांग्लादेश में हिंदुओं का नरसंहार हो रहा है और दूसरी तरफ वहां की कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी पार्टी दुनिया को दिखाने के लिए ‘हिंदू कार्ड’ खेल रही है। उसके इस दिखावे वाले हिंदू प्रेम की पोल खुल चुकी है। जमात-ए-इस्लामी पार्टी ने खुलना-1 सीट से अपने हिंदू प्रकोष्ठ के नेता कृष्ण नंदी को उम्मीदवार बनाया है। यह मुस्लिम कट्टरपंथी पार्टी को सेक्युलर दिखाने की कोशिश है। पार्टी सियासी पाखंड कर रही है।

गैर-मुस्लिम नहीं बन सकता पार्टी का पूर्ण सदस्य, संविधान में लिखा है ये
एक रिपोर्ट का कहना है कि जमात की यह पहल असली समावेशिता नहीं बल्कि एक सियासी पाखंड है। पार्टी के संविधान की शर्तें ऐसी हैं कि कोई भी हिंदू या गैर-मुस्लिम कभी भी पार्टी का पूर्ण सदस्य नहीं बन सकता। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि जमात-ए-इस्लामी के संविधान के अनुसार गैर-मुसलमानों को पार्टी में बराबरी का दर्जा नहीं मिल सकता। संविधान की धारा 11 साफ कहती है कि कोई भी गैर-मुस्लिम केवल एसोसिएट सदस्य बन सकता है। इससे साफ है कि कृष्ण नंदी जैसे हिंदू नेताओं को पार्टी की कोर कमिटी या नीति-निर्माण में कोई जगह नहीं मिलेगी। उनको चुनाव में उम्मीदवार बनाना सिर्फ दुनिया को दिखाने के लिए है। पार्टी का फुल मेंबर वहीं बन सकता है जो मुसलमान हो।

शरिया और कुरान की शपथ के बिना पार्टी में प्रवेश नहीं
जमात के संविधान की धारा 7 और धारा 9 की शर्तें ऐसी हैं जिन्हें कोई भी स्वाभिमानी हिंदू स्वीकार नहीं कर सकता। इसमें शर्त है कि पार्टी का पूर्ण सदस्य बनने के लिए अल्लाह, पैगंबर मोहम्मद और कुरान को एकमात्र आदर्श मानना अनिवार्य है। पार्टी के सदस्य को इस्लामी कर्तव्यों का पालन करना होगा। उसे शरिया कानून के अनुसार जिंदगी बितानी होगी। जमात-ए-इस्लामी पार्टी का संविधान कहता है कि सदस्यों को उन लोगों से दूरी बनानी होगी जो इस्लाम से भटके हुए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक साल 2008 में जमात ने अपने संविधान में थोड़े-बहुत बदलाव किए थ। ये सिर्फ चुनाव आयोग के नियमों और जनप्रतिनिधित्व आदेश से बचने के लिए थे ताकि पार्टी का रजिस्ट्रेशन रद्द न हो। जबकि सच यह है कि इस पार्टी की मूल आस्था आज भी कट्टरपंथी इस्लामी सिद्धांतों पर टिकी है। रिपोर्ट कहती है कि  ठोस बदलावों के बिना यह समावेशिता एक छलावा और राजनीतिक अवसरवाद है।

12 फरवरी को संसदीय चुनाव के लिए होनी है बांग्लादेश में वोटिंग
बांग्लादेश में आने वाली 12 फरवरी को संसदीय चुनाव के लिए वोटिंग होनी है। अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के तख्तापलट के बाद देश का यह पहला आम चुनाव है। अब तक चुनावों में शेख हसीना की अवामी लीग और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के बीच मुकाबला होता था। इस बार हालात बदले हैं। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने अवामी लीग पर प्रतिबंध लगाकर चुनाव लड़ने से रोक दिया है। इसके बाद बांग्लादेश की राजनीति में जमात-ए-इस्लामी मजबूत दावेदारी पेश कर रही है।

जमात-ए-इस्लामी ने एक भी महिला उम्मीदवार नहीं उतारा…
कट्टरपंथी पार्टी जमात-ए-इस्लामी ने एक भी महिला उम्मीदवार नहीं उतारी है। जमात-ए-इस्लामी  के नेता शफीकुर रहमान का साफ कहना है कि उनकी पार्टी की कभी कोई महिला प्रमुख नहीं बन सकती। शफीकुर रहमान का कहना है कि  अल्लाह ने पुरुष और महिलाओं को अलग बनाया है। महिलाएं पार्टी का नेतृत्व नहीं कर सकतीं। उन्होंने एक और विवादित बयान दिया जिसमें कामकाजी महिलाओं की तुलना वेश्यावृत्ति से कर दी। इसका काफी विरोध भी हुआ और ढाका में लोगों ने सड़कों पर उतरकर इस बयान का विरोध किया।

Topics: BangladeshBangladesh ElectionsPersecution of Hindus in BangladeshMuslim fundamentalist Jamaat-e-IslamiJamaat-e-Islami's Hindu card
Lalit Fulara
Lalit Fulara
उत्तराखंड के अल्मोड़ा ज़िले के सुदूर स्थित छोटे से गाँव 'पटास' में पैदाइश. कला-साहित्य में विशेष रुचि. पहला नॉवेल 'घासी: लाल कैंपस का भगवाधारी' प्रकाशित. विगत 12 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय. करियर की शुरुआत दैनिक भास्कर से हुई और उसके बाद ज़ी न्यूज़, न्यूज़18, राजस्थान पत्रिका, अमर उजाला और इंडियाडॉटकॉम होते हुए वर्तमान में पांचजन्य डिजिटल में असिस्टेंट एडिटर के तौर पर कार्यरत. पत्रकारिता में एम.ए माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के नोएडा कैंपस से किया है. [Read more]
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