पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हाल ही में एक कार्यक्रम में खुलकर अपनी और देश की आर्थिक स्थिति पर बात की। अपनी आर्थिक स्थिति पर बात करते हुए शरीफ ने कहा कि कर्ज मांगने की प्रक्रिया बहुत ही अपमानजनक थी। इसके लिए हमें अपना आत्मसम्मान गिरवी रखना पड़ा।
आर्थिक संकट का दौर
शहबाज शरीफ ने बताया कि जब उनकी सरकार सत्ता में आई, तो देश की अर्थव्यवस्था बहुत नाजुक हालत में थी। आम लोग मुश्किलों से गुजर रहे थे। देश में दिवालियापन का डर छाया हुआ था। कुछ लोग तो पाकिस्तान को तकनीकी रूप से फेल होने की कगार पर बता रहे थे। विदेशी मुद्रा के भंडार खत्म होने की स्थिति थी, और कैश क्राइसिस चल रही थी। ऐसे में पाकिस्तान को विदेशी मदद की बहुत जरूरत पड़ गई।
कर्ज मांगने की मजबूरी
प्रधानमंत्री ने कहा कि मित्र देशों से अरबों डॉलर के कर्ज के लिए अनुरोध करने पड़े। इसमें खुद उनके साथ आर्मी चीफ फील्ड मार्शल असीम मुनीर भी शामिल थे। वे कई देशों में गए और मदद मांगी। इनमें चीन, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कतर जैसे देश शामिल हैं। ये देश पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार और कर्ज चुकाने में नियमित रूप से मदद करते हैं। साथ ही इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) से भी सहायता ली गई। रीफ ने याद किया कि 2023 में पेरिस में IMF की मैनेजिंग डायरेक्टर से मुलाकात हुई थी। उसके बाद IMF ने एक इकोनॉमिक प्रोग्राम मंजूर किया, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को कुछ स्थिरता मिली।
आत्मसम्मान गिरवी रखकर लिया कर्ज
शहबाज शरीफ ने खुलासा किया, “मैं कैसे बताऊं कि हमने मित्र देशों से कर्ज के लिए किस तरह के अनुरोध किए? मित्र देशों ने हमें कभी निराश नहीं किया, लेकिन जो कर्ज मांगने जाता है, उसका सिर झुका रहता है।” उन्होंने आगे कहा कि कर्ज लेने से दायित्व बनते हैं, जिन्हें पूरा करना पड़ता है। कर्ज की मजबूरी में आत्मसम्मान की कीमत चुकानी पड़ती है। समझौते करने पड़ते हैं। कभी-कभी अनुचित मांगें भी आ जाती हैं, और उन्हें बिना वजह के पूरा करना पड़ता है।
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का कहना है, “जब आप कर्ज लेने जाते हैं, तो आपका सिर झुका होता है। कर्ज लेना आत्मसम्मान पर बोझ डालता है। हम और आसिम मुनीर दुनिया भर में घूमकर पैसे मांगते हैं, और हमें शर्मिंदगी महसूस होती है। कई बार ऐसी चीजें माननी पड़ती हैं, जिन्हें हम कहना नहीं चाहते।”
शरीफ ने मित्र देशों का शुक्रिया अदा किया कि उन्होंने मुश्किल वक्त में साथ दिया। लेकिन साथ ही यह भी माना कि कर्ज मांगने की यह पूरी प्रक्रिया कितनी मुश्किल और अपमानजनक होती है। पाकिस्तान अभी भी इन देशों और IMF पर काफी निर्भर है, ताकि कर्ज चुकता कर सके और अर्थव्यवस्था चलती रहे।













