बांग्लादेश: जमात चीफ ने कहा “औरतें उसकी पार्टी का नेतृत्व नहीं कर सकतीं!”
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बांग्लादेश: जमात चीफ ने कहा “औरतें उसकी पार्टी का नेतृत्व नहीं कर सकतीं!”

बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी प्रमुख शफीकुर रहमान ने अल जजीरा को दिए इंटरव्यू में कहा कि महिलाएं पार्टी की मुखिया नहीं बन सकतीं, क्योंकि अल्लाह ने मर्द-औरत को अलग बनाया। फरवरी चुनाव में जमात ने एक भी महिला को टिकट नहीं दिया।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by कुलदीप सिंह
Jan 31, 2026, 01:13 pm IST
in विश्व
Bangladesh Jamat Chief women leadership

बांग्लादेश में जब शेख हसीना के खिलाफ आन्दोलन हुआ था और जब वे अपना वतन छोड़कर भारत आई थीं, तो कई महिलाओं के चेहरे पर हर्ष था। भारत से लेकर बांग्लादेश तक कथित प्रगतिशील महिलाओं का कहना लगातार यही था कि फासीवादी सरकार से मुक्ति मिली। फासीवादी सरकार गई। शेख हसीना जैसी सरकार किसी को प्रतिनिधित्व नहीं दे रही है। ऐसा बार-बार लिखा कि शेख हसीना ही है, जिसके कारण राजनीतिक आवाजें सत्ता में नहीं हैं। शेख हसीना चली गईं और फिर कथित आजाद विचारों की सरकार आ गई। उसने आते ही क्या किया, उसे बार-बार कहा जा चुका है। परंतु उसने महिलाओं के साथ जो किया, वह और भी हैरानी वाली बात है।

कई महिलाएं, जिन्होंने शेख हसीना को हटाने के लिए जमकर कार्य किया, वे अब हतप्रभ हैं, और जैसे प्रश्न पूछ रही हैं कि क्या इसीलिए हमारा साथ लिया था? अब जब सियासी लड़ाई है, तब उन्हें अकेला छोड़ दिया है। हाल ही में अपना मेकओवर कर रही जमात ने महिलाओं को लेकर एक बहुत ही चौंकाने वाला बयान दिया है। जमात के चीफ ने कहा है कि उसकी पार्टी की मुखिया कभी भी एक औरत नहीं हो सकती है और साथ ही अमीर शफीकुर रहमान ने यह भी कहा कि जमात ने याने वाले संसदीय चुनावों में एक भी महिला को टिकट नहीं दिया है।

फरवरी में होने वाले चुनावों में महिला उम्मीदवार 4% से भी कम

फरवरी में होने वाले चुनावों में महिला उम्मीदवारों की संख्या 4% से भी कम है। यह सभी दलों की महिला विरोधी मानसिकता को दर्शाता है, जमात ने तो एक भी महिला को टिकट नहीं दिया है और जमात ने यह घमंड से स्वीकार भी किया है। एनएनआई के अनुसार शफीकुर रहमान ने कहा कि यह मुमकिन ही नहीं है कि कोई औरत उनकी पार्टी की मुखिया बने और यह तर्क दिया कि अल्लाह ने औरत और आदमियों को अलग बनाया है। शफ़ीकुर रहमान आ इशारा बछे पैदा करने और स्तनपान कराने को लेकर था कि ऐसे जैविक अंतर ही नेतृत्व वाली भूमिकाओं को निर्धारित करते हैं।

इसे भी पढ़ें: भारत दुनिया का सबसे बड़ा ‘डिजिटल हाईवे’: पाञ्चजन्य के ‘बात भारत की’ कार्यक्रम में बोले ज्योतिरादित्य सिंधिया

मजहब और अल्लाह का हवाला देकर महिला उत्पीड़न

अल जजीरा इंग्लिश में श्रीनिवास जैन को दिए गए इस इस इंटरव्यू में शफ़ीकुर रहमान से पूछा गया कि क्या जमात का नेतृत्व कभी किसी महिला द्वारा किया जा सकता है? तो इस पर उसका जबाव काफी चौंकाने वाला है। उसने मजहब और अल्लाह का हवाला देकर इनकार कर दिया। इसमें वह कह रहा है कि अल्लाह ने औरत और मर्द को अलग अलग बनाया है। औरत बच्चे पैदा करती है और अल्लाह ने जो किया है, उसमें कोई दखल नहीं दे सकता है। इस पर पत्रकार की ओर से प्रश्न आता है कि हो सकता है कि सभी महिलाएं बच्चे न पैदा करना चाहें और यदि वे चाहती भी हैं तो भी क्यों वे जमात जैसे संगठन का नेतृत्व नहीं कर सकती हैं? इस पर शफीकुर का कहना था कि वे सही से ड्यूटीज पूरी नहीं कर पाएंगी।

इस पर पत्रकार ने जब कहा कि आप ऐसे देश के विषय में बात कर रहे हैं जहां पर महिलाएं प्रधानमंत्री रही हैं। तो क्या यह कहना है कि देश का नेतृत्व तो महिला सम्हाल सकती हैं, परंतु जमात जैसे संगठन का नहीं? बीएनपी के साथ जमात सरकार में रही थी, जब खालिदा जिया प्रधानमंत्री थीं। तो इस पर शफीकुर रहमान का कहना था कि वह उनकी पार्टी का फैसला था और जमात का इससे कोई लेना-देना नहीं था। हालांकि यह बेहद निंदनीय बयान है, परंतु भारत में बैठे उन लोगों के लिए यह बहुत बड़ी बात नहीं है, जिन्होनें शेख हसीना के हटने का स्वागत किया था और उन्हें भी यह पता ही था कि जमात जैसे कट्टरपंथी तत्व ही इन सबके पीछे हैं, मगर फिर भी उन्होनें शेख हसीना के जाने का स्वागत किया। कौन सी ताकतें इसके पीछे थीं, यह सभी को पता था क्योंकि “अमी रजाकार” का नारा लगाकर लोगों ने यह तो बता ही दिया था कि कौन सी मानसिकता इस आंदोलन के पीछे है।

जमात महिला उम्मीदवार को क्यों नहीं दे रहा मौका

ऐसा भी कहा जा रहा है कि इस इंटरव्यू में उसने इस सवाल के जबाव में कि आखिर जमात ने एक भी महिला उम्मीदवार को क्यों नहीं उतारा तो उसका कहना था कि पार्टी अभी भी महिला नेताओं को तैयार करने की प्रक्रिया में है। यह उसी प्रकार का उत्तर है, जो अफगानिस्तान में तालिबान लड़कियों की शिक्षा प्रतिबंधित करने के बाद से लगातार कह रहा है कि अभी वे लोग शरिया के अनुसार तालीम बनाने का काम कर रहे हैं। और साढ़े चार साल से वे अभी तक बात ही कर रहे हैं और इसी बीच अफगानिस्तान में तालिबान ने लड़कियों को भीतर बंद कर दिया है।

जमात भी महिलाओं के लिए तमाम वादे कर रही है जैसे कि उनके काम के घंटे कम करना आदि। इसे लेकर जमात का कहना है कि महिलाओं पर माँ बनने की जिम्मेदारियाँ होती हैं। इसलिए उनके काम के घंटे कम होने चाहिए। यह देखना और भी अधिक रोचक है कि कैसे महिलाओं के प्रति दमनवादी विचारों को दबा कर उन्हें मातृत्व का चोला पहनाया जा रहा है और उस पर भी भारत में उस वर्ग मे पूरी तरह से चुप्पी है, जो शेख हसीना के जाने पर हर्षित और आह्लादित थे।

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