सुप्रीम कोर्ट ने ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ वाली लिस्ट पर बड़ा फैसला सुनाया है, जो शुरू में पश्चिम बंगाल के वोटर लिस्ट रिवीजन से जुड़ा था, लेकिन अब पूरे देश में लागू हो गया है। ये मामला स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़ा है, जिसमें इलेक्शन कमीशन वोटर लिस्ट को अच्छे से जांच कर रहा है।
क्या है पूरा मामला?
SIR की शुरुआत बिहार से हुई थी और अब 12 से ज्यादा राज्यों में चल रही है। पश्चिम बंगाल में इस दौरान बहुत सारे वोटर्स की डिटेल्स में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ दिखीं, यानी नाम, उम्र, पैरेंट्स के नाम या दूसरी बेसिक जानकारी में मेल नहीं खा रही थी। करीब 1.25 करोड़ नाम इस कैटेगरी में आए थे। लोग परेशान थे कि उनका वोटर नाम कट सकता है। TMC के नेता और दूसरे पॉलिटिशियन कोर्ट में गए थे।
सुप्रीम कोर्ट का निर्देश?
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने तमिलनाडु से जुड़े DMK के नेताओं की पिटीशन पर सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि जिन वोटर्स को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ में डाला गया है, उनकी लिस्ट पब्लिक प्लेस पर लगाई जाए – जैसे पंचायत ऑफिस, तहसील या तालुका ऑफिस में। लिस्ट में वजह भी लिखी जाए कि क्या प्रॉब्लम है और कौन से डॉक्यूमेंट्स देने होंगे। वोटर को 10 दिन का समय मिलेगा डॉक्यूमेंट्स जमा करने का। जो अधिकारी डॉक्यूमेंट्स लेगा, वो रसीद जरूर देगा। सुनवाई तालुका लेवल के अफसर करेंगे, ताकि फैसला जल्दी और सही हो। साथ ही कोर्ट ने DGP, SPs और कलेक्टर्स को कहा कि कोई कानून-व्यवस्था की समस्या न आने दे, ताकि SIR का काम बिना रुकावट चले।
चुनाव आयोग का एक्शन
EC के वकील ने कोर्ट से निवेदन किया कि ये प्रकिया सिर्फ तमिलनाडु तक सीमित न रहे, बल्कि सभी राज्यों में जहां SIR चल रहा है, वहां लागू हो। बेंच ने ऑर्डर में लिखा – “हम उम्मीद करते हैं कि EC इन निर्देशों को पूरे भारत में लागू करेगा।” यानी ये फैसला अब ऑल-इंडिया लेवल पर प्रभावी है।
एक और महत्वपूर्ण बात
कोर्ट ने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की तरफ से पेश हुए प्रशांत भूषण की दलील पर भी कमेंट किया। उन्होंने कहा था कि अगर कोई वोटर खुद डिक्लेयर कर दे कि वो इंडियन सिटिजन है, तो EC उसका नाम नहीं काट सकता। अगर कोई शक है कि वो बांग्लादेश से आया है, तो शिकायत करने वाले को बांग्लादेश की वोटर लिस्ट से प्रूफ लाना चाहिए। बेंच ने हंसते हुए कहा, “ये तो संभव नहीं है। बांग्लादेश की वोटर लिस्ट से नाम कैसे मिलेगा?”
तीन महीने लंबी सुनवाई पूरी
कोर्ट ने SIR की कांस्टीट्यूशनल वैलिडिटी पर तीन महीने की लंबी सुनवाई पूरी कर ली है। दोनों तरफ से अलग-अलग दलीलें आईं। अब ये ऑर्डर वोटर्स के लिए राहत की बात है, क्योंकि प्रोसेस ट्रांसपेरेंट हो गया है – नाम छिपाकर नहीं काटे जा सकते, डॉक्यूमेंट्स देने का मौका मिलेगा और रसीद भी जरूरी है।
















