27 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी ने कांग्रेस को भंग कर ‘लोक सेवक संघ’ में बदलने की इच्छा जताई थी। क्या आरएसएस आज उसी विचार को साकार कर रहा है?
क्या आप जानते हैं, स्वतंत्र भारत के निर्माण के समय महात्मा गांधी ने एक ऐसा सपना देखा था, जो आज भी अधूरा है। 27 जनवरी 1948 को, हत्या से महज तीन दिन पहले, उन्होंने एक नोट में लिखा कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपना उद्देश्य पूरा कर लिया है। अब इसे राजनीतिक संगठन के रूप में भंग कर देना चाहिए और यह ‘लोक सेवक संघ’ हो जाए-एक ऐसा संगठन जो सत्ता की प्रतिस्पर्धा से दूर रहकर जनसेवा, सामाजिक-आर्थिक स्वतंत्रता और नैतिक उत्थान पर केंद्रित हो। गांधीजी ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि कांग्रेस “इसे राजनीतिक पार्टियों और सांप्रदायिक संगठनों के साथ गलत मुकाबले से दूर रखना होगा। इन और ऐसे ही दूसरे कारणों से A.I.C.C. मौजूदा कांग्रेस संगठन को खत्म करने और नीचे दिए गए नियमों के तहत एक लोक सेवक संघ बनाने का फैसला करती है, जिसमें ज़रूरत पड़ने पर नियमों को बदलने का अधिकार होगा।” उन्होंने इसे ‘His Last Will and Testament’ के रूप में प्रस्तुत किया, जो 2 फरवरी 1948 को हरिजन में प्रकाशित हुआ। उनकी यह इच्छा अनसुनी रह गई। कांग्रेस ने सत्ता की कुर्सी संभाली और गांधीजी के सपने को राजनीतिक महत्वाकांक्षा में बदल दिया।
गांधीजी का अंतिम संदेश
आज, जब हम गांधीजी के इस अंतिम संदेश को याद करते हैं, तो एक सवाल उठता है—क्या कोई संगठन उनके लोक सेवक संघ के विचार को वास्तविकता में जमीन पर उतार सकता है? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यों पर नजर डालें तो कई पहलुओं में यह गांधीजी के उस सपने से मेल खाता नजर आता है।
आरएसएस एक गैर-राजनीतिक, स्वयंसेवी संगठन है, जो अनुशासन, राष्ट्रसेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और आपदा राहत पर जोर देता है। कोरोना महामारी के दौरान आरएसएस के स्वयंसेवकों ने बिना किसी राजनीतिक लाभ की अपेक्षा के लाखों लोगों को भोजन, ऑक्सीजन और चिकित्सा सहायता पहुंचाई। प्राकृतिक आपदाओं में राहत कार्य, स्वच्छता अभियान, सामाजिक सद्भाव और युवाओं में राष्ट्रभक्ति का प्रसार-ये सभी प्रयास गांधीजी के उस विचार से जुड़ते हैं जिसमें उन्होंने कांग्रेस को सत्ता से अलग कर एक सेवा-केंद्रित सामाजिक संगठन बनाने की बात कही थी।
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गांधीजी के सपने को साकार कर रहा संघ
गांधीजी ने लोक सेवक संघ को स्वयंसेवी आधारित, गांव-केंद्रित और नैतिक मूल्यों पर टिका हुआ बताया था। आरएसएस की शाखाएं, सेवा कार्य और संगठनात्मक संरचना इस दिशा में एक व्यावहारिक रूप दिखाती है। हालांकि गांधीजी और आरएसएस के बीच कुछ वैचारिक मतभेद रहे हैं, लेकिन उनके अंतिम नोट को यदि मूल रूप से देखें, तो आरएसएस जैसा संगठन सत्ता-मुक्त सेवा के उनके सपने के करीब दिखता है। जहां कांग्रेस ने गांधीजी की इच्छा को नजरअंदाज कर परिवार-केंद्रित राजनीति अपनाई, वहीं आरएसएस ने सत्ता से दूरी बनाकर लोक-सेवा का मार्ग चुना।
गांधीजी के सपने से दूर है कांग्रेस
दूसरी ओर, कांग्रेस की यात्रा गांधीजी के सपने से पूरी तरह विपरीत रही। आजादी के बाद कांग्रेस ने सत्ता की लालसा में आंतरिक लोकतंत्र और नैतिकता को ताक पर रख दिया। गांधीजी की हत्या के बाद सुरक्षा में लापरवाही के सवालों पर कोई गंभीर जांच नहीं हुई। 20 जनवरी 1948 को उन पर पहले हमला हुआ था, फिर भी 30 जनवरी को सुरक्षा इतनी ढीली क्यों रही-इस पर मीडिया और कांग्रेस ने चुप्पी साध ली। महाराष्ट्र में चितपावन ब्राह्मणों पर हुए हमलों और नरसंहार पर भी कांग्रेस सरकार से कोई सवाल जवाब नहीं हुआ। आरएसएस पर गांधी हत्या की सारी जिम्मेवारी डाल कर, केन्द्र में मौजूद उस समय की कांग्रेस सरकार को सभी तरह की जवाबदेही से मीडिया ने मुक्त कर दिया।
कांग्रेस शासनकाल में मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सत्ता के संरक्षण में रहा। इमरजेंसी (1975-77) के दौरान सेंसरशिप के बावजूद कांग्रेस-अनुकूल पत्रकारों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। नीरा राडिया टेप कांड में प्रमुख पत्रकारों के नाम आए, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। 1984 के सिख नरसंहार में कांग्रेस सरकार थी, लेकिन मीडिया ने पार्टी नेताओं से कड़े सवाल नहीं पूछे। बोफोर्स घोटाले में भी कई पत्रकारों ने इसे दबाने की कोशिश की। राजीव शुक्ला जैसे पत्रकारों ने स्वीकार किया कि कांग्रेस की आलोचना करने पर राजीव गांधी ने तारीफ की, क्योंकि इससे एक कांग्रेसी पत्रकार, निष्पक्ष दिखता था और उसकी विश्वसनीयता बढ़ती थी- और पार्टी को भी उनकी कांग्रेस-निष्ठा पर कभी संदेह नहीं हुआ। सुप्रिया श्रीनेत जैसे उदाहरण भी इसी इकोसिस्टम को दर्शाते हैं, जहां राजनीतिक कनेक्शन से पत्रकारिता में अच्छी नौकरी आसानी से मिलती रही।
2014 के बाद कई पत्रकार खुद को ‘विपक्ष की भूमिका’ में देखने पर जोर देते दिखाई देते हैं। वे कहते हैं कि मीडिया को सत्ता के खिलाफ खड़ा होना चाहिए। लेकिन कांग्रेस की सरकारों के समय से आज तक ये पत्रकार महात्मा गांधी की अंतिम इच्छा या उनकी सुरक्षा में हुई लापरवाही पर कोई सवाल नहीं उठा पाते हैं? फिर भी चाहते हैं कि इन्हें निष्पक्ष माना जाए!
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भाजपा के खिलाफ तो दशकों से एक मजबूत विरोध की दीवार खड़ी की गई थी। दूसरी तरफ कांग्रेस के साथ ‘नियंत्रित आलोचना’ की नीति पर मीडिया काम कर रहा था। इसलिए सोनिया गांधी को लेकर मीडिया में आलोचना के तेवर हमेशा सुस्त रहे। याद है ना, कैसे जेवियर मोरो की द रेड साड़ी भारत में प्रतिबंधित कर दी गई लेकिन मीडिया ने इसकी खबर कानों कान किसी को नहीं होने दी। आज पूरे देश के सामने यह बड़ा सवाल है-क्या महात्मा गांधी का सपना राजनीतिक दलों की सत्ता की लालच में कहीं खो गया? या फिर लोक-सेवा के रास्ते पर कोई संगठन आज भी उस सपने को जिंदा रख सकता है? आरएसएस का कामकाज इस दिशा में एक संभावना जरूर दिखाता है। ऐसे समय में कांग्रेस को गंभीर आत्मचिंतन करना होगा-क्या वह वाकई महात्मा गांधी के सच्चे उत्तराधिकारी है, या उनके सपनों को अनदेखा करने वाली राजनीतिक पार्टी?












