तालिबान का नया आपराधिक कोड: आजादी की बजाय नयी गुलामी की शुरुआत?
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तालिबान का नया आपराधिक कोड: आजादी की बजाय नयी गुलामी की शुरुआत?

तालिबान ने 119 आर्टिकल्स के नए कोड से गुलामी, पति द्वारा हिंसा और अपराध साबित करने के लिए केवल कबूलनामा को वैध बनाया। अफगानिस्तान में मानवाधिकार संकट गहराया।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by कुलदीप सिंह
Jan 29, 2026, 01:46 pm IST
inविश्व, विश्लेषण
Afghan Taliban new code

प्रतीकात्मक तस्वीर

अफगानिस्तान में तालिबान अदालतों द्वारा एक बहुत चौंकाने वाले कोड जारी किये हैं। इन कोड्स को पढ़ने के बाद एक बार फिर से तालिबान ने अपना वही रूप दिखा दिया है, जिसे लेकर लोगों के मन में चिंताएं थीं। इन कोड्स के सामने आने के बाद एक बार फिर से वे क्षण ताजा हो रहे हैं, जिनमें तालिबान के सत्ता में आने को अमेरिका की हार और स्थानीयता की जीत बताया जा रहा था। ऐसा कहा जा रहा था कि अब अफगानिस्तान आजाद हो गया है। भारत में कथित प्रगतिशीलों का एक बहुत बड़ा वर्ग इस बात से ही रोमांचित था कि अब भारत में भी क्रांति आएगी और देखते ही देखते भाजपा भी जाएगी।

और यह कहा गया था कि अब अफगानी नागरिक हर तरह के संघर्ष से मुक्त हो गए हैं। मगर क्या वास्तव में अफगानी नागरिक किसी गुलामी से आजाद हुए या फिर एक ऐसी गुलामी में फंस गए, जिससे निकलना अभी हाल फिलहाल संभव नहीं दिखता है। उनके लिए जंग समाप्त नहीं हुई, बल्कि और भी तेज हो गई। जैसे-जैसे सत्ता में तालिबान की मजबूती बढ़ी और देशों ने राजनीतिक दूरी मिटानी आरंभ की, वैसे ही अपने नागरिकों के लिए वह ऐसे कानून के साथ आए हैं, जिनका उनके ही देश में विरोध हो रहा है।

साल के आरंभ होते ही अफगानिस्तान में एक ऐसी शुरुआत हुई है, जिसकी किसी ने कल्पना ही नहीं की थी या फिर की होगी। 4 जनवरी 2026 को तालिबान ने 119 आर्टिकल्स, 10 चैप्टर्स और 3 सेक्शनस के साथ नए आपराधिक प्रक्रिया कोड प्रांतों की अदालतों के पास लागू होने के लिए भेजे। सबसे हैरानी की बात यह रही कि इन कानूनों को लागू करने से पहले न ही चर्चा हुई, न ही कोई बात हुई और न ही लोगों को सूचित किया गया।

ये कोड बहुत ही खतरनाक हैं। यह पूरी तरह से नागरिकों को नियंत्रित करने के लिए बनाए गए कोड्स हैं और इनमें किसी भी प्रकार का कानूनी संरक्षण नहीं है। अफगानिस्तान में मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन rawadari ने विस्तार से इन कोड्स के विषय में लिखा है। उन्होनें rawadari.org पर इसके विरोध में प्रेस रिलीज जारी करते हुए लिखा है कि यह दस्तावेज धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति भेदभाव को कानूनी जामा पहनाता है और साथ ही व्यक्तियों की मूल आजादी का उल्लंघन करता है, फिर चाहे वह मानव गरिमा हो, अभिव्यक्ति और विचारों की आजादी ही क्यों न हो और साथ ही उन्हें मनचाहे तरीके से गिरफ्तार किया जा सकता है और दंड भी दिया जा सकता है।

इसमें खुद के बचाव की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई है और साथ ही इनमें व्यक्ति को अपने बचाव में वकील का भी अधिकार नहीं है। और कोड में न ही न्यूनतम और न ही अधिकतम दंड का प्रावधान है। इसके साथ ही अपराध को सिद्ध करने में केवल “कूबूलनामे” का ही प्रावधान है। अर्थात यदि व्यक्ति ने यह कुबूल कर लिया है कि उसने अपराध किया है तो उसे ही अंतिम माना जाएगा। अब इससे यह भी खतरा है कि जबरन अपराध स्वीकार कराने के लिए अत्याचार बढ़ेंगे।

मजहब के आधार पर भेदभाव

इस संगठन की साइट के अनुसार, इसमें लिखा है कि ये कोड्स मजहबी भेदभाव का कारण बनेगा। अब प्रश्न उठता है कि पहले ही अफगानिस्तान में मुस्लिम ही हैं, हिन्दू, सिख, बौद्ध आदि तो हैं नहीं, तो फिर मजहबी भेदभाव कैसे होगा? तो इस प्रेस रिलीज में लिखा है कि “क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के आर्टिकल 2 का क्लॉज़ आठ हनफ़ी विचारधारा [हनफ़ी कानून] के मानने वालों को मुसलमान बताता है, जबकि “अहले-सुन्नत वल-जमाअत” से अलग या उसके खिलाफ़ दूसरे पंथों और मान्यताओं के मानने वालों को “मुबतदेह” या “विधर्मी” बताता है।“

अर्थात हनफी से इतर कोई भी विचार इन कोड्स के अनुसार मुसलमान नहीं है। और जाफरी शिया, इस्माइली जैसे मुस्लिमों को ही मुस्लिम नहीं माना है। इसके अतिरिक्त यदि जनहित में है तो उन लोगों को मारा भी जा सकता है, जो इस्लाम के विरोधी झूठे विश्वासों का बचाव करते हैं या फिर ऐसे विश्वास वालों को जो लोग बुलाते हैं, उन्हें भी मारा जा सकता है। और साथ ही इस्लामिक कानूनों का मजाक उड़ाना भी दंडनीय है। हनाफी विचार वाले लोग अपना मजहब नहीं बदल सकते हैं और यदि ऐसा होता है तो उन्हें दो साल की कैद हो सकती है।

महिलाओं के प्रति हिंसा

महिलाओं के प्रति भी हिंसा इसमें अनुमत है। इसके आर्टिकल 32 में लिखा है कि “अगर शौहर औरत को छड़ी से मारता है और इस वजह से उसे गंभीर चोट लगती है, जैसे कि “घाव या शरीर पर नील पड़ना”, और औरत यह बात जज के सामने साबित कर देती है, तभी शौहर को पंद्रह दिन की जेल होगी।“ मगर इन कोड्स में महिलाओं के खिलाफ दूसरे तरह की शारीरिक हिंसा, मानसिक हिंसा और यौन हिंसा को इस दस्तावेज़ में साफ़ तौर पर मना नहीं किया गया है और उन्हें नज़रअंदाज़ किया गया है।

इसके अतिरिक्त और भी स्तब्ध करने वाली बातें हैं, जैसे कि आर्टिकल 4 का क्लॉज़ 5, जो “हद्द” और “ताज़ीर” के बीच अंतर के बारे में है, कहता है कि “हद्द की सज़ा इमाम दे सकता है” और “ताज़ीर की सज़ा” शौहर और मालिक दे सकते हैं, जो सीधे तौर पर शौहर द्वारा घरेलू हिंसा को सही ठहराता है। इसमें आगे लिखा है कि “इसी तरह, आर्टिकल 34 में कहा गया है कि अगर कोई महिला अपने शौहर की इजाज़त के बिना बार-बार अपने वालिद के घर या दूसरे रिश्तेदारों के घर जाती है और शौहर के कहने पर भी घर वापस नहीं आती है, तो उस महिला और उसके परिवार या रिश्तेदारों के किसी भी सदस्य को, जिसने उसे शौहर के घर जाने से रोका है, अपराधी माना जाएगा और उसे तीन महीने की जेल की सज़ा होगी।

अर्थात अगर शौहर मारता पीटता भी है तो भी वह अपने वालिद के घर नहीं जा सकती है। यह महिलाओं को पूरी तरह से कैद में रखने के लिए बनाए गए कानून हैं। यह प्रावधान उन महिलाओं के प्रति बहुत निर्दयी है जो अपने शौहरों की हिंसा और बुरे बर्ताव से बचने के लिए अपने माता-पिता या रिश्तेदारों के घर शरण लेती हैं और यह उन्हें लगातार घरेलू हिंसा का शिकार बनाता है और उनसे परिवार और समाज की सुरक्षा छीन लेता है, जो औपचारिक और कानूनी उपायों की कमी में घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए एकमात्र बची हुई सुरक्षा है।

यह गुलाम की भी बात करता है। इन कोड्स में गुलाम और गुलामी की भी लगातार बातें की गई हैं। और इन कोड्स में “आजाद” लोग “गुलाम  लोगों से एकदम अलग बताए गए हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि तालिबान ने गुलामी को कानूनी जामा पहना दिया है। इमामों को यह आजादी और ताकत दी गई है कि वह भ्रष्ट या गैर-मजहबी को सजा दे सकते हैं और साथ ही विद्रोहियों को भी मौत की सजा दे सकते हैं, जिनके विषय में यह सुनिश्चित हो जाए कि इनके कदमों से लोगों को नुकसान होगा और मौत ही एकमात्र सजा है। इसके साथ ही तमाम ऐसे तमाम प्रावधान हैं, जिन्हें लेकर हंगामा मचा हुआ है। मगर इन हँगामों से अफगानिस्तान में कुछ परिवर्तन होगा, इसमें संदेह ही है।

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