भारत—यूरोपीय संघ की मुक्त व्यापार संधि ने जहां नई दिल्ली और यूरोपीय संघ के सभी देशों में आशा और उत्साह का संचार किया है, व्यापारिक और रणनीतिक संबंधों में एक नई और परस्पर सहयोग की राह पर बढ़ने का खाका सामने रखा है, वहीं भारत पर टैरिफों की बरसात कर अपनी चिढ़न दिखाने वाले अमेरिका के मीडिया ने इसे एक प्रकार से ट्रंप की भारत विरोध की नीतियों की हार बताया है। ब्लूमबर्ग और न्यूयार्क टाइम्स ने तो खुलकर इस संधि से अमेरिका के सिंहासन के डोलने के संकेत दिए हैं।
क्या लिखता है न्यूयार्क टाइम्स
न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट का शीर्षक ही इस ‘डील’ को ‘ट्रम्प की छाया में, भारत और यूरोपीय संघ ने व्यापार संबंध बढ़ाने’ वाली बताया है। अखबार ने इस समझौते को दो बड़े लोकतंत्रों के बीच आर्थिक एकीकरण को गहरा करने वाला बताया है और वह भी ऐसे समय में जब वाशिंगटन के व्यापार संबंध तेजी से गैर भरोसेमंद होते गए हैं।
द वॉल स्ट्रीट जर्नल की टिप्पणी
द वॉल स्ट्रीट जर्नल के लिए सबसे महत्वपूर्ण रहा इस संधि का व्याप। अखबार खुद कहता है कि यह समझौता लगभग दो अरब उपभोक्ताओं को जोड़ने वाला एक मुक्त व्यापार समझौता है। उसने छापा कि यह यूरोपीय संघ द्वारा अब तक किया गया सबसे बड़ा आबादी से जुड़ा मुक्त व्यापार समझौता है। वॉल स्ट्रीट जर्नल ने इस समझौते को एक बड़े ‘ट्रेंड’ का हिस्सा बताया है, जिसमें बड़ी अर्थव्यवस्थाएं ट्रम्प युग के टैरिफ के जवाब में वैकल्पिक व्यापार नेटवर्क बना रही हैं। यानी ट्रंप का अक्खड़ रवैया एक तरफ रख अब विश्व के महत्वपूर्ण और बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश डॉलर की धमक से बाहर आने को बेताब दिख रहे हैं और अपने हित में फैसले लेकर एक बड़ी आबादी के हित में सोच रहे हैं।

कारोबारी चैनल सीएनबीसी ने अपनी रिपोर्ट में मोदी के शब्द उद्धृत किए हैं और इस समझौते को कई जगह ‘मदर आफ आल डील्स’ ही लिखा है। इसकी रिपोर्ट इस बात पर केंद्रित है कि कैसे यह समझौता सप्लाई चेन को नया रूप दे सकता है, यूरोपीय ऑटो, मशीनरी और फार्मास्युटिकल निर्यात में सुधार कर सकता है और भारतीय कपड़ा और सेवाओं को ज्यादा पहुंच दे सकता है। रिपोर्ट में इस समझौता का होना अमेरिका-भारत और अमेरिका-यूरोपीय संघ के बीच जारी व्यापार विवादों से उलट दर्शाया गया है।
उधर एनबीसी न्यूज की रिपोर्ट में समझौते को भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा गया है। रिपोर्ट में इस समझौते को ‘एक ऐतिहासिक व्यापार समझौता बताया गया है क्योंकि दोनों पक्ष अमेरिका के रवैए को देखते हुए अपने अपने कारोबार के हित में सोच रहे हैं। एनबीसी ने इस बात पर जोर दिया है कि यह समझौता वैश्विक जीडीपी का लगभग एक चौथाई और विश्व व्यापार का एक तिहाई हिस्सा कवर करता है, जो भारत के सबसे बड़े संरक्षित बाजार को यूरोप के लिए खोलता है, जबकि यह ब्रुसेल्स को वाशिंगटन पर अपनी सतत निर्भरता से परे विविधता लाने की सुविधा देता है।
द डिप्लोमैट ने इस ‘डील’ को ‘ट्रम्प से परे एक बहुध्रुवीय व्यापार व्यवस्था’ कहा है। इस प्रख्यात पत्र ने तर्क दिया है कि यह समझौता भारत के विकास इंजन को यूरोप के औद्योगिक आधार से जोड़कर वैश्विक वाणिज्य को नए सिरे से आगे बढ़ाता है।
ब्लूमबर्ग ने यह छापा
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अक्खड़ व्यवहार के विरुद्ध तेजी से बदलते वैश्विक समीकरणों को आगे रखती है। यूरोपीय संघ व्यापार नीति पर भारतीय अधिकारियों के साथ लंबे समय तक चली चर्चाओं के बावजूद, अमेरिका और चीन पर अपनी आर्थिक निर्भरता कम करने पर ध्यान दे रहा है। जबकि भारत ट्रंप के 50 प्रतिशत टैरिफ को बेअसर करने की कोशिश कर रहा है, साथ ही रूस के साथ संबंधों में भी संतुलन बना रहा है।
गल्फ न्यूज की रिपोर्ट
खाड़ी देशों का प्रमुख मीडिया गल्फ न्यूज लिखता है, ‘यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिका के टैरिफ और चीनी एक्सपोर्ट कंट्रोल के सामने ब्रूसेल्स और नई दिल्ली दोनों नए बाजार खोलने की कोशिश कर रहे हैं।
यूरोपीय आयोग के प्रेस वक्तव्य के अनुसार, इस समझौते से 2032 तक भारत को यूरोपीय संघ के सामानों का एक्सपोर्ट दोगुना होने की उम्मीद है, क्योंकि नई दिल्ली ने 96.6 प्रतिशत शिपमेंट पर टैरिफ खत्म करने या कम करने पर सहमति जताई है। भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने कहा है कि इसके बदले में, यूरोपीय संघ सात साल में भारत से आयात होने वाले 99.5 प्रतिशत सामानों पर टैरिफ खत्म करेगा या कम करेगा।

बेशक, यह अब तक का भारत का सबसे महत्वाकांक्षी व्यापार समझौता है। नई दिल्ली ने 250,000 यूरोप-निर्मित वाहनों को रियायती ड्यूटी दरों पर देश में आने की अनुमति देने पर सहमति जताई है। यह कोटा हाल के अन्य समझौतों की तुलना में छह गुना से भी ज्यादा है। यह समझौता भारत को ट्रंप के टैरिफ से बुरी तरह प्रभावित श्रम-प्रधान सामानों, जैसे कपड़े, रत्न, आभूषण और जूते-चप्पल के एक्सपोर्ट में प्रतिस्पर्धी बढ़त देगा। भारत ने अपने संवेदनशील डेयरी क्षेत्र को इस समझौते से बाहर रखा है।
यूरोपीय आयोग की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन की यह टिप्पणी मायने रखती है कि ‘भारत आगे बढ़ा है और यूरोप इससे सच में खुश है क्योंकि जब भारत सफल होता है, तो दुनिया ज्यादा स्थिर, ज्यादा समृद्ध और ज्यादा सुरक्षित होती है। यह समझौता एक मजबूत संदेश देता है कि सहयोग वैश्विक चुनौतियों का सबसे अच्छा जवाब है।’ उधर, इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड के अनुमानों के अनुसार, भारत इस साल चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है।

















