पश्चिम बंगाल में निर्वाचन आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया राजनीतिक-विवाद का विषय बन गई है, वैसे ही जैसे बिहार में विधानसभा चुनाव के पहले हुआ था। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे ऐसे राजनीतिक हथियार के रूप में पेश किया है, जो खासतौर से गरीब, प्रवासी, अल्पसंख्यक और अन्य कमजोर समुदायों के मतदाताओं को निशाना बनाता है, जिनके पास अक्सर सही दस्तावेज या स्थिर पते नहीं होते हैं’।
निर्वाचन आयोग के अनुसार एसआईआर का उद्देश्य डुप्लीकेट प्रविष्टियों को हटाना, त्रुटियों को ठीक करना और यह सुनिश्चित करना है कि पात्र मतदाताओं के नाम ही सूची में रहें। आयोग ने इस बात को भी रेखांकित किया है कि पश्चिम बंगाल में सूची का सत्यापन कर रहे चुनाव-कर्मचारियों के लिए धमकी भरे माहौल में काम करना मुश्किल हो रहा है। उसने राज्य की मुख्यमंत्री पर उत्तेजक भाषण देने, एसआईआर के बारे में भ्रामक दावे करने और जनता के मन में संदेह पैदा करने का आरोप लगाया है।

यह मसला अब सर्वोच्च न्यायालय में है, जिसे तय करना है कि चुनाव आयोग की स्वायत्तता की रक्षा कैसे की जाए और उसके अधिकारियों के लिए सुरक्षित कामकाजी परिस्थितियों को कैसे सुनिश्चित किया जाए। साथ ही यह भी कि वास्तविक मतदाताओं के नाम सूची से कटने से किस प्रकार रोके जाएं। साथ ही, क्या आयोग की प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष है, जिसमें गलत तरीके से नाम हटाए जाने के खिलाफ सुरक्षा उपाय हैं? और कि राज्य सरकार क्या संविधानिक संस्थाओं की आलोचना से जुड़ी मर्यादा-रेखा पार कर चुकी है?
न्यायालय के निर्देश पर अमल शुरू
राज्य में विधानसभा चुनाव इस साल 7 मई से पहले हो जाने चाहिए। ऐसे में मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की व्यवस्था को जल्द से जल्द पूरा किए जाना जरूरी है। अब सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को उन लोगों की सूची प्रकाशित करने का निर्देश दिया है, जिन्हें उन्होंने गणना प्रपत्रों में ‘तार्किक विसंगतियों’ का हवाला देते हुए नोटिस भेजा है। इसके अलावा अदालत ने आयोग और राज्य सरकार को कुछ सुझाव भी दिए हैं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) मनोज कुमार अग्रवाल को निर्देश जारी किए हैं कि 24 जनवरी तक उन लोगों के नाम सार्वजनिक किए जाएं, जिनके नाम में तार्किक विसंगति या वे ‘अनमैप्ड’ श्रेणी में आए हैं। ये नाम हर तालुका के ग्राम पंचायत भवन, ब्लॉक कार्यालय और शहरी इलाकों में वार्ड कार्यालयों में लगाए जाएंगे, ताकि लोग आसानी से जानकारी देख सकें। आशा है कि इन पंक्तियों के प्रकाशन तक ऐसी सूचियां सामने आ चुकी होंगी।
आयोग ने यह भी कहा है कि हर मतदान क्षेत्र के लिए एक तय जगह बनाई जाए, जैसे ग्राम पंचायत भवन, ब्लॉक ऑफिस या वार्ड ऑफिस, जहां प्रभावित लोग अपने दस्तावेज जमा कर सकें और अपनी बात रख सकें। कोशिश की जाए कि ऐसी जगह मतदान केंद्र के पास ही हो। आयोग ने यह भी कहा है कि जिन लोगों ने अब तक अपने दावे, दस्तावेज या आपत्तियां जमा नहीं की हैं, उन्हें नाम सार्वजनिक होने की तारीख से अगले 10 दिन तक का अतिरिक्त समय दिया जाए।
आयोग का दृढ़ निश्चय है कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो, ताकि किसी भी पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची से न हटे और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर लोगों का भरोसा बना रहे। आम शिकायत है कि लोगों को नोटिस का जवाब देने के लिए सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करनी होगी। उनमें इस बात को लेकर घबराहट है कि इसके कारण उनकी नागरिकता पर सवाल न खड़े होने लगें, वगैरह।

वापस लौट रहे बांग्लादेशी
मीडिया रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि प. बंगाल में सैकड़ों, हजारों गैर कानूनी तरीके से रह रहे बांग्लादेशी प्रवासी बांग्लादेश लौट रहे हैं। ये लोग कचरा बीनने, राज मिस्त्री या घरेलू नौकर के रूप में काम करते थे। वर्षों से पश्चिम बंगाल में रहते हुए उन्होंने दलालों और स्थानीय राजनीतिक हस्तियों के माध्यम से जाली भारतीय दस्तावेज (आधार, मतदाता कार्ड, राशन कार्ड) हासिल कर लिए थे। डर यह था कि बूथ स्तर के अधिकारी (बीएलओ) घर-घर जाकर सत्यापन और उनके मतदाता विवरणों की जांच करेंगे, जो एनआरसी जैसी प्रक्रिया होगी। उसके बाद उनका संभावित निर्वासन किया जाएगा।
लूटे जा रहे कागजात
पश्चिमी बंगाल में कई जगहों से फॉर्म 7 और दूसरे कागजात लूटे जाने की घटनाएं सुनाई दी हैं। मतदाता सूची संशोधन की इस प्रक्रिया में सबसे ज्यादा विवाद ‘मृत’ या ‘शिफ्टेड’ मतदाताओं के नाम हटाने (फॉर्म-7) को लेकर हो रहा है। राजनीतिक दलों को डर है कि इस प्रक्रिया की आड़ में उनके समर्थकों के नाम जानबूझकर हटाए जा सकते हैं। यही कारण है कि वार्ड स्तर पर राजनीतिक एजेंट अब एक-एक फॉर्म की निगरानी कर रहे हैं, जिससे झड़प की आशंकाएं बढ़ रही हैं। ऐसी घटनाओं के चलते राज्य में एसआईआर प्रक्रिया पूरी होने में कुछ देरी हो सकती है। पहले से तय सुनवाई और अंतिम मतदाता सूची प्रकाशन की समय सीमा क्रमशः 7 और 14 फरवरी है। अब तक, पश्चिम बंगाल सीईओ कार्यालय ने उन मतदाताओं के लिए अंतिम दिशानिर्देश जारी नहीं किए हैं जिन्हें सुनवाई नोटिस प्राप्त हुए हैं। यह चुनाव आयोग से स्पष्ट दिशानिर्देश जारी होने तक लंबित है। सीईओ कार्यालय के सूत्रों के अनुसार, नए दिशानिर्देश प्रकाशित होने के बाद, जो लोग सुनवाई में शामिल होने के इच्छुक या असमर्थ हैं, उन्हें भाग लेने का एक और अवसर दिया जाएगा।
आयोग के सूत्रों के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद, निर्धारित समय के भीतर सुनवाई पूरी करना और त्रुटिहीन अंतिम मतदाता सूची बनाना कठिन है। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) के कार्यालय से जुड़े सूत्रों के अनुसार चुनाव आयोग ने यह निर्दिष्ट नहीं किया है कि सुनवाई प्रक्रिया में कितना समय लगेगा या अंतिम मतदाता सूची कब प्रकाशित की जाएगी।

राजनीतिक रंग
बेशक मतदाता सूची के परिमार्जन में बरती गई पारदर्शिता, सरलता और मतदाता की सुविधा एक ऐसा विषय है, जिसे सुलझाया जाना चाहिए। उम्मीद है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश इसे सही रास्ते पर लाने में कामयाब होंगे। दूसरी तरफ इस मसले को राजनीतिक रंग देने और उसे लेकर हंगामा खड़ा करने से संदेह पैदा होते हैं। पश्चिम बंगाल की प्राथमिक या प्रारूप सूची में से करीब 58 लाख नाम हटाए गए हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में दो करोड़ नाम हटे हैं। पर दोनों राज्यों में राजनीतिक प्रतिक्रियाएं अलग-अलग हैं। बंगाल में आयोग ने विसंगति वाले मतदाताओं की संख्या जो शुरू में 1.36 करोड़ थी, अब घटाकर 95 लाख कर दी है। इन विसंगतियों के अनेक कारण हैं, जिन्हें समझना होगा।
एसआईआर पूरे देश में हो रहा है, लेकिन ऐसी स्थिति कहीं और नहीं दिख रही है। पश्चिम बंगाल में कई केंद्रों पर हिंसक घटनाएं हो रही हैं और कई तरह की अफवाहें फैलाई गई हैं। बंगाल की राजनीति में ऐसी हिंसा आम बात हो चली है। इसका ताजा उदाहरण है ‘आई-पैक’ पर ईडी का छापा, जिसे रोकने के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी न केवल खुद पहुंची, बल्कि कुछ दस्तावेज़ों को अपने कब्जे में कर लिया, जिनकी संभवतः ईडी को तलाश थी।
एसआईआर को लेकर तमाम हो-हल्ले के संदर्भ में यह बात कम महत्वपूर्ण नहीं है कि बिहार में ‘मतदाता सूची के शुद्धिकरण’ के बाद कोई अपील दायर नहीं की गई और राज्य में कहीं भी पुनर्मतदान की आवश्यकता नहीं पड़ी। मतदान की प्रक्रिया के कुछ महीने पहले से एसआईआर को लेकर जिस तरीके के हंगामा हो रहा था, उसे देखते हुए मतदान के दौरान या उसके बाद कहीं से विरोध की एक आवाज भी सुनाई नहीं पड़ रही है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने 21 जनवरी को इस मामले पर सुनवाई के दौरान कहा कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण का तरीका प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए, यानी यह उचित और निष्पक्ष होना चाहिए। अदालत ने राज्य में विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) के संचालन में विसंगतियों का आरोप लगाने वाली तृणमूल कांग्रेस नेताओं की याचिकाओं पर सुनवाई फिर से शुरू की है, जिसके कारण उन्हें मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया। अदालत ने राज्य सरकार को भी कई प्रकार के निर्देश दिए हैं, ताकि जगह-जगह हो रहे टकरावों और हिंसा को रोका जा सके।
एक व्यक्ति के 200 बच्चे!
21 जनवरी को सुनवाई से पहले, चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल एक हलफनामे में कहा कि पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में पाई गई ‘तार्किक विसंगतियों’ के कई उदाहरण विज्ञान की अवहेलना करते हैं। दो मतदाता 200 से अधिक बच्चों वाले, सात मतदाता 100 से अधिक बच्चों वाले, 10 मतदाता 50 से अधिक बच्चों वाले और अन्य 10 मतदाता 40 से अधिक बच्चों वाले पाए गए। ऐसे कई उदाहरणों को वैध मैपिंग के रूप में स्वीकार करना वैज्ञानिक रूप से असंभव है। चुनाव आयोग इस आलोचना पर आपत्ति जताता है कि ‘तार्किक विसंगतियां’ लोगों को मताधिकार से वंचित करने का एक तरीका है>
उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार ने हटे नामों को लेकर किसी साजिश का उल्लेख नहीं किया है, जबकि पश्चिमी बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने प्रक्रिया शुरू होने के पहले से ही उसे साजिश बता दिया था। ममता बनर्जी ने इसे केंद्र-राज्य विवाद के रूप में पेश किया और निर्वाचन आयोग पर तमाम आरोप जड़ दिए हैं। संयोग से इसी दौरान राज्य में तृणमूल कांग्रेस के चुनाव प्रचार से जुड़ी एक प्राइवेट एजेंसी के दफ्तर पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) का छापा भी कुछ इसी किस्म के विवाद की शक्ल ले चुका है और वह मामला भी सर्वोच्च न्यायालय के सामने है। राज्य में एसआईआर से जुड़ी सुनवाई और दस्तावेजों के परीक्षण की प्रक्रिया चल रही है, जिसमें धक्का-मुक्की, मारपीट और हिंसा की घटनाएं भी हो रही हैं।

‘आई-पैक’ की छानबीन
हर महत्वपूर्ण चुनाव से पहले बंगाल में केंद्र-राज्य झगड़ा खड़ा किया जाता है। इस बार भी चुनाव के ठीक पहले ऐसी ही स्थितियां हैं। गत 8 जनवरी को पोलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (आई-पैक) के परिसर और इसके सह-संस्थापक और निदेशक प्रतीक जैन के आवास पर प्रवर्तन निदेशालय की छापेमारी के बाद ऐसा ही देखने को मिला। यह एजेंसी 2019 से तृणमूल कांग्रेस के चुनाव रणनीतिकार के रूप में काम कर रही है। इस प्रकरण में मुख्ममंत्री ममता बनर्जी के व्यक्तिगत हस्तक्षेप से स्थिति और बिगड़ी। और फिर मुख्यमंत्री के खिलाफ ईडी के पहले उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय जाने से स्थिति और बिगड़ी। उच्च न्यायालय में मामला जाने पर अदालत में ही हंगामा किया गया, जिसके कारण सुनवाई नहीं हो पाई। ममता बनर्जी को हरे रंग की फाइल के साथ जैन के आवास से बाहर निकलते हुए देखा गया। ममता का कहना था कि ‘इसमें पार्टी की चुनावी रणनीति का विवरण था, जिसे चुराने की कोशिश ईडी ने की थी। ईडी का असली लक्ष्य तृणमूल की उम्मीदवार सूची, चुनाव रणनीति दस्तावेज और एसआईआर-संबंधित डेटा था।’ उन्होंने देखते ही देखते इस मसले को राजनीतिक रंग दे दिया और अगले दिन एक रैली भी निकाली।
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल अपनी आपराधिक याचिका में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को प्रतिवादी बनाया है। इस मामले में राज्य के पुलिस महानिदेशक राजीव कुमार, कोलकाता पुलिस आयुक्त मनोज वर्मा, दक्षिण कोलकाता के डीसीपी प्रियव्रत रॉय और सीबीआई को भी प्रतिवादी बनाया गया है। इसके अलावा, केंद्र सरकार के गृह सचिव और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के सचिव को भी पक्षकार बनाया गया है। इस मामले की अगली सुनवाई फरवरी के पहले सप्ताह में तय की गई है।
ईडी का आरोप है कि 8 जनवरी को जब उसकी टीम पोलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (आई-पैक) के प्रमुख प्रतीक जैन के आवास और कार्यालय में तलाशी के लिए गई थी, तब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दस्तावेजों व इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को हटवा दिया था। एजेंसी का दावा है कि मुख्यमंत्री के काफिले के साथ राज्य पुलिस के कुछ वरिष्ठ अधिकारी भी आए थे। उन्होंने जांच में बाधा डाली। ईडी के मुताबिक, इन घटनाओं के वीडियो सबूत उसके पास मौजूद हैं, जिन्हें अदालत में पेश किया जा सकता है।
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के निदेशक राहुल नवीन भी कोलकाता जाने वाले हैं। उनका कहना है कि हाल के घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए, वह ईडी के अधिकारियों से उनके और कार्यालय परिसर के लिए समस्त कार्य परिस्थितियों और सुरक्षा इंतजाम की भी जानकारी लेंगे। सूत्रों के अनुसार, ईडी आई-पैक प्रमुख प्रतीक जैन से पूछताछ के जरिए यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि संस्था को हवाला के जरिए जो धन मिला, उसका स्रोत क्या था और उसका उपयोग किन उद्देश्यों के लिए किया गया। एजेंसी यह भी जांच कर रही है कि क्या इस धन का इस्तेमाल राजनीतिक अभियानों या अन्य गतिविधियों में किया गया।
यह जांच कोयला तस्करी घोटाले से जुड़ी मनी लॉन्ड्रिंग की जांच का हिस्सा है। इसमें मुख्य आरोपी अनूप माजी पर आरोप है कि उसने ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ईसीएल) के लीज क्षेत्र से अवैध कोयला खनन कर उसे पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा, बर्दवान, पुरुलिया सहित अन्य जिलों की फैक्टरियों और संयंत्रों को बेचा। इस अवैध कारोबार से जुटाई गई बड़ी रकम को हवाला नेटवर्क के जरिए इधर-उधर किया गया।

ऐसे होगी मैपिंग
‘मैपिंग’ एक तकनीकी शब्द है जिसका उपयोग चुनाव आयोग द्वारा किसी मतदाता की वंशावली को 2002 की सूची से जोड़ने के लिए किया जाता है। चुनाव आयोग लोगों ने कहा कि उसने निर्णय किया है कि जिन मामलों में छह या अधिक ने खुद को एक ही व्यक्ति से जोड़ा है, उन्हें ‘लिंकेज की वैधता के संबंध में अधिक जांच’ की आवश्यकता है। आयोग के हलफनामे से पता चलता है कि 4,59,054 ऐसे मामले पाए गए हैं जिनमें मतदाताओं के पांच से अधिक बच्चे हैं। छह से अधिक बच्चों वाले मतदाताओं की संख्या 2,06,056 है। कुछ मामलों में, एक ही माता-पिता से जुड़े मतदाताओं की संख्या 50 से अधिक है। माता-पिता और बच्चों के बीच 50 साल के अंतर को भी एक तार्किक विसंगति के रूप में चिह्नित किया गया है। चुनाव आयोग ने तर्क दिया कि 45 वर्ष की आयु के बाद महिलाओं की प्रजनन दर नगण्य हो जाती है।
हलफनामे में विस्तार से बताया गया है कि 16 दिसंबर, 2025 को प्रकाशित ड्राफ्ट रोल में उनकी अनुपस्थिति, मृत्यु, सामान्य निवास के स्थायी स्थानांतरण और प्रविष्टियों के दोहराव के कारण 58 लाख मतदाताओं को बाहर कर दिया गया था। चुनाव आयोग ने कहा कि हम इसे ‘हटाना’ नहीं कहेंगे। मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के अनुसार, कई मामलों में फर्जी मतदाताओं ने असली मतदाताओं से झूठे रिश्ते जोड़कर अपने नाम मतदाता सूची में बनाए रखने की कोशिश की। एक अधिकारी ने बताया कि कुछ वरिष्ठ नागरिक मतदाताओं को 8-10 लोगों का पिता या माता दिखाया गया, जबकि जांच में सामने आया कि उनके वास्तव में केवल दो ही बच्चे हैं और सूची में दर्ज अन्य लोगों से उनका कोई रक्त संबंध नहीं है।
आयोग के अनुसार, पिछली एसआईआर का मतदाता सूची के साथ जुड़ाव किया जाता है। जिनका जुड़ाव नहीं मिलता उन्हें नोटिस जारी किया जाता है। नोटिस जारी होने पर, यदि मतदाता का नाम गलती से छोड़ दिया गया है, तो वह पिछली मतदाता सूची के साथ जुड़ाव का उद्धरण प्रस्तुत कर सकता है, और उस स्थिति में, उसका नाम अंतिम मतदाता सूची में जरूर शामिल हो जाएगा। केवल गलत या गंभीर अनियमितताओं से ग्रस्त मैपिंग और 2002 की मतदाता सूची से जुड़े न होने पर ही जांच की जाएगी।

















