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जानिए क्यों मनाते हैं बसंत पंचमी? क्यों पहनते हैं पीले वस्त्र?

सनातन में बुद्धि,विद्या,ज्ञान  वाणी और संगीत की अधिष्ठात्री देवी के रुप में माता सरस्वती शिरोधार्य हैं।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा — edited by Mahak Singh
Jan 23, 2026, 10:55 am IST
in भारत
Basant Panchami 2026

Basant Panchami 2026

देवी सरस्वती, परम चेतना की अभिव्यक्ति हैं और अक्षर ब्रम्ह को शब्द ब्रम्ह के रुप में प्रकट करती हैं । सरस्वती के रुप में ये हमारी प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हम में जो मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती हैं। सनातन में बुद्धि,विद्या,ज्ञान  वाणी और संगीत की अधिष्ठात्री देवी के रुप में माता सरस्वती शिरोधार्य हैं।

प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनानामणित्रयवतु- ऋग्वेद

भगवान विष्णु के निर्देशानुसार ब्रम्हा ने सृष्टि की रचना कर दी पर सब कुछ मौन था,इसलिए ऐसा लगता था कि सर्जना अधूरी रह गई। तब ब्रह्मा जी ने बसंत पंचमी की तिथि पर इस समस्या के निवारण के लिए अपने कमण्डल से जल अपनी हथेली में लेकर संकल्प स्वरुप उस जल को छिड़ककर भगवान विष्णु का आवाहन किया। भगवान विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने समस्या के निराकरण के लिए आदि शक्ति माँ दुर्गा का आवाहन किया। भगवती दुर्गा प्रकट हुईं और उन्होंने ब्रम्हा तथा विष्णु जी के मंतव्य को जाना, तदुपरांत आदिशक्ति दुर्गा माता के शरीर से श्वेत रंग का एक दिव्य तेज प्रकट हुआ, जो एक दिव्य नारी के स्वरुप में बदल गया। यह विलक्षण स्वरुप एक चतुर्भुजी सुंदर देवी का था, जिनके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ में कमंडलु-कमल। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं अक्षमाला थी। ये क्रमशः संगीत, पवित्रता, ज्ञान और एकाग्रता के प्रतीक हैं। चारों भुजायें मन,बुद्धि, अहंकार और चेतना की नियंत्रक हैं एवं चारों वेदों के साथ सृष्टि के चार गुणों क्रमशः सत्व, रजस, तमस और चेतना का प्रतिनिधित्व करती हैं।

देवी सरस्वती ने वीणा की प्रथम झंकार की और तभी सब मूक प्राणियों में वाणी का उदय हुआ और प्रकृति गुंजायमान हुई तथा विभिन्न स्वरूपों में पल्लवित और पुष्पित होकर सर्वत्र मुस्कुरा उठी। जल धारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन के चलने में सरसराहट होने लगी। देवताओं ने शब्द और रस का संचार कर देने वाली देवी को वाणी की अधिष्ठात्री देवी “सरस्वती” कहा। आदिशक्ति भगवती दुर्गा ने ब्रम्हा जी से कहा कि मेरे तेज से उत्पन्न हुईं, ये देवी सरस्वती आपकी पत्नी बनेंगी, जैसे लक्ष्मी श्री विष्णु की शक्ति हैं, पार्वती महादेव शिव की शक्ति हैं उसी प्रकार ये सरस्वती देवी ही आपकी शक्ति होंगी। ऐसा कह कर आदिशक्ति माँ दुर्गा सब देवताओं के देखते – देखते वहीं अंतर्धान हो गयीं। इसके बाद सभी देवता सृष्टि के संचालन में संलग्न हो गए।

कथित सेकुलरों और वामपंथियों ने की गलत व्याख्य

यह कितना दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण है कि मध्य और ब्रिटिश काल में विधर्मियों ने तदुपरांत,तथाकथित सेक्युलरों और वामपंथियों ने वैदिक ग्रंथों की गलत व्याख्या और पुराणों से छेड़छाड़ कर,यह स्थापित करने का प्रयास किया है,कि ब्रम्हा ने अपनी पुत्री सरस्वती से विवाह कर लिया, परन्तु उक्त मत प्रवाह सर्वथा असत्य और अनुचित है,क्योंकि ब्रम्हा जी की पत्नी देवी सरस्वती का प्राकट्य आदिशक्ति माँ दुर्गा से हुआ है, जो परा विद्या की अधिष्ठात्री देवी हैं। यह भ्रम की स्थिति इसलिए उत्पन्न की गई क्योंकि ब्रह्मा जी की मानस पुत्री का नाम भी सरस्वती है,जो अपरा विद्या की अधिष्ठात्री देवी है, इनका विवाह भगवान विष्णु से हुआ था। माँ सरस्वती को वागीश्वरी, भगवती, शारदा, भारती वीणावादिनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसन्त पंचमी के दिन को इनके प्रकटोत्सव के रुप में भी मनाते हैं।

इसलिए मनाते हैं बसंत पंचमी

बसंत पंचमी का पर्व माघ शुक्ल पक्ष में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन तिथि पर माता सरस्वती का प्राकट्य हुआ था। इसलिए इस दिन ज्ञान, विद्या और वाणी की देवी सरस्वती की विशेष पूजा की जाती है। बसंत पंचमी से ही सरस्वती पूजा की परंपरा चली आ रही है।

यह भी पढ़ें- Basant Panchami 2026: जानें सही तारीख, शुभ मुहूर्त और मां सरस्वती पूजा का महत्व

क्यों पहनते हैं पीले वस्त्र?

धार्मिक कथाओं के अनुसार, सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण ने पीतांबर धारण कर माघ शुक्ल पक्ष में माता सरस्वती की पूजा की थी। तभी से बसंत पंचमी पर पीले वस्त्र पहनने और सरस्वती पूजा करने की परंपरा प्रचलित हुई। पीले रंग का आध्यात्मिक महत्व है। बसंत पंचमी के दिन पीले रंग का विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि माता सरस्वती को पीले पुष्प, पीले वस्त्र और पीले रंग से बनी वस्तुएं अत्यंत प्रिय हैं। पीला रंग प्रसन्नता, सकारात्मकता और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है, जो मन को शांति और ऊर्जा प्रदान करता है। प्रकृति से जुड़ा पीला रंग नवजीवन का संकेत देता है।

ऋतु परिवर्तन होता है शुरू 

बसंत पंचमी के साथ ही ऋतु परिवर्तन शुरू हो जाता है। कड़ाके की ठंड के बाद मौसम सुहावना होने लगता है।खेतों में सरसों के पीले फूल खिलने लगते हैं, पेड़ों पर नई कोपलें आती हैं। ऐसे में पीला रंग प्रकृति के उल्लास और नवजीवन का प्रतीक बन जाता है।

पीले रंग का महात्म्य

ज्योतिषीय दृष्टि से पीले वस्त्र बड़ा महत्व है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, पीला रंग गुरु ग्रह से जुड़ा हुआ है।गुरु ग्रह ज्ञान, धर्म, शिक्षा और धन के कारक माने जाते हैं। बसंत पंचमी पर पीले वस्त्र धारण करने से गुरु ग्रह मजबूत होता है और विद्या व समृद्धि में वृद्धि होती है। बसंत पंचमी पर पीले कपड़े पहनना केवल परंपरा नहीं, बल्कि आस्था, प्रकृति और ज्योतिष से जुड़ा एक गहरा संकेत है।यह दिन ज्ञान, सकारात्मकता और नए आरंभ का प्रतीक माना जाता है।

वैज्ञानिक और पर्यावरणीय महत्व

वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टि से बसंत पंचमी में,प्रकृति और मानव जीवन में,पंचतत्व, क्रमशः पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश का संतुलन और सौम्य समाहार दृष्टिगोचर होता है। ऋतुराज बसंत का आगमन होता है। माघ शुक्ल पंचमी में बसंत के आगमन का सनातन में एक अत्यंत महत्वपूर्ण उपाख्यान है। तारकासुर को वरदान था कि उसका वध भगवान शिव के पुत्र (कार्तिकेय )से ही हो सकता था,परन्तु शिव तो समाधि में थे। इसलिए समाधि भंग करने के लिए बसंत, कामदेव के साथ अवतरित हुए थे।

कालिदास का कुमारसंभव

सबसे सुंदर कथा कालिदास के कुमारसंभव में मिलती है।इन्द्र के निर्देशन में शिव की समाधि भंग करने के लिए कामदेव अपने मित्र बसंत के साथ हिमालय पहुंचे। हिमालय नई कौपलों और पुष्पों से आच्छादित हो गया।अग्निदेव ने समाधि से भंग करने के लिए महती भूमिका निभाई और पलाश के रूप फैल गए। कालिदास लिखते हैं कि-

“बालेन्दु वक्त्राण्यविकासमावाद्व्भु:,
सद्यो वसन्तेन समागतानां नखक्षतानीव वनस्थलीनाम्” 

अर्थात् बाल चंद्रमा के से आकार वाले पलाश के अत्यंत लाल फूल चारों ओर ऐसे फैले हुए थे, मानो वसंत ने आते ही वनस्थली के साथ विहार किया हो।

चार तिथियां हैं अबूझ

सनातन धर्म में चार तिथियों को अबूझ (नित्य )मुहूर्त माना गया है,क्रमशः बसंत पंचमी, अक्षय तृतीया, भड़ली नवमी, देव प्रबोधिनी एकादशी (देव उठनी ग्यारस)। आपको किसी भी मांगलिक कार्य के लिए इन तिथियों में पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं होती है। इन अबूझ तिथियों में बसंत पंचमी वर्ष का प्रथम अबूझ मुहूर्त होता है।

Topics: बसंत ऋतु का आध्यात्मिक महत्वGoddess Saraswatireligious significance of Basant Panchamiorigin story of Goddess SaraswatiBasant Panchami 2026बसंत पंचमी 2026Importance of Saraswati Pujaपीले वस्त्र पहनने का महत्व
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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