सद्ज्ञान, प्रेम और शौर्य का महापर्व है वसंत पंचमी
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सद्ज्ञान, प्रेम और शौर्य का महापर्व है वसंत पंचमी

हमारे सनातन हिंदू दर्शन में मां सरस्वती को मनुष्य की चेतना में निहित उस चैतन्य शक्ति का प्रतीक माना जाता है जो उसे अज्ञान के अंधकार से सद्ज्ञान के प्रकाश की ओर अग्रसर करती है।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी — edited by Mahak Singh
Jan 22, 2026, 12:00 pm IST
inभारत
Basant Panchami 2026

Basant Panchami 2026

हमारे सनातन हिन्दू दर्शन में माँ सरस्वती को मनुष्य की चेतना में निहित उस चैतन्य शक्ति का प्रतीक माना जाता है जो उसे अज्ञान के अंधकार से सद्ज्ञान के प्रकाश की ओर अग्रसर करती है। ऋग्वेद में वर्णित कथानक के अनुसार सृष्टि की रचना के उपरान्त जीव जगत को स्वर देने के लिए सृजनकर्ता ब्रह्मा के आवाहन पर माघ शुक्ल पंचमी की शुभ तिथि को वरमुद्राधारी वीणा पाणी माँ सरस्वती ने अवतरित होकर मौन सृष्टि को स्वर दिया था। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माघ मास के गुप्त नवरात्र की पुण्य बेला में माँ सरस्वती के प्राकट्य पर हर्षित देवताओं ने उनकी स्तुति की। उक्त स्तुति से वेदों की ऋचाएं बनीं और उनसे वसंत राग बना और आनंदोत्सव मनाया गया। माना जाता है कि तभी से इस पर्व को ‘वसंत पंचमी’ और ‘वाग्देवी जयंती’ के रूप में मनाने की परम्परा शुरू हो गयी।

योगेश्वर श्रीकृष्ण ने किया था माँ सरस्वती का प्रथम पूजन

ब्रह्मवैवर्त पुराण में उल्लेख मिलता है कि सर्वप्रथम श्रीकृष्ण ने वसंतपंचमी के दिन ज्ञान व कला की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती का पूजन कर इस परम्परा का शुभारम्भ किया था। सरस्वती पूजा भारतीय साहित्य साधना के क्रमिक विकास का प्राण तत्व है जो आदि कवि वाल्मीकि की काव्यधारा का मूल स्वर बना तथा महाभारत में वेद व्यासजी की सर्जना का भी। वैष्णव धर्मावलंबी वसंत पंचमी को “श्रीपंचमी”के रूप में मनाते हैं। मान्यता है कि इसी दिन राधा-कृष्ण का मिलन हुआ था। इस दिन वृंदावन के श्रीराधा श्यामसुंदर मंदिर में राधा-कृष्ण महोत्सव का भव्य आयोजन होता है। कहते हैं कि यह परम्परा द्वापर युग से चली आ रही है।

राष्ट्र की सर्वाधिक प्राचीन पर्व परम्परा है वसंतोत्सव

वसंतोत्सव हमारे राष्ट्र की सर्वाधिक प्राचीन पर्व परम्परा है। प्रेम, उमंग और सदज्ञान के इस रंग बिरंगे पर्व का अभिनंदन प्रकृति अपने मनमोहक श्रृंगार के साथ करती है। भविष्य पुराण में वसंत का चैत्रोत्सव के रूप में अत्यन्त सुंदर और सजीव वर्णन मिलता है। खास बात यह है कि माँ सरस्वती की उपासना व वसंत उत्सव वैदिक धर्मावलम्बियों तक ही सीमित नहीं है। बौद्ध व जैन मतावलम्बी भी देवी सरस्वती की उपासना व इस ऋतु पर्व को हर्षोल्लास से मनाते हैं। बौद्ध धर्म ग्रन्थ “साधनमाला” में इनका महासरस्वती, वज्रशारदा व वीणा सरस्वती आदि रूपों में उल्लेख मिलता है।

श्रीपंचमी से हरिशयनी एकादशी तक गाया जाता है वसंत राग

वसंत पर्व का शुभारम्भ बसंत पंचमी से होता है और होलिकोत्सव पर उल्लास की चरम परिणति के साथ वंसतोत्सव का आनन्द परिपूर्ण होता है। इस दिन को अबूझ मुहूर्त वाला माना जाता है अर्थात सब कुछ शुभ व मांगलिक। होलिका दहन के लिए होलिकाओं की स्थापना वसंत पंचमी से ही होती है। वसंत राग के गायन की शुरुआत भी श्री पंचमी से ही होता है। ‘संगीत दामोदर’ ग्रंथ के अनुसार वसंत राग श्री पंचमी से प्रारंभ होकर हरिशयनी एकादशी तक गाया जाता है। वसंत पंचमी के दिन सिख धर्म के “गुरु ग्रंथ साहब” में प्रयुक्त 31 शास्त्रीय रागों में प्रमुख ‘वसंत राग’ का मनोहारी कीर्तन गुरुद्वारों में किया जाता है। इस पर्व पर पर देश भर के शिक्षण संस्थानों में सार्वजनिक सरस्वती पूजन के आयोजन धूमधाम से किये जाते हैं। बताते चलें कि पंडित मदन मोहन मालवीय ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की नींव बसंत पंचमी के दिन ही रखी थी।

यह भी पढ़ें- Basant Panchami 2026: जानिए सही विधि से पूजा और कथा

वसंत पंचमी से जुड़े ऐतिहासिक शौर्य प्रसंग

जानना दिलचस्प हो कि वसंत पंचमी का पर्व भारतमाता के कई महान रणबांकुरे वीरों के शौर्य व बलिदान को भी नमन करता है। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार 16 बार हारने के बाद जब सत्रहवीं बार मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को छल के पराजित कर बंदी बनाकर काबुल (अफगानिस्तान) की जेल में डालकर उन पर बर्बर अत्याचार करते हुए उनकी आँखे फुड़वा दीं पर उनके हौसलों को नहीं डिगा पाया। पृथ्वीराज के अनन्य मित्र चंद्रबरदाई ने उनके साथ मंत्रणा कर गोरी से बदला लेने की योजना बना ली। योजना के तहत चंद्रबरदाई ने मोहम्मद गोरी के सामने प्रस्ताव रखा कि उनके सम्राट शब्दभेदी बाण चलाने में पारंगत हैं। नेत्रहीन होने के बाद भी आप उनकी इस क्षमता का प्रदर्शन भरे दरबार में देख सकते हैं। गोरी को उसकी बात पर भारी आश्चर्य हुआ किन्तु वह पृथ्वीराज का कौशल देखने को तैयार हो गया। सभी प्रमुख ओहदेदारों व नागरिकों को आयोजन में आमंत्रित किया गया। निश्चित तिथि को दरबार लगा और गोरी एक ऊंचे स्थान पर अपने मंत्रियों के साथ बैठ गया। नेत्रहीन पृथ्वीराज  उनको नियत स्थान पर लाकर उनकी बेड़ियां खोल उनके हाथों में धनुष बाण थमा दिया गया। पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार ज्यों ही चंद्रबरदाई ने पृथ्वीराज का गुणगान करते हुए गोरी के बैठने के स्थान को चिन्हित करते हुए यह पंक्तियां उच्चारित कीं-‘’चार बांस, चौबीस गज, अंगुल अष्ठ प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है, चूको मत चौहान।।‘’

पृथ्वीराज को गोरी की दिशा मालूम हो गयी और उन्होंने तुरंत बिना एक पल की भी देरी किये अपने एक ही बाण से गोरी को मार गिराया। चारों ओर भगदड़ और हाहाकार मच गया, इस बीच पृथ्वीराज और चंद्रबरदाई ने पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार एक-दूसरे को कटार मारकर अपने प्राण त्याग दिये। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार यह तिथि 1192 ई. की बसंत पंचमी की थी। इसी तरह लाहौर निवासी वीर बालक हकीकत राय का भी बसंत पंचमी का गहरा संबंध है। कहते हैं कि एक दिन मदरसे में पढ़ाई के दौरान जब कुछ देर के लिए शिक्षक कक्षा से बाहर गये तो हकीकत को छोड़ बाकी बच्चे शोरगुल मचाते हुए खेलने लगे। किसी बात पर कक्षा के मुस्लिम बच्चों ने जब माँ दुर्गा की हंसी उड़ायी तो क्रोधित हकीकत ने कहा कि ‘यदि मैं तुम्हारी बीबी फातिमा के बारे में कुछ कहूं, तो तुम्हें कैसा लगेगा?’ फिर क्या था, बात बढ़ते हुए काजी तक जा पहुंची। मुस्लिम शासन में आदेश हुआ कि हकीकत  इस्लाम कबूल करे या मृत्युदंड। हकीकत ने मुसलमान बनना स्वीकार नहीं किया। वीर हकीकत राय वसंत पंचमी के दिन स्वधर्म के लिये बलिदान हो गये।’ वसंत पंचमी हमें गोहत्या के खिलाफ मुखर आंदोलन चलाने वाले गुरु रामसिंह कूका की भी याद दिलाती है।1816 ई. में वसंत पंचमी के दिन लुधियाना के भैणी ग्राम में जन्मी इस महान विभूति ने अंग्रेजों की सत्ता की चूलें हिला दी थीं।

सरस्वती पूजन की आध्यात्मिक महत्ता

चूंकि वसंत ऋतु का मौसम अपने आप में एक अजब-सी खुमारी लिए होता है। इस अवधि में मन में काम भाव प्रेम की उमंगें जागृत होती हैं। नयी आशाओं एवं कामनाओं का जन्म होता है। ऐसे कामोद्दीपक काल में हमारे मनों में उमड़ती भावनाएं अनियंत्रित- उच्श्रृंखल न हों, उन पर विवेक का अंकुश लगा रहे, सम्भवतः इसलिए हमारे मनीषियों ने इस पर्व पर ज्ञान व विवेक की देवी मां सरस्वती की आराधना की विधान बनाया था। हमारा जीवन सद्ज्ञान और विवेक से संयुक्त होकर शुभ भावनाओं की लय से सतत संचरित होता रहे, इन्हीं दिव्य भावों के साथ की गयी माँ सरस्वती की भावभरी उपासना हमारे अंतस में सात्विक भाव भर देती है और हमारी आस्था पवित्र एवं प्रखर स्वरूप को प्राप्त करती है। वातावरण की यह सूक्ष्म चेतना प्रकृति के साथ मानव के अंतस में घुलकर वासन्ती उल्लास बिखेर कर सतत प्रवाहमान होती है, यही इस पर्व का मूल दर्शन है। भारत की महान ऋषि मनीषा कहती है कि मनुष्य की जीभ सिर्फ रसास्वादन के लिए नहीं है;  यह वाग्देवी (वाणी की देवी) का सिंहासन है। हम वाणी की महत्ता पहचानें तथा जो भी बोलें, सोच-समझ कर बोलें। वाणी का संयम और सदुपयोग ही वाग्देवी की आराधना का का मूलमंत्र है और वसंत पर्व का आध्यात्मिक संदेश भी।

अस्तित्व का सृजनात्मक राग है वसंत :  युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

वसंत पर्व को अपने आध्यात्मिक बोध दिवस के रूप में मनाने वाले गायत्री महाविद्या के महामनीषी युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के अनुसार वसंत का वास्तविक अर्थ है-अस्तित्व का सृजनात्मक राग। यह पर्व जीवन को उत्सव बनाना सिखाता है। यह पर्व धरती पर जीवन के नवोदय व अभ्युदय का एक अनूठा सुअवसर है जिसका लाभ हर भावनाशील मनुष्य को उठाना ही चाहिए।  उनका कहना था कि आधुनिकता, औद्योगिकता, कृत्रिमता के इस युग में वसंत ऋतु हममें से हरेक से प्रश्न करना व जानना चाहती है कि मनुष्य से मनुष्य का, मनुष्य से समाज का तथा मनुष्य व समाज से प्रकृति का यह अलगाव आखिर हमें कहां ले जा रहा है? बसंत की आध्यात्मिक महत्ता को परिभाषित करते हुए युग मनीषी पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य कहते हैं, “वसंत का अर्थ है अपने जीवन की ऊर्जा को उचित महत्त्व देना, तरुणाई को मान देना और सकारात्मक परिवर्तन की ओर कदम बढ़ाना।

Topics: Sanatan DharmaVasant PanchamiMother SaraswatiSpiritual Significance of Vasant PanchamiImportance of Saraswati PujaVasant Panchami 2026
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