अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा पट्टी में इजरायल-हमास युद्धविराम के दूसरे चरण के तहत एक ‘बोर्ड ऑफ पीस’ बनाने की पहल की है। यह बोर्ड गाजा में शांति बनाए रखने, पुनर्निर्माण और स्थिरता के लिए काम करेगा। ट्रंप ने कई देशों के नेताओं को इसमें शामिल होने का निमंत्रण भेजा है, जिसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम भी शामिल है। वाइट हाउस के एक अधिकारी के मुताबिक, कुल 50 देशों को यह निमंत्रण दिया गया है, और अनुमान है कि करीब 30 देश इसमें शामिल हो सकते हैं। यह प्रस्ताव 22 जनवरी 2026 को खबरों में प्रमुखता से चर्चा में आया।
बोर्ड ऑफ पीस का प्रस्ताव क्या है
यह बोर्ड गाजा से जुड़े शांति प्रयासों का हिस्सा है। इसमें शामिल देशों के नेता मिलकर गाजा में शासन, पुनर्निर्माण और निवेश जैसी चीजों पर नजर रखेंगे। ट्रंप का कहना है कि यह दुनिया में शांति और समृद्धि के लिए मजबूत कदम होगा। हालांकि, इसमें कुछ संवेदनशील मुद्दे हैं, जिस वजह से कई देश सतर्क हैं। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि स्थायी सदस्यता के लिए 1 अरब डॉलर जैसी फीस की बात भी सामने आई है, लेकिन आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं हुई है।
कौन-कौन से देश शामिल हो गए हैं
कई देशों ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया है। इनमें शामिल हैं अर्जेंटीना, आर्मीनिया, अजरबैजान, बहरीन, बेलारूस, मिस्र, हंगरी, कजाखस्तान, कोसोवो, मोरक्को, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), वियतनाम, पाकिस्तान। इसके अलावा कुछ अन्य कुछ अन्य रिपोर्टों में सऊदी अरब, तुर्की, उज्बेकिस्तान और कनाडा (सैद्धांतिक रूप से) के नाम भी जुड़े हैं। कुल मिलाकर 25 से ज्यादा देशों ने हामी भरी है।
किन देशों ने बनाई दूरी
वहीं कुछ देशों ने इसमें शामिल होने से साफ मना कर दिया है। इनमें प्रमुख हैं फ्रांस, नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क। इन देशों का कहना है कि यह बोर्ड अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था या संयुक्त राष्ट्र के ढांचे में दखल दे सकता है।
देशों ने नहीं लिया फैसला
जिन देशों ने ट्रंप के बोर्ड में शामिल होने को लेकर अभी तक कोई फैसला नहीं लिया है, उनमें ब्रिटेन, चीन, क्रोएशिया, इटली, यूरोपीय यूनियन की कार्यकारी शाखा, पराग्वे, रूस, सिंगापुर, स्लोवेनिया, तुर्किये और यूक्रेन शामिल है।
क्या है भारत की स्थिति
भारत को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम से निमंत्रण मिला है। अमेरिकी राजदूत ने भी इसकी जानकारी दी थी। लेकिन भारत ने अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, इस प्रस्ताव के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया जा रहा है, क्योंकि इसमें संवेदनशील मुद्दे जुड़े हैं। भारत ने न हामी भरी है और न ही साफ मना किया है – अभी सब कुछ विचाराधीन है।














