देहरादून: मसूरी के जंगल के बीच बनी बुल्लेशाह की अवैध मजार इनदिनों चर्चा में है। इसे अवैध मजार इसलिए कह सकते हैं क्योंकि इसके नीचे कोई फकीर दफन नहीं है। दरअसल बुल्लेशाह की मजार पाकिस्तान में है। कहा जाता है कि बुल्लेशाह नास्तिक थे। वे खुदा या ईश्वर को नहीं मानते थे। उनके सूफी गीत और कविताएं आज भी पाकिस्तान और भारत के पंजाब क्षेत्र में गाए जाते हैं। उनके मुर्शिद (मार्गदर्शक) लाहौर के मुर्शिद शाह इनायत कादिरी थे। वे रहस्यवादी कवि थे। वे कसूर में ही रहते थे और वहीं उन्हें सुपुर्द ए खाक किया गया। बुल्ले शाह की मजार कसूर शहर के ठीक बीच में स्थित है।
अब सवाल यह है कि जब बुल्लेशाह को पाकिस्तान के कसूर कस्बे में दफन किया गया तो मसूरी में उनके नाम की मजार या दरगाह कैसे बन गई ? उल्लेखनीय है पिरान कलियर की रुड़की में, ख्वाजा गरीब नवाज की अजमेर में एक ही मजार या दरगाह है। यानि सूफियों की एक ही स्थान पर मजार या दरगाह हो सकती है, फिर मसूरी में बुल्लेशाह की मजार कहां से आई ? यहां करीब एक दर्जन अवैध मजारें और भी बन गई हैं। ये कैसे बनी और क्यों? इस बारे में मजार प्रबंधन कोई जवाब नहीं दे रहा।
देहरादून जिला प्रशासन इस विषय पर जांच पड़ताल कर रहा है कि ये मजहबी संरचनाएं कब और किस उद्देश्य से बनाई गईं। डीएम सविन बंसल का कहना है कि अभी इस बारे में जांच की जा रही है। वहीं, बजरंग दल के सदस्यों का कहना है कि ये अवैध मजारें हैं और यहां बैठे लोग आस्था के नाम पर जनता को धोखा दे रहे है। इस तरह का फर्जीवाड़ा देवभूमि में नहीं चलने दिया जायेगा।














