जब तुम ग्रीक सीखना शुरू करो, तो पहली किताब जो तुम पढ़ो, वह ‘साइरोपेडिया’ होनी चाहिए।’ यह कहना था अमेरिकी इतिहास की सबसे प्रभावशाली शख्सियतों में से एक थॉमस जेफरसन का। उन्होंने यह बात एक पत्र में अपने पोते को लिखी थी। ‘सायरोपेडिया’ वह किताब है जो ईरान (फारस) के महान राजा सायरस द ग्रेट के जीवन और उनके चरित्र पर आधारित है। यही नहीं अमेरिका के छठे राष्ट्रपति जॉन क्विंसी एडम्स ने भी प्राचीन फारस की सभ्यता को आदर्श माना था। जेफरसन ने इस किताब की दो प्रतियां अपनी लाइब्रेरी में रखीं, जिनमें से एक आज लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस में सुरक्षित है। तात्पर्य यह कि अमेरिकियों में फारस (आज का ईरान) के प्रति गजब का आकर्षण रहा है, जो आज की कूटनीति देखकर हजम नहीं होता। कल्पना करना मुश्किल है कि जब अमेरिकी क्रांतिकारी ब्रिटिश साम्राज्यवाद से अपने गृहयुद्ध में लड़ रहे थे, तब वे प्राचीन फारस के साइरस को अपना आदर्श मानते थे। वह राजा जिसने यहूदियों को यरूशलम लौटाया और उनका दूसरा मंदिर बनाने की अनुमति दी। अमेरिकी संस्थापकों को यही मॉडल प्रेरित करता रहा-चर्च और राज्य का अलगाव, पांथिक स्वतंत्रता, जो अमेरिकी संविधान के पहले संशोधन में भी झलकती है।
क्रांति, तख्तापलट और अमेरिकी हस्तक्षेप
लेकिन आज, 2500 साल बाद, वही ईरान अमेरिका के लिए नासूर जैसा बन गया है। आज ईरान सुर्खियों में है, वहां सत्ता विरोधी जनांदोलन की खबरें हैं। सैकड़ों लोगों के मारे जाने की खबरों से सोशल मीडिया भरा पड़ा है। इसके पीछे कौन है, यह कोई भी पहली नजर में भांप सकता है। हालांकि कहा यह जा रहा है कि सालों की पाबंदी, महंगाई, बेरोजगारी, पैसे के अवमूल्यन ने आम ईरानी को थका दिया है। इस थकान के चलते ईरानी बगावत पर उतर आए हैं। लोग सड़कों पर हैं। सरकार ने सख्ती की तो लोग मारे जा रहे हैं। उधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लोगों से कहा है कि लड़ते रहो, मदद आ रही है। दरअसल, ईरान अमेरिका की हस्ती में चुभता हुआ वह कांटा है, जिसकी टीस उसकी पूरी कूटनीति को लहूलुहान करती रही है।
18वीं और 19वीं सदी का आकर्षण 20वीं सदी में बदल गया क्योंकि प्रशंसक अपने प्रशंसित से अधिक सामर्थ्यवान हो गया। दूसरे विश्वयुद्ध की जीत का जुनून सर पर था। 1950 से 1953 तक, अमेरिका की नीति ने एक नाटकीय मोड़ लिया। ईरान के लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसदेग ने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया। वह ब्रिटिश हितों को चोट पहुंचाने वाला था। जीत के दंभ मे चूर अमेरिका और ब्रिटेन के लिए यह किसी प्यादे द्वारा वजीर को ललकारने जैसा था। सीआईए के नेतृत्व में ऑपरेशन अजाक्स ने 1953 में तख्ता पलट दिया, और शाह पहलवी को सिंहासन पर बैठा दिया। फिर आया 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति का तूफान। अयातुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में शाह का तख्ता पलट गया। तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्जा हुआ और 444 दिनों तक बंधक संकट चला। अमेरिका ने पूरा जोर लगा दिया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। यह बड़े पहलवान को पटखनी दिए जाने की दास्तान थी।
परमाणु संघर्ष और प्रॉक्सी युद्ध
बहरहाल, इस घटना ने अमेरिकी शान और फारस को लेकर उनके ऊंचे सपनों को झकझोर कर रख दिया। यह पेंटागन के लिए गहरा सदमा था। पूर्व का वह आकर्षक फारस अब ‘दुश्मन’ बन गया। रोनाल्ड रीगन से लेकर जॉर्ज बुश तक, ईरान को ‘बुराई की धुरी का हिस्सा’ कहते रहे। इराक युद्ध के दौरान ईरान पर परमाणु हथियार रखने के आरोप लगे, प्रतिबंधों का दौर शुरू हुआ। ओबामा के जेसीपीओए यानी ज्वाइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन ने थोड़ी उम्मीद जगाई, लेकिन ट्रंप ने 2018 में इसे तोड़ दिया, और अधिकतम दबाव नीति से ईरान की अर्थव्यवस्था चरमरा गई। 2024-2026 तक आते-आते, कहानी और गहराती गई। महसा अमीनी की मौत से भड़के 2022 के विरोध प्रदर्शन अब भी सुलग रहे हैं। महिलाओं का हिजाब को लेकर विद्रोह, आर्थिक संकट और सरकारी दमन के चलते हुईं हजारों मौतें पूरी दुनिया में सुर्खियों में हैं।
अमेरिका ईरानी जनरल कासेम सुलेमानी को मार चुका है, परमाणु केंद्रों पर हमले किए हैं। 2021 में नतांज़ पर विस्फोट में इस्राएल को जिम्मेदार ठहराया गया। रिमोट-कंट्रोल्ड गन से जिस तरह परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फखरीजादेह को मारा गया, उसने बड़े-बड़ों की नींद उड़ा दी। और हालिया हमास-हिजबुल्लाह नेताओं, जैसे इस्माइल हानिया और हसन नसरल्लाह की मौतों ने ईरान के प्रॉक्सी युद्ध को कमजोर किया है। लेकिन सवाल ये भी है कि जब-जब अमेरिका ने लोगों की आजादी और लोकतंत्र के नाम पर दखल दिया है, वहां बेड़ा गर्क ही किया है। अफगानिस्तान, ईराक, सीरिया, वियतनाम के बाद ईरान में यदि तख्ता पलट होता है तो गृहयुद्ध अवश्यंभावी है।
आसान नहीं होगा बदलाव
अनिल त्रिगुणायत, पूर्व राजदूत
हमने ईरान में महिलाओं द्वारा हिजाब के खिलाफ विद्रोह होते देखा है। दूसरी ओर, सऊदी अरब ने सुधार करते हुए बहुत से प्रतिबंधों को हटा दिया है, लोगों को किसी मजहबी प्रतिबंध के लिए बाध्य नहीं किया जा रहा, बल्कि इसे उनकेे विवेक पर छोड़ दिया है। वे चाहें तो इसका पालन कर सकते हैं। भारत में भी ऐसा है। यहां मुस्लिम महिलाएं स्वतंत्र हैं, वे हिजाब पहनें या फिर न पहनें, यह उनका व्यक्तिगत मामला है। दुर्भाग्यवश, ऐसी घटनाओं का निहित स्वार्थों के लिए राजनीतिकरण करना इस तरह के आंदोलन के महत्व को कमतर करना है। दरअसल मुद्दा आर्थिक तंगी का रहा है, जिसे ईरान पर पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए कठोर प्रतिबंधों ने और बढ़ा दिया है। इसके चलते रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए कीमतों में अत्यधिक वृद्धि, साथ ही स्थानीय मुद्रा रियाल का तेजी से अवमूल्यन, विरोध के बड़े कारण बन गए हैं।
ईरान के व्यापारियों और आम लोगों ने पहले देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन शुरू किया। इसके बाद यह तेहरान सहित अन्य शहरों में फैल गया। अमेरिका द्वारा प्रदर्शनकारियों को स्पष्ट समर्थन, ईरानी शासन के लिए उसकी धमकियां और इस्राएल द्वारा की गई गतिविधियां की ईरान में सत्ता को कमजोर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। ईरान के निर्वासित प्रिंस रजा पहलवी के लिए ईरान में बहुत बड़ा समर्थन नहीं है, लेकिन ईरानी प्रवासी समुदाय में उनका काफी समर्थन है। अमेरिका द्वारा उसे बढ़ावा दिया जा रहा है। इसने ईरान में हो रहे आंदोलन में भड़काऊ भूमिका निभाई है। सत्ता के अंदर बदलाव ला पाना उतना आसान नहीं होगा जब तक कि ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स सत्ता की उस दृष्टि से मदद नहीं करेंगे।
भारत की चिंता और संतुलन की राह
भारत के बगल में सुन्नी बहुल पाकिस्तान और अफगानिस्तान है, और सऊदी अरब तो बैठा ही है। भारत के लिये ईरान में अस्थिरता झटका साबित होगा। यूक्रेन युद्ध के बाद डगमगायी व्यवस्था में ईरान के तेल ने भारत का बहुत साथ दिया है। चाबहार बंदरगाह परियोजना, जो अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच प्रदान करती है, भारत की पाकिस्तान-बाइपास रणनीति का हिस्सा है, उस पर संकट आ सकता है। यदि अयातुल्ला खामेनेई ईरान छोड़कर भागते हैं तो क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ सकती है। इससे नागरिक युद्ध की स्थिति बन सकती है, कट्टरपंथी मुस्लिम समूह और मजबूत हो सकते हैं, इससे भारत की सुरक्षा प्रभावित होगी। पाकिस्तान-समर्थित आतंकवाद पहले से ही चुनौती है। ईरान की अस्थिरता से शिया-सुन्नी संघर्ष फैल सकता है, जो कश्मीर और अन्य क्षेत्रों में प्रतिध्वनित होगा। ऊर्जा सुरक्षा पर असर पड़ेगा, क्योंकि भारत का 60 प्रतिशत तेल आयात पश्चिम एशिया से आता है। कीमतें बढ़ेंगी, मुद्रास्फीति बढ़ेगी। लगभग 80-90 लाख भारतीय प्रवासी, जो खाड़ी क्षेत्र में है, वह खतरे में पड़ेंगे। चीन का प्रभाव बढ़ सकता है, जो भारत की समुद्री रणनीति को कमजोर करेगा।
अमेरिका इस उथल-पुथल को लोकतंत्र और मानवाधिकार की भाषा में देखता है। अमेरिकी बयान अक्सर नैतिक दिखते हैं लेकिन उनके पीछे रणनीतिक हित भी छिपे होते हैं। रूस की नजर इस पूरे घटनाक्रम पर अलग है। रूस इसे सत्ता परिवर्तन की उस श्रृंखला का हिस्सा मानता है जिसे वह ‘पश्चिमी रंग क्रांति’ कहता है। उसके लिए ईरान का अस्थिर होना केवल मध्य पूर्व की समस्या नहीं बल्कि एक मिसाल है जो कल कहीं और दोहराई जा सकती है। इसलिए रूस स्थिरता और संप्रभुता की बात करता है। वह ईरानी शासन से पूरी तरह सहमत न होते हुए भी उसके पतन का विरोध करता है। चीन का रुख सबसे शांत लेकिन व्यावहारिक है। वह न तो खुलकर विरोध का समर्थन करता है और न ही दमन का बचाव। चीन के लिए ईरान ऊर्जा और व्यापार का साझेदार है। उसकी प्राथमिकता यह है कि हालात नियंत्रण से बाहर न जाएं और बाहरी हस्तक्षेप से बचा जाए। चीन मानता है कि बदलाव अगर होना है तो अंदर से होना चाहिए।
भारत के लिए यह स्थिति सबसे संवेदनशील है। ईरान भारत का पुराना सभ्यतागत साझेदार है और क्षेत्रीय संपर्क का अहम जरिया भी। भारत न तो अमेरिकी शैली की तीखी बयानबाजी अपना सकता है और न रूसी या चीनी मॉडल की नकल कर सकता है। भारत को एक संतुलित दृष्टि रखनी होगी जिसमें ईरानी जनता की पीड़ा के प्रति सहानुभूति हो, लेकिन किसी भी प्रकार के जबरन हस्तक्षेप से दूरी भी बनी रहे।
ईरान में जो हो रहा है दुनिया इसे अपने-अपने चश्मे से देखेगी, लेकिन भारत के लिए जरूरी है कि वह इसे धैर्य, समझ और राजनयिक परिपक्वता के साथ देखे, क्योंकि अस्थिर ईरान केवल ईरान की समस्या नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र की चुनौती बन सकता है। फारस की वह सुबह अब शाम की छाया में है, लेकिन इतिहास हमें सिखाता है कि साम्राज्य गिरते-उठते हैं। अमेरिका का यह प्रयास सफल होगा, या ईरान की जड़ें और मजबूत हो जाएंगी? यह सवाल हमें बांधे रखेगा।

















