हरिद्वार। शताब्दी समारोह 2026 केवल किसी संस्था के सौ वर्ष पूर्ण होने का उत्सव नहीं है। यह उस युग-चेतना का सार्वजनिक उद्घोष है, जो बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में जन्मी, इक्कीसवीं शताब्दी में परिपक्व हुई और अब आने वाली पीढ़ियों के लिए उत्तरदायित्व के रूप में हस्तांतरित की जा रही है। अखिल विश्व गायत्री परिवार का यह शताब्दी पर्व स्मरण का नहीं, बल्कि युग-दायित्व के हस्तांतरण का महापर्व है। इसी शताब्दी चेतना की धुरी पर वृक्षगंगा अभियान खड़ा है कि और उसी का स्थायी, दृश्य तथा लोकजीवन से गहराई से जुड़ा विस्तार है वंदनीया माताजी स्मृति उपवन। ये दोनों मिलकर शताब्दी समारोह को केवल वैचारिक नहीं, बल्कि धरती पर मूर्त, मापनीय और स्थायी बनाते हैं।
हिमालय – जहाँ से युग-चेतना ने स्वर पाया
गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की 1937 की प्रथम हिमालय यात्रा को यदि शताब्दी समारोह 2026 की बीज-तिथि कहा जाए, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। हिमालय की निस्तब्धता में उन्होंने केवल आत्म-साधना नहीं की, बल्कि प्रकृति की उस मौन पीड़ा को सुना, जिसे आधुनिक विकास ने अनसुना कर दिया था। बाद की यात्राएँ 1959, 1971 और 1984 इस अनुभूति को और सघन करती चली गईं।हिमनदों का पीछे हटना, वनों का कटाव, नदियों का सिकुड़ना और मानव की बढ़ती असंवेदनशीलता कि ये सब भविष्य की चेतावनी थीं। गुरुदेव ने बहुत पहले देख लिया था कि यदि मानव की साधना प्रकृति की रक्षा से नहीं जुड़ी, तो संस्कृति स्वयं संकट में पड़ जाएगी। यहीं से वृक्ष केवल हरियाली का माध्यम नहीं रहे कि वे युग-रक्षा के प्रतीक बने और यहीं से पर्यावरण संरक्षण युगधर्म के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
शांतिकुंज – जहाँ साधना ने संरचना पाई
हिमालय में जन्मा यह संकल्प शांतिकुंज में आकार लेता है। यहाँ वृक्षारोपण भावनात्मक आवेग नहीं, बल्कि व्यवस्थित, वैज्ञानिक और दीर्घकालिक प्रक्रिया बनता है। शांतिकुंज में मनोरम उपवन, हिमालय के दुर्लभ जड़ी बूटियों का संरक्षण, पुनर्जीवन एवं पुनर्स्थापन, वृक्ष, साधना के साथी बने, सेवा के उपकरण बने और संस्कृति के वाहक बने। ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान ने यह सिद्ध किया कि यज्ञ, औषधीय वृक्ष, मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। आयुर्वेद, योग, वनौषधि और मानव चेतना पर आधारित शोध यह प्रमाणित करते हैं कि प्रकृति संरक्षण कोई भावनात्मक आग्रह नहीं, बल्कि वैज्ञानिक अनिवार्यता है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय ने इस चेतना को अकादमिक अनुशासन प्रदान किया। यहाँ पर्यावरण अध्ययन केवल सह-पाठ्य गतिविधि नहीं, बल्कि शताब्दी दृष्टि का शैक्षणिक स्वरूप बना। डिप्लोमा, स्नातक, स्नातकोत्तर और शोध स्तर तक पर्यावरण, जैव-विविधता, सतत विकास और भारतीय दृष्टि पर आधारित अध्ययन ने हरित नेतृत्व की नई पीढ़ी तैयार की।
वृक्षगंगा अभियान- शताब्दी का जन-आंदोलन
वर्ष 2010 की प्रारंभिक गतिविधियों से लेकर आज तक, वृक्षगंगा अभियान निरंतर विकसित होता रहा है। यह अभियान शताब्दी समारोह 2026 का सबसे व्यापक जन-संलग्न उपक्रम बन चुका है। 2025 का एक करोड़ पौधारोपण संकल्प गुरुपूर्णिमा से श्रावण पूर्णिमा (21 जुलाई से 19 अगस्त 2025) इस यात्रा का ऐतिहासिक पड़ाव है। यह संकल्प केवल संख्या नहीं, बल्कि एक सुविचारित रोडमैप है, जिसमें रोपण के साथ संरक्षण, संरक्षण के साथ संवर्धन और संवर्धन के साथ संस्कार को समान रूप से महत्व दिया गया है। विद्यालय, ग्राम, नगर, राजमार्ग, नदी-तट हर क्षेत्र में वृक्षगंगा का प्रवाह शताब्दी समारोह को हरित विरासत सौंपने की तैयारी है।
युवा चेतना- शताब्दी का उत्तराधिकारी वर्ग
कोई भी शताब्दी तभी सार्थक होती है जब उसका दायित्व और उत्तरदायित्व युवाओं के सक्षम हाथों में सौंपा जाए। अखिल विश्व गायत्री परिवार के युवा प्रतिनिधि डॉ. चिन्मय पंड्या के मार्गदर्शन में डिवाइन इंडिया यूथ एसोसिएशन (दीया), गायत्री परिवार युवा प्रकोष्ठ तथा विभिन्न प्रांतीय युवा प्रकोष्ठों ने वृक्षगंगा अभियान को ऊर्जा, अनुशासन और निरंतरता प्रदान की। दीया दिल्ली द्वारा यमुना तटों के दीर्घकालिक हरितीकरण का कार्य किया गया, दीया इंदौर ने एक हजार सप्ताह तक सतत वृक्षारोपण कर अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है, जबकि दीया राजस्थान, गुरुग्राम, कोटा और जबलपुर की इकाइयों ने सक्रिय सहभागिता निभाई। गायत्री परिवार युवा प्रकोष्ठ कोलकाता द्वारा एक मिलियन से अधिक पौधों का रोपण किया गया।
इसके साथ ही गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक सहित अनेक महानगरों में युवाओं की व्यापक सहभागिता देखने को मिली, वहीं बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में प्रांतीय युवा प्रकोष्ठों द्वारा नदी तटों, ग्रामों और नगरों के स्तर पर व्यापक अभियान संचालित कर इसे एक सशक्त जनआंदोलन का स्वरूप प्रदान किया गया। ये सभी उदाहरण बताते हैं कि वृक्षगंगा अब आयोजन नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति बन चुकी है।
वंदनीया माताजी स्मृति उपवन-शताब्दी का स्थायी प्रतिरूप
यदि वृक्षगंगा अभियान शताब्दी समारोह का प्रवाह है, तो वंदनीया माताजी स्मृति उपवन उसका स्थायी तट है। परम वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा जी के जीवन-मूल्यों सेवा, सादगी, स्वास्थ्य और संस्कार का यह जीवंत स्मारक है। यह उपवन अनुपयोगी भूमि को जीवन देता है, स्मृति को वृक्ष में रूपांतरित करता है, नगरों में शुद्ध वायु, मानसिक शांति और सामाजिक सहभागिता का केंद्र बनता है।
एक्यूप्रेशर पथ, औषधीय वृक्ष, नक्षत्र-राशि-नवग्रह वाटिकाएँ, वास्तु मण्डल, पंचवटी, त्रिवेणी, यज्ञशाला और प्राकृतिक आहार केंद्र इसे भविष्य का समग्र पर्यावरण मॉडल बनाते हैं। स्वास्थ्य, स्वावलंबन और संस्कारकृतीनों यहाँ एक साथ फलित होते हैं। जहाँ भूमि उपलब्ध नहीं, वहाँ गमलों में औषधीय पौधों का संकल्प यह विचार हर घर को शताब्दी चेतना से जोड़ देता है।
युग-हस्तांतरण
शताब्दी समारोह के दलनायक डॉ चिन्मय पंड्या ने बताया कि शताब्दी समारोह 2026 हमें यह स्मरण कराता है कि सौ वर्ष पूरे होना उपलब्धि है, लेकिन अगले सौ वर्षों की धरती कैसी होगी कि यह उत्तरदायित्व है। वृक्षगंगा अभियान और वंदनीया माताजी स्मृति उपवन मिलकर इस उत्तरदायित्व को मूर्त रूप देते हैं। जब हिमालय में जन्मा विचार, शांतिकुंज में साधना बना, ब्रह्मवर्चस में विज्ञान हुआ, देव संस्कृति विश्वविद्यालय में शिक्षा बना, युवाओं के हाथों कर्म हुआ और शताब्दी समारोह में वृक्ष बनकर खड़ा हुआ। तब यह स्पष्ट हो गया कि यह आयोजन स्मरण का नहीं, युग-हस्तांतरण का महापर्व है। शताब्दी समारोह 2026 उसी युग-हस्तांतरण की हरित घोषणा है जहाँ स्मृति संस्कार बनती है, संस्कार सृष्टि रचते हैं और भविष्य सुरक्षित होता है।















