दयानिधि मारन का बयान करोड़ों महिलाओं के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने वाला, भारत की एकता पर प्रहार
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दयानिधि मारन का बयान करोड़ों महिलाओं के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने वाला, भारत की एकता पर प्रहार

डीएमके सांसद दयानिधि मारन द्वारा उत्तर भारतीय महिलाओं के संबंध में की गई आपत्तिजनक टिप्पणी ने पूरे देश में तीव्र राजनीतिक और सामाजिक आक्रोश उत्पन्न कर दिया है।

Written byडॉ. मयंक चतुर्वेदीडॉ. मयंक चतुर्वेदी — edited by Mahak Singh
Jan 16, 2026, 11:28 am IST
in भारत
डीएमके सांसद दयानिधि मारन

डीएमके सांसद दयानिधि मारन

डीएमके सांसद दयानिधि मारन द्वारा उत्तर भारतीय महिलाओं पर की गई अभद्र टिप्पणी ने पूरे देश में राजनीतिक और सामाजिक आक्रोश की लहर पैदा की है। उन्होंने उत्तर भारत की महिलाओं को मात्र “घर पर रहने, रसोई का काम करने और बच्चे पैदा करने” वाली संकुचित भूमिका तक सीमित बताकर आज करोड़ों महिलाओं का अपमान भर नहीं किया है। उत्तर भारत की महिलाओं को लेकर इस प्रकार का संबोधन ऐतिहासिक, सामाजिक और समकालीन तथ्यों की घोर उपेक्षा है। यह टिप्पणी उस मानसिकता को उजागर करती है, जिसमें पूरे एक भूभाग और वहाँ की करोड़ों महिलाओं को एक रूढ़ छवि में बाँधकर देखा जाता है।

भारत की विविध सांस्कृतिक एकता पर प्रहार

वस्‍तुत: उन्‍होंने तो भारत की विविध सांस्कृतिक एकता पर प्रहार किया है। क्‍योंकि उत्तर भारत की स्त्री भी देश के अन्‍य भाग की तरह ही विद्या (ज्ञान की देवी), लक्ष्मी (समृद्धि की प्रतीक) और शक्ति (सामर्थ्य की मूर्ति) का जीवंत स्वरूप है। दयानिधि मारन के अनुसार, “हमारे राज्य की लड़कियां आत्मविश्वास के साथ हाथ में लैपटॉप लेकर चलती हैं। वो पोस्ट ग्रेजुएशन से लेकर इंटरव्यू तक देती नजर आती हैं। तमिलनाडु की लड़कियों में ये आत्मविश्वास आता है, क्योंकि हम उन्हें पढ़ाते हैं। मगर, उत्तर भारत में क्या हाल है? वहां महिलाएं बाहर काम करने नहीं जाती हैं। वो घर, रसोई और बच्चों को संभालती हैं। यही उनका काम होता है।” मारन का यह बयान शक्ति स्वरूपा नारियों के बीच विभेद पैदा करने वाला है। उस भारतीय ज्ञान परंपरा और आदर्श पर प्रहार है, जहां जननी को स्वर्ग से भी बड़ा बताया गया है।

मारन का बयान वशिष्ठ ऋषि की पत्नी तपस्विनी अरुंधति, गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा, अपाला और घोषा जैसी ऋषिकाओं ने जिनमें से कुछ से ऋग्वेद में सूक्त लिखे, तो कुछ ज्ञान के अन्‍य क्षेत्रों में अग्रगण्‍य रहीं, का अपमान भी है। क्या दयानिधि मारन को यह नहीं मालूम होगा कि गोंडवाना रानी दुर्गावती, 1857 की बलिदानी शिवदेवी तोमर, रानी लक्ष्‍मी बाई, झलकारी बाई , ऊदा देवी, अजीजन बाई, रानी ईश्वर कुमार, समाज सुधारक पंडिता रामाबाई, चंद्रशेखर आजाद की सहयोगी दुर्गावती देवी, अहिल्याबाई होलकर ये सभी और इन जैसी अनेकों महान वीरांगनाएं इसी उत्‍तर क्षेत्र से ही हैं। तब से अब आधुनिक समय तक यदि उत्‍तर भारत की प्रगतिशील, विकास को अपने पुरुषार्थ से व्‍याप्‍त कर देनेवाली स्‍त्र‍ियों की यदि आज सूची भी बनाई जाएगी तो वह भी बहुत विशद होगी। तमिलनाडु में इस वर्ष चुनाव हैं और दयानिधि मारन का बयान वोट बैंक के लिए किसी भी हद तक जाने वाला प्रतीत होता है।

मारन का दावा कि उत्तर भारत की महिलाएं अशिक्षित हैं, इस बात को भारत का राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण का पांचवां दौर (एनएफएचएस-5) पूरी तरह से आंकड़ों से खंडित कर देता है। उत्तर प्रदेश में महिला साक्षरता दर 2011 के 57.18% से बढ़कर 2021 तक 72.4% हो गई, जबकि बिहार में 53.33% से 64.5% को पार कर चुका है। हिमाचल प्रदेश (86.6%) और उत्तराखंड (78.8%) जैसे राज्य केरल (96%) के करीब पहुंच चुके हैं। इसके अतिरिक्‍त यदि समसामयिक उदाहरण लें तो प्रधानमंत्री मोदी की “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” योजना ने हरियाणा का लिंगानुपात 2014 के 834 से सुधारकर 2021 में 927 कर दिया। जिसमें कि ये आंकड़े वर्ष 2021 तक के हैं, इसके अभी नए आंकड़ें आना शेष हैं।

निवेश, विकास और महिलाओं की भूमिका

यह कहना कि केवल तमिलनाडु ही निवेश और विकास का केंद्र है, आज के भारत की आर्थिक वास्तविकताओं से आँख चुराने जैसा है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और तेलंगाना आज निवेश के प्रमुख केंद्र हैं। नोएडा, गुरुग्राम, लखनऊ और कानपुर जैसे शहरों में आईटी, स्टार्टअप और औद्योगिक क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। यह विकास इस बात का प्रमाण है कि भारतीय स्त्री चाहे वह उत्तर की हो या दक्षिण की, देश की आर्थिक प्रगति की सहभागी है।

महिला श्रम बल भागीदारी

महिला श्रम बल भागीदारी के संदर्भ में भी उत्तर भारत की महिलाएँ स्वयं सहायता समूहों, कृषि आधारित उद्यमों और सूक्ष्म उद्योगों के माध्यम से आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। ग्रामीण उत्तर भारत में लाखों महिलाएँ आज केवल गृहिणी नहीं, वे आय सृजन करने वाली इकाइयाँ बन चुकी पीएलएफएस (2023-24) रिपोर्ट के अनुसार, यूपी में 1.5 करोड़ महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से जुड़ीं, जोकि 50,000 करोड़ रुपये का कारोबार कर रही हैं।

मध्य प्रदेश में स्व-सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं की संख्या लगभग 62 लाख ग्रामीण महिलाएं हैं। कुल 5 लाख स्व-सहायता समूह सक्रिय हैं। राज्य की कुल जनसंख्या (लगभग 8.6 करोड़, 2025 अनुमान) में महिलाओं का हिस्सा करीब 48-49% (लगभग 4.2 करोड़) है, जिसमें ग्रामीण महिलाएं बहुमत में हैं। बिहार की जीविका योजना ने 1.2 करोड़ महिलाओं को सूक्ष्म उद्यमों से जोड़ा। नोएडा-ग्रेटर नोएडा में 40% आईटी कर्मचारी महिलाएं हैं, जबकि गुरुग्राम के स्टार्टअप्स में फ्लिपकार्ट की सह-संस्थापिका बिन्नी बंसल (पंजाब) जैसी उद्यमि‍यों की हजारों में संख्‍या है।

तमिलनाडु की महिला साक्षरता (73.44%) सराहनीय है, किंतु यूपी का जीएसडीपी 2024 में 22 लाख करोड़ पार कर गया, जिसमें महिलाओं की कृषि (60% कार्यबल) और उद्योग भागीदारी प्रमुख है। उत्तर प्रदेश का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) वित्त वर्ष 2025-26 के लिए लगभग 30.77 लाख करोड़ रुपये का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। वर्तमान वित्त वर्ष 2024-25 में यह 27.51 लाख करोड़ रुपये के आसपास अनुमानित है। अत: कहना होगा कि मारन का “निवेश केवल तमिलनाडु में” दावा झूठा है। उत्‍तर प्रदेश, राजस्‍थान, हरियाणा, समेत हिन्‍दी भाषी राज्‍यों में आज कई हजार लाख करोड़ का निवेश आकर्षित हुआ है और लगातार हो रहा है। जो यह दर्शाता है कि भारत के उत्‍तरी क्षेत्र के राज्‍य एवं सभी हिन्‍दी भाषी राज्‍य आर्थ‍िक मोर्चे पर भी आज अच्‍छा प्रदर्शन कर रहे हैं। लोकसभा में उत्तर भारत से 20% महिला सांसद हैं। वस्‍तुत: कानूनी स्‍तर पर देखें तो डीएमके सांसद दयानिधि मारन की उक्‍त टिप्पणी संविधान के अनुच्छेद 14-16 (समानता) का उल्लंघन है। ये राजनीतिक बयानबाजी “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” के भाव को कमजोर करता है।

उत्तर बनाम दक्षिण है एक कृत्रिम विमर्श

यह सत्‍य है कि तमिलनाडु की शैक्षिक और स्वास्थ्य संबंधी उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता। किंतु किसी एक राज्य की सफलता को पूरे देश के लिए मापदंड बनाकर बाकी क्षेत्रों को हीन बताना लोकतांत्रिक विवेक के विपरीत है। स्वयं दक्षिण भारत के भीतर भी विकास के स्तर में असमानता है, जहाँ केरल और तमिलनाडु आगे हैं, वहीं कुछ अन्य राज्य पीछे हैं। इसी प्रकार उत्तर भारत भी एकसमान नहीं है। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्य महिला शिक्षा और सामाजिक संकेतकों में कई दक्षिणी राज्यों से बेहतर स्थिति में हैं। इसलिए “उत्तर बनाम दक्षिण” की बहस वास्तविकता को सरलीकृत कर विभाजन को बढ़ावा देती है और इसी विभाजन को आज दयानिधि मारन बड़ा करते हुए दिखते हैं!

राजनीतिक बयान और जिम्मेदारी

एक जनप्रतिनिधि के रूप में आज दयानिधि मारन की टिप्पणी इसलिए अधिक आपत्तिजनक है क्योंकि वह करोड़ों महिलाओं को एक ही खांचे में डालकर उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाती है। ऐसे में अच्‍छा यही होगा कि मारन ये ठीक से समझ लें कि भारत की स्त्री न अतीत में कमजोर थी, न वर्तमान में है और न भविष्य में होगी। वह शिक्षिका भी है, अधिकारी भी, खिलाड़ी भी और उद्यमी भी है, आज की स्‍त्री हर क्षेत्र में बढ़-चढ़कर भाग ले रही है।ये भारत की सामूहिक शक्‍ति, विशेषकर स्‍त्री शक्‍ति‍ का ही परिणाम है कि आज हम दुनिया की तीसरी आर्थि‍क शक्‍ति बन चुके हैं। इसलिए वर्तमान आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय स्त्रियों को क्षेत्रीय तुलना की राजनीति से ऊपर उठकर एक साझा राष्ट्रीय शक्ति के रूप में सभी देखें। दयानिधि मारन को ये समझना ही चाहिए कि उत्तर भारत की स्त्री भी उतनी ही सशक्त, सक्षम और सम्मान की अधिकारी है, जितनी भारत के किसी भी अन्य हिस्से की स्त्री।

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