सेना इन्फैंट्री में महिलाओं को शामिल करने के लिए तैयार है, लेकिन इसके लिए समाज की स्वीकृति ज़रूरी है। ये बात भारतीय सेना के प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कही है। उन्होंने कहा कि अगर अगर स्टैंडर्ड एक जैसे हों, क्षमताएं बराबर हों और देश की समाज इस बात को स्वीकार कर ले, तो कल ही महिलाओं को कॉम्बैट रोल्स, यानी इन्फैंट्री जैसी फ्रंटलाइन ड्यूटी में शामिल किया जा सकता है।
मुख्य बात क्या है
जनरल द्विवेदी ने मंगलवार को एक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान कहा कि अगर स्टैंडर्ड एक जैसे हों, क्षमताएं बराबर हों और देश की समाज इस बात को स्वीकार कर ले, तो कल ही महिलाओं को कॉम्बैट रोल्स, यानी इन्फैंट्री जैसी फ्रंटलाइन ड्यूटी में शामिल किया जा सकता है। उन्होंने जोर दिया कि महिलाओं को कभी भी “कमजोर या वल्नरेबल कमोडिटी” की तरह नहीं देखना चाहिए। सेना का फोकस पूरी तरह “जेंडर न्यूट्रैलिटी” पर है – यानी लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं, बस काम के हिसाब से योग्यता।
महिलाओं को अभी तक क्या भूमिकाएं मिली हैं
फिलहाल भारतीय सेना में महिलाओं की मौजूदगी बढ़ रही है, लेकिन इन्फैंट्री, आर्मर्ड या मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री जैसी कोर कॉम्बैट यूनिट्स में अभी वे नहीं हैं। महिलाएं ऑफिसर्स के तौर पर कई ब्रांच में काम कर रही हैं। अभी कुल करीब 8,000 महिला अधिकारी हैं। नेशनल डिफेंस अकादमी (एनडीए) में 60 महिला कैडेट्स हैं और हर साल 20 को शामिल करने की योजना है। चेन्नई और गया के ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी में हर साल 120 महिलाओं को भर्ती करने का टारगेट है। टेरिटोरियल आर्मी में भी महिलाओं के लिए दरवाजे खुले हैं, जहां 110 वैकेंसी आने वाली हैं। अन्य रैंक्स (जवान स्तर) में महिलाओं को शामिल करने के लिए आर्मी एक्ट की धारा 12 में बदलाव की जरूरत है। सेना का योजना है कि 2032 तक जवान स्तर पर महिलाओं की भर्ती में 12 गुना बढ़ोतरी हो।
कैसे आगे बढ़ेगी ये प्रक्रिया
आर्मी चीफ ने बताया कि ये बदलाव एकदम से नहीं होगा, बल्कि क्रमिक तरीके से आएगा – पहले सपोर्टिंग आर्म्स में, फिर कॉम्बैट आर्म्स में और आखिर में स्पेशल फोर्सेस तक। महिला अधिकारियों के परफॉर्मेंस डेटा को देखकर ही आगे के रोल्स खोले जाएंगे। ये एक “क्रमिक और स्वागतयोग्य सामाजिक बदलाव” होगा।
उन्होंने ये भी कहा कि यूनिफॉर्म स्टैंडर्ड रखना बहुत जरूरी है, लेकिन मेडिकल और ऑपरेशनल वजहों से अभी ये चुनौतीपूर्ण है। कई बार मेडिकल अथॉरिटी महिलाओं को कुछ टास्क के लिए फिट नहीं मानतीं, और कभी-कभी महिलाएं खुद कहती हैं कि ये उनके लिए मुमकिन नहीं।
जेंडर न्यूट्रैलिटी पर जोर
जनरल द्विवेदी ने कहा कि सेना जेंडर इक्वालिटी से ज्यादा जेंडर न्यूट्रैलिटी की तरफ बढ़ रही है। समाज में अभी भी जेंडर लाइन्स हैं, लेकिन सेना में इसे धीरे-धीरे बदलना होगा। महिलाओं को मजबूत बनाना है – उन्होंने कहा कि हम मजबूत महिला अधिकारी चाहते हैं, शायद “काली माता का रूप”। ये सब बदलाव समाज की तैयारी और स्वीकृति पर टिका है। अगर समाज तैयार हो गया, तो सेना पीछे नहीं रहेगी।
















