कम्युनिस्ट China और कट्टरपंथी Jamat-e-Islami में नजदीकी के पीछे एजेंडा क्या! क्या भारत विरोधी जमात को उकसा रहा ड्रैगन!
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कम्युनिस्ट China और कट्टरपंथी Jamat-e-Islami में नजदीकी के पीछे एजेंडा क्या! क्या भारत विरोधी जमात को उकसा रहा ड्रैगन!

जमात के पारंपरिक रूप से भारत के प्रति संदेह वाले रुख के बारे में भी चीन जानता है। इससे सवाल उठता है कि क्या बीजिंग ढाका में नई दिल्ली के प्रभाव के मुकाबले एक संतुलन तलाश रहा है

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Jan 13, 2026, 12:17 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
चीनी राजदूत याओ वेन ने बांग्लादेश की मट्टर मजहबी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख डॉ. शफीकुर रहमान से मुलाकात की

चीनी राजदूत याओ वेन ने बांग्लादेश की मट्टर मजहबी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख डॉ. शफीकुर रहमान से मुलाकात की

बांग्लादेश से आई ताजा खबर चौंकाने वाली है। खबर यह है कि ढाका स्थित चीनी राजदूत याओ वेन ने बांग्लादेश की मट्टर मजहबी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख डॉ. शफीकुर रहमान से मुलाकात की है। आधिकारिक तौर पर इसे चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और जमात पार्टी के बीच सौहार्द और आदान-प्रदान को मजबूत करने का कदम बताया जा रहा है। लेकिन बात सिर्फ इतनी होती तो राजनीतिक विशेषज्ञों के कान नहीं खड़े होते। असल में आगामी 12 फरवरी को होने तय हैं। चुनाव से ठीक पहले चीनी राजदूत का वहां की उस प्रमुख मजहबी पार्टी से नजदीकी बढ़ाना आसानी से हजम होने वाली बात नहीं है जिसने पिछले चुनावों का बहिष्कार किया था। उन चुनावों में शेख हसीना की अवामी लीग पार्टी जीती थी। यहां यह भी ध्यान रहे कि कम्युनिस्ट चीन की विचारधारा मत—पंथ विरोधी है और बांग्लादेश के जमातियों को कट्टर मजहबी माना जाता है।

इस भेंट के बारे में विज्ञप्ति जारी करके ढाका में चीनी दूतावास ने कहा है कि ‘दोनों पक्षों ने सौहार्दपूर्ण और रचनात्मक माहौल में चीन-बांग्लादेश संबंधों, पार्टी-टू-पार्टी बातचीत और आपसी हित के अन्य मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की।’ सवाल है कि आखिर चीन को जमात के साथ द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा की जरूरत क्यों महसूस हुई जबकि वहां एक अंतरिम सरकार का प्रमुख कुर्सी पर बैठा है। इस भेंट का अर्थ स्पष्ट है कि चीन खुलकर जताना चाहता है कि वह उस जमाते इस्लामी के पाले में है जो हिन्दू बहुत भारत से नफरत करती है और इन दिनों वहां चल रहे हिन्दू दमन में जमातियों की भी कथित रूप से एक बड़ी भूमिका है।

चीन जमात-ए-इस्लामी को सड़क पर भीड़ जुटाने वाली सबसे प्रभावी ताकतों में से एक मान रहा है

चीनी दूतावास का बयान आगे बताता है कि ‘दोनों पक्ष आपसी आदान-प्रदान को और मजबूत करने, विभिन्न क्षेत्रों में मैत्रीपूर्ण सहयोग को गहरा करने, बांग्लादेश-चीन व्यापक रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने पर सहमत हुए, ताकि दोनों देशों के लोगों को अधिक लाभ मिल सके।’

बांग्लादेश में देखने में आए इस नए घटनाक्रम के दक्षिण एशियाई रणनीतिक गलियारों में तरंगें पैदा करना स्वाभाविक ही है। सूत्रों का कहना है कि बीजिंग का यह कदम बांग्लादेश के आम चुनावों से ठीक पहले एक सोची-समझी कूटनीतिक चाल है, जिसका मकसद इस्लामी पार्टी को समर्थन देने का संकेत देने से ज्यादा अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों की रक्षा करना है।

जानकारों का कहना है कि यह बातचीत एक संकेत भी हो सकती है कि बांग्लादेश में मजहबी उन्माद के वर्तमान माहौल को देखते हुए चीन को लगता है कि जमाते इस्लामी जैसी कट्टर मजहबी पार्टी माहौल को भुना सकती है और बाकी दलों से अधिक सीटें जीत सकती है।

ढाका के अखबारों, जैसे ढाका ट्रिब्यून आदि में इस मुलाकत को लेकर अनेक तरह के कयास जताए जा रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन जमात-ए-इस्लामी को देश में सड़क पर भीड़ जुटाने वाली सबसे प्रभावी ताकतों में से एक मान रहा है। इस जमात का व्यापक संगठनात्मक नेटवर्क, हिन्दुओं से नफरत की घुट्टी पिए इसके कैडर और डरा—धमकाकर भीड़ इकट्ठी करने की इसकी क्षमता इसे राजनीतिक कोहरे के इस माहौल में काफी प्रभावी दिखाती है। शायद बीजिंग जमात की इस क्षमता को एक उन्मादी भीड़ जुटाने वाली ताकत के रूप में देखता है, जो शायद चुनाव के बाद स्थिरता पर असर डाल सकती है।

कुछ जानकार मानते हैं कि चीन की यह पहल काफी हद तक बांग्लादेश के चुनाव के बाद के राजनीतिक परिदृश्य को लेकर अनिश्चितता की आशंका की वजह से उपजी है। चुनावी परिणाम अगर स्थायित्व देने वाले न रहे तो उस स्थिति में बीजिंग चाहता है कि ऐसे लोगों से एक संबंध बनाया जाए जो उसके रणनीतिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए काम कर सके। सूत्रों का कहना है कि जमात के साथ बातचीत चीन को एक बैकअप चैनल की सुविधा देती है।

चीनी निवेश की सुरक्षा
दरअसल, बीजिंग की मुख्य चिंता चुनाव के दौरान और बाद में स्थिरता को लेकर है। साथ ही वह नहीं चाहता कि वहां भारत अपना कोई प्रभाव जमा पाए। बेल्ट एंड रोड परियोजना के तहत बांग्लादेश में चीन का बड़ा निवेश है, जिसमें बंदरगाह, बिजली परियोजनाएं और कनेक्टिविटी इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल हैं। ये परियोजना लंबे समय तक अशांति या राजनीतिक हिंसा रहने से कमजोर पड़ सकती हैं। अपने राजदूत के माध्यम से जमात के नेतृत्व से जुड़कर, माना जाता है कि चीन यह आश्वासन चाहता है कि चुनाव के दौरान उसकी परियोजनाओं और कर्मियों पर कोई जोखिम न आए।

जैसा पहले बताया, जमात के पारंपरिक रूप से भारत के प्रति संदेह वाले रुख के बारे में भी चीन जानता है। बीजिंग ढाका में नई दिल्ली के प्रभाव के मुकाबले एक संतुलन भी तलाश रहा है। जमाते इस्लामी के प्रमुख जैसे लोगों के साथ बातचीत का रास्ता बनाए रखने से चीन को रणनीतिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

जमात प्रमुख के साथ चीनी राजदूत की बैठक को बांग्लादेश के राजनीतिक नेतृत्व को एक बारीक संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है। सूत्र भले इस बात पर जोर दे रहे हैं कि इस भेंट को राजनीतिक समर्थन के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, लेकिन तस्वीरें छपने के बाद इसके अलावा और संकेत भी क्या जा सकता है, क्या चीनी राजदूत यह जानते—बूझते नहीं मिले होंगे!

Topics: foreign affairsBangladesh Electionsचीनबांग्लादेशdiplomacydhakaढाकाजमाते इस्लामीChinajamat-e-islami
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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