जोहरान ममदानी पिछले दिनों में न्यूयॉर्क के मेयर चुने गए। अमेरिका के बड़े एवं व्यस्ततम शहर के मेयर की प्राथमिकताओं में ढेरों काम होंगे, लेकिन ममदानी ने दिल्ली दंगों के मास्टरमाइंड उमर खालिद को चिट्ठी लिखने को प्राथमिकता दी। दोनों के बीच मुसलमान होने के अलावा कोई सीधा रिश्ता नहीं है। ऐसे समय में जबकि भारत के बगल में बांग्लादेश में हिंदुओं की बर्बर हत्याएं हो रही हैं, ममदानी को जेल में बंद उमर की चिंता सताई। वास्ता मानवाधिकार का ही है, लेकिन ममदानी का पत्र दंगों को ‘राजनीतिक असहमति’ का जामा पहनाने जैसा लगता है। यह खतरनाक है।
उमर खालिद की पार्टनर ज्योत्सना लाहिड़ी ने 1 जनवरी, 2026 को एक्स पर ममदानी का हस्तलिखित पत्र साझा किया। पत्र ‘प्रिय उमर’ से शुरू होता है। ममदानी लिखते हैं, ‘‘तुम्हारी कैद एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि एक विचार को दबाने की कोशिश है। (हालांकि पत्र स्पष्ट नहीं करता कि कौन-सा विचार, क्योंकि खालिद का विचार तो दंगा भड़काना है।) देश जब नागरिकों से डरने लगता है, तो कानून सुरक्षा देने के बजाय नागरिकों के विरुद्ध हथियार बन जाता है।’’
ममदानी को लगता है कि जिस तरह पूरे मुकदमे में खालिद को आरोपी बनाया गया है, वह एक आरोपी से अधिक एक प्रतीक के रूप में चेहरा गढ़ने की कोशिश है। वामपंथ की आड़ में अपने इस्लामी एजेंडा को आगे बढ़ाते हुए ममदानी लिखते हैं कि असहमति को देशद्रोह और विरोध को हिंसा में बदला जा रहा है। जैसे शायद उन्हें पता ही नहीं कि उनके ‘प्रिय उमर’ पर 53 लोगों की जान लेने वाले दंगे की साजिश रचने और उसे अंजाम देने का आरोप है। इसी पत्र में न्यूयॉर्क के ऊपर चढ़ा डेमोक्रेट का मुलम्मा भी उतरता है, जब ममदानी लिखते हैं, ‘‘मुस्लिम पहचान और राजनीतिक असहमति को एक ही फ्रेम में रख देना, आज के भारत की सबसे खतरनाक प्रवृत्ति है।’’
सोचिए, दिल्ली की सड़कों पर छोटे-मोटे विरोध प्रदर्शनों से लेकर दंगों को अंजाम देने वाले उमर खालिद की जड़ें कहां तक फैली हैं। भारत में वकीलों की फौज और विपक्ष के नेताओं का विलाप ही नहीं, उसे न्यूयॉर्क तक से समर्थन मिल रहा है! अपने पत्र में ममदानी ने खालिद को छात्र, लेखक, वक्ता और न जाने क्या-क्या बताया है। लेकिन जेल के वास्तविक आरोपों पर एक शब्द नहीं लिखा। पत्र में एक छिपी हुई चेतावनी भी है। इसमें लिखा है, ‘‘तुम अकेले नहीं हो। दुनिया के कई हिस्सों में लोग तुम्हारी कैद को देख रहे हैं।’’ इससे समझ सकते हैं कि किन लोगों की बात हो रही है। दिसंबर 2025 में जब खालिद के माता-पिता (सैयद कासिम रसूल इलियास व मां सबीहा खानम) अमेरिका गए थे, तब ममदानी ने उन्हें यह पत्र सौंपा था।
ममदानी के पैरोकार इस चिट्ठी को सिर पर उठाए घूम रहे हैं। ममदानी को अल्पसंख्यक व मानवाधिकार रक्षक बता रहे है। लेकिन बांग्लादेश में हिंदुओं की हत्या पर इनका एक बयान नहीं है। इनका ‘मानवाधिकार प्रेम’ तभी जागता है, जब आरोपी मुस्लिम हो। यह वैचारिक पक्षपात है। कैसे? जरा गौर कीजिए। 2020 में न्यूयार्क में राम मंदिर के विरोध में एक रैली हुई। इसमें हिंदुओं को अपमानित करने वाले नारे लगे, लेकिन चुप्पी साधे ममदानी रैली की शोभा बढ़ा रहे थे। अगस्त 2024 में ‘इंडिया डे परेड’ में राम मंदिर झांकी को उन्होंने ‘मुस्लिम विरोधी’ और ‘साम्प्रदायिक हिंसा भड़काने वाली’ बताया।
यही नहीं, ममदानी ने मई 2025 में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘युद्ध अपराधी’ कहा और दावा किया कि गुजरात में मुसलमान बचे ही नहीं हैं। हालांकि ऐसा दावा कर वह स्वयं ही उपहास का पात्र बने। ममदानी, उमर खालिद के ‘राजनीतिक वर्जन’ से अधिक कुछ नहीं हैं। उन्होंने न्यूयॉर्क की हिंदू जन प्रतिनिधि जेनिफर राजकुमार को ‘हिंदू फासीवादियों की कठपुतली’ कहा, जिन्होंने हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों के विरूद्ध आवाज उठाई थी। ममदानी जैसे लोगों का मानना है कि ‘कोई भी व्यक्ति पीड़ित या शोषित तभी होगा, जब वह मुसलमान होगा।’ ममदानी की सोच कितनी साम्प्रदायिक है, इसका पता इसी से चलता है कि जब इस व्यक्ति ने हिंदू मंदिरों का दौरा किया तो उनमें जूते पहनकर दाखिल हुआ।

















