Bangladesh: Tariq के 1971 संग्राम के बयान से क्यों उड़ी Yunus की नींद! क्या असफल होगी इतिहास बदलने की यूनुसी चाल!
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Bangladesh: Tariq के 1971 संग्राम के बयान से क्यों उड़ी Yunus की नींद! क्या असफल होगी इतिहास बदलने की यूनुसी चाल!

बांग्लादेश के कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी बहुधा कट्टर मजहबी तत्वों के ​हाथों में खेलती ही मानी जाती रही है, लेकिन तो भी 1971 के मुक्ति संग्राम को अपनी वैचारिक पहचान से जुड़ा बताती है

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Jan 6, 2026, 07:32 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के कार्यकारी चेयरमैन तारिक रहमान

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के कार्यकारी चेयरमैन तारिक रहमान

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के कार्यकारी चेयरमैन तारिक रहमान ने एक महत्वपूर्ण बयान दिया है जिसे सुनकर मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस की बेचैनी बढ़ गई होगी और नींद उड़ गई होगी। तारिक ने कहा है कि आखिर बांग्लादेश के अस्तित्व की कल्पना 1971 को याद किया बिना की ही नहीं जा सकती है। तारिक का यह बयान बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के राजनीतिक कार्यालय में वहां के वामपंथी दलों के गठबंधन डेमोक्रेटिक यूनाइटेड फ्रंट (DUF) के नेताओं के साथ बैठक में आया था। तारिक रहमान ने जोर देकर कहा कि मुक्ति संग्राम बांग्लादेश के राज्य और उसकी राजनीति की बुनियाद है इसलिए इसे भुलाया नहीं जा सकता। उनका ऐसा कहना वर्तमान राजनीतिक संदर्भ में कुछ अटपटा इसलिए लग सकता है क्योंकि पिछले साल जुलाई-अगस्त में छात्र आंदोलन के बाद से यूनुस की कट्टर मजहबियों के इशारों पर चल रही सत्ता ने बांग्ला भूमि से 1971 के संघर्ष की तमाम निशानियों को मिटा देने की बीड़ा उठाया हुआ है।

बेशक तारिक का ऐसा कहना मोहम्मद यूनुस और उनके इस्लामवादी मजहबी समर्थकों को रास नहीं आया होगा। तारिक ने का ऐसा कहना साफ बताता है कि वह बांग्लादेश की आजादी को झुठलाने वालों के विपरीत सोच रखते हैं। यूनुस की अंतरिम सरकार के गठन के बाद से बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी जैसे विपक्षी दल आश्चर्यजनक रूप से खामोश रहे हैं, लेकिन तारिक का यह बयान उनके भीतर संभवत: पनप रहे राष्ट्रीय भाव की भनक देता है।

1971 युद्ध के बाद आत्मसमर्पण के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करते हुए पाकिस्तानी जनरल

बांग्लादेश के कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी बहुधा कट्टर मजहबी तत्वों के ​हाथों में खेलती ही मानी जाती रही है, लेकिन तो भी 1971 के मुक्ति संग्राम को अपनी वैचारिक पहचान से जुड़ा बताती है। तारिक ने जो कहा, वह कोई अनोखी बात नहीं है, यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि भारत की मदद से लड़े गए 1971 के मुक्ति संग्राम के कारण ही बांग्लादेश अस्तित्व में आया है। तारिक का बयान वर्तमान में उभारे जा रहे धुंधलके के खिलाफ एक राजनीतिक हथियार भी है।

1971 का मुक्ति संग्राम बांग्लादेश के इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय है जब पूर्वी पाकिस्तान के अमानवीय अत्याचारों से त्रस्त उस भुमि के मानवों को भारत ने राहत पहुंचाई थी और वह पाकिस्तान से कटकर एक देश बना था। भाषा आंदोलन (1952) से शुरू हुई असंतोष की लहर 1970 के आम चुनावों में चरम पर पहुंची थी, जिसमें बंगबंधु नाम से जाने जाने वाले शेख मुजीबुर रहमान की अवामी लीग ने भारी बहुमत हासिल किया था। लेकिन बाद में, चिढ़ी पाकिस्तानी सेना द्वारा 25 मार्च 1971 को शुरू किए गए ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ में लाखों बंगालियों का नरसंहार हुआ था।

बंगबंधु शेख मुजीब का घर और स्मारक तोड़े गए

इसके जवाब में 26 मार्च को स्वतंत्रता की घोषणा करके मुक्ति वाहिनी का गठन किया गया। नौ महीने की उस जंग में करीब 3 लाख बंगाली शहीद हुए थे और 1 करोड़ शरणार्थी लुट—पिटकर भारत में शरण लेने को मजबूर हुए थे। भारत की सैन्य सहायता से 16 दिसंबर 1971 को ढाका मुक्त हुआ और बांग्लादेश का जन्म हुआ। इस युद्ध ने न केवल एक राष्ट्र का गठन किया, बल्कि बंगाली राष्ट्रीयता को अमर बना दिया था। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेता तारिक रहमान का बयान संभवत: इसी बुनियाद को याद रखे जाने की और संकेत करता है।

बंगबंधु शेख मुजीब स्मारक तोड़ा गया

लेकिन दुर्भाग्य से पिछले साल जुलाई-अगस्त के छात्र आंदोलन में शेख हसीना की सरकार अपदस्थ कर दी गई थी। हसीना सरकार के पतन के बाद अंतरिम सरकार के नेतृत्व में प्रदर्शनकारियों ने 1971 से जुड़े कई प्रतीकों को ध्वस्त किया। ढाका विश्वविद्यालय के ‘शहीद स्मृति स्तंभ’ को तोड़ा गया, जो 1952 भाषा आंदोलन और 1971 युद्ध की स्मृति में लगाया गया था। इसके अलावा मुक्ति संग्राम के नायकों की मूर्तियां क्षतिग्रस्त की गईं। बंगबंधु शेख मुजीब का घर और स्मारक तोड़े गए। सुप्रसिद्ध बांग्ला फिल्मकार सत्यजीत रे का पुश्तैनी घर जमींदोज कर दिया गया।

अंतरिम सरकार के प्रमुख सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने मूक रहकर ऐसे देशविरोधी कृत्यों का अप्रत्यक्ष समर्थन ही किया है। उनके समर्थक ‘राष्ट्रनिर्माण’ के नाम पर 1971 के इतिहास को बदलने में लगे हैं। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी का मानना है कि यह आजादी की विरासत को मिटाने की साजिश है।

लंदन में निर्वासित तारिक ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को सक्रिय रखा हुआ है। हसीना के निर्वासन के बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को एक मौका मिला है, लेकिन यूनुस सरकार के रहते वे हाशिए पर ही हैं। उनके इस बयान को राष्ट्रीय भाव को पुनर्जीवित कर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को मुख्यधारा में लौटाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

अब विश्लेषकों का मानना है कि तारिक का यह बयान चुनावों से पहले 1971 के मुद्दे को गरमाएगा। यूनुस मानें न मानें, बांग्लादेश में 1971 अभी भी एक बड़ा भावनात्मक मुद्दा है। हर वर्ष 16 दिसंबर को वहां विजय दिवस मनाया जाता है। यूनुस गुट पर ‘इतिहास-विरोधी’ होने का आरोप लगाना बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को जनाधार बढ़ाने में मदद कर सकता है।

इतिहास गवाह है कि बांग्लादेश के सभ्य जन मुक्ति संग्राम केवल युद्ध नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का एक बड़ा मोड़ था। यह बंगाली भाषा, साहित्य और लोकसंस्कृति की विजय थी। इसके प्रमुख नायक जैसे जनरल माग फजलुल हक, कर्नल तारेक और शहीद रजाजुल करीम ने बलिदान दिया। वहां असल बांग्लादेशी लोग भारत की भूमिका को ‘मित्र राष्ट्र’ के रूप में याद करते हैं। लेकिन आंतरिक कलह में मुजीब की हत्या, तानाशाही और सैन्य शासन ने इस विरासत को कमजोर किया है।

तारिक रहमान का बयान बांग्लादेश को उसके मूल की ओर लौटाने का संकेत हो सकता है। 1971 के बिना अस्तित्व असंभव, यह संदेश राजनीतिक बहस को नई दिशा दे सकता है। इससे यूनुस सरकार पर दबाव बढ़ेगा। बांग्लादेश का भविष्य इसी ऐतिहासिक नींव पर टिका है।

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Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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