बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को आम चुनाव होने वाले हैं। इसी बीच एक बड़ा मामला सामने आया है। गोपालगंज-3 सीट, जहां से पहले शेख हसीना चुनाव लड़ती थीं, वहां से हिंदू नेता और वकील गोविंद चंद्र प्रमाणिक निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लड़ने वाले थे। लेकिन चुनाव आयोग ने उनका नामांकन रद्द कर दिया। गोविंद चंद्र प्रमाणिक बांग्लादेश जातीय हिंदू महाजोत के महासचिव हैं और हिंदू समुदाय की आवाज़ उठाने के लिए जाने जाते हैं।
नामांकन रद्द होने की वजह?
दैनिक भास्कर को दिए इंटरव्यू के अनुसार, प्रमाणिक ने गोपालगंज-3 से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में पर्चा भरा था। नियम के मुताबिक, निर्दलीय को कुल वोटरों का कम से कम 1% हस्ताक्षर जमा करने होते हैं। उन्होंने ये हस्ताक्षर वाली लिस्ट समय पर दी थी। लेकिन चुनाव आयोग के लोग वेरिफिकेशन के लिए पहुंचे तो कई लोग मुकर गए। प्रमाणिक का कहना है कि एक रात पहले ही बीएनपी (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) के नेताओं ने घर-घर जाकर उन लोगों को धमकाया कि तुम्हें गिरफ्तार कर लेंगे। एक हिंदू नेता तापोश हलदार ने भी नामांकन किया था, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। दो-तीन और हिंदुओं ने चुनाव लड़ने की बात कही तो उन्हें भी धमकियां मिलीं। प्रमाणिक कहते हैं कि ये सब इसलिए किया गया क्योंकि वे नहीं चाहते कि कोई हिंदू निर्दलीय चुनकर संसद पहुंचे।
क्यों निर्दलीय लड़ना चाहते हैं?
प्रमाणिक कहते हैं कि उन्होंने ये जिम्मेदारी ली है कि कम से कम एक सीट से ऐसा उम्मीदवार संसद जाए जो खुलकर हिंदुओं की बात रखे। इसलिए सभी पार्टियां और ताकतें उन्हें रोकने की कोशिश कर रही हैं। वे कहते हैं कि मुझे पूरा भरोसा है कि वे रोक नहीं पाएंगे। मैं चुनाव आयोग में अपील करूंगा, जरूरत पड़ी तो हाईकोर्ट जाऊंगा। आखिर में मेरी जीत होगी और नामांकन वैध होगा।
चुनाव आयोग कभी नहीं रहा निष्पक्ष
प्रमाणिक के मुताबिक, बांग्लादेश में चुनाव आयोग कभी आजाद नहीं रहा। पहले अवामी लीग सत्ता में थी तो उसकी चलती थी, अब बीएनपी की चल रही है। संस्थाएं सत्ता के इशारे पर काम करती हैं। अदालतें भी पूरी तरह आजाद नहीं। पार्टियां एक-दो सीटों पर हिंदू उम्मीदवारों को लड़ने देती हैं, लेकिन सिर्फ दिखावे के लिए। असल में वे नहीं चाहते कि हिंदू अपनी आवाज मजबूती से उठाएं।
बांग्लादेश में हिन्दू विरोधी भावना फैली है
हाल ही में हिंदू युवक दीपू चंद्र दास को मारकर जला दिया गया। प्रमाणिक कहते हैं कि पुलिस ने इस केस में सख्ती दिखाई और आरोपियों को जल्दी पकड़ लिया। लेकिन पूरे देश में हिंदू विरोधी भावना फैली हुई है। ये शेख हसीना के समय से चल रही है। काफी मस्जिद-मदरसे बने, जिससे कट्टरता बढ़ी। कट्टर लोग हिंदुओं को निशाना बनाते हैं, लेकिन अब सरकार कार्रवाई कर रही है—अवामी लीग के समय से ज्यादा। बीते कुछ हफ्तों में 6 हिंदुओं की हत्या हुई है। ये हत्याएं मैमनसिंह, राजबाड़ी, शरियतपुर, नरसिंगदी, जेसोर में हुई हैं।
हिंदुओं की भागीदारी के लिए मांग है?
प्रमाणिक कहते हैं कि हिंदू समुदाय अलग निर्वाचन व्यवस्था (सेपरेट इलेक्टोरेट) चाहता है। भारत सरकार से गुहार लगाई गई कि वो हसीना से मांग करे कि हिंदुओं के लिए संसद में 40-45 सीटें रिजर्व हों। तब हिंदू मजबूती से चुनकर आएंगे। सभी पार्टियां हिंदू वोट को गंभीरता से नहीं लेतीं। पहले बीएनपी 30 सीटें रिजर्व करने की बात करती थी, लेकिन अब भूल गई। जमात-ए-इस्लामी भी ऐसा ही सोचती है।
सारी पार्टियां हैं कट्टर
सारी पार्टियां अंदर से कट्टर हैं। कुछ सेक्युलर होने का दिखावा करती हैं, लेकिन असल में जमात जैसी सोच रखती हैं। शहरों में पढ़े-लिखे लोग कम हैं, गांवों में सांप्रदायिक भावना ज्यादा। प्रमाणिक कहते हैं कि उनका नामांकन रद्द होने की खबर दुनिया में पहुंच गई है। इससे सरकार पर दबाव है। यूरोपियन यूनियन से मीटिंग हुई है। वे चाहते हैं कि अल्पसंख्यक चुनाव में हिस्सा लें। दुनिया के देशों—भारत, अमेरिका—को आवाज उठानी चाहिए। महिलाओं के हक के लिए जितनी आवाज उठती है, उतनी अल्पसंख्यकों के लिए भी उठनी चाहिए।

















