भुवनेश्वर। सागर तट को सुरा और सुंदरी का केंद्र नहीं बनने दिया जाना चाहिए और समुद्र तटवर्ती क्षेत्रों में धर्माचरण के विरुद्ध किसी भी प्रकार की गतिविधि नहीं होनी चाहिए। यह आह्वान जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने किया। पौष पूर्णिमा के अवसर पर 3 जनवरी की संध्या को आयोजित तीर्थराज श्रीमहोदधि आरती के 20वें महोत्सव को संबोधित करते हुए उन्होंने यह विचार व्यक्त किए।
जगद्गुरु शंकराचार्य ने कहा कि समुद्र तट का स्वरूप आध्यात्मिक एवं पवित्र बना रहना चाहिए। उन्होंने बताया कि समुद्र तट पर प्रतिदिन आरती किए जाने के पीछे एक घटना है। काशी में जब वे अपने गुरु के पास बैठे थे, तब गुरु ने उनसे कहा, “क्या तुम कलियुग के दर्शन करना चाहते हो?” यह सुनकर वह भय से कांप उठे। तब गुरुजी ने कहा, “सूर्यास्त के बाद गंगा तट पर घूमकर आओ, वहाँ सुरा और सुंदरी के स्वरूप में तुम्हें कलियुग के दर्शन हो जाएंगे।”
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उन्होंने यह भी बताया कि जहां आज महोदधि आरती होती है, वह स्थान पहले मद्यपान का केंद्र बन चुका था। शंकराचार्य पद पर आसीन होने के बाद उन्होंने संकल्प लिया कि इस सागर तट को कभी भी सुरा-सुंदरी का केंद्र नहीं बनने दिया जाएगा। इसी संकल्प के साथ महोदधि आरती की परिकल्पना की गई और इसका आयोजन आरंभ हुआ। जगद्गुरु ने कहा कि भारत को कोई भी कभी दिशाहीन नहीं कर सकता। जब-जब ऐसा समय आया है, तब-तब भगवान की प्रेरणा से सिद्ध संत-महापुरुषों ने अवतार लिया है। प्रत्येक व्यक्ति को समाज के हित में अपने जीवन का उपयोग करते हुए अपने कर्तव्यों और दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए।
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उन्होंने कहा कि भगवान की कृपा से हमें मानव जीवन प्राप्त हुआ है, और इस जीवन को धर्माचरण एवं भगवद्भक्ति में विनियोजित करना चाहिए। भगवत तत्व में विज्ञान के मार्ग को प्रशस्त करने की आवश्यकता है। श्रीमद्भागवत में मुक्ति की परिभाषा दी गई है। मुक्ति कोई उत्पाद नहीं है, बल्कि यह नित्य सिद्ध स्वरूप है। सच्चिदानंद, सद्भाव, सेवा और संगठन की शक्ति को अपनाकर जीवन में दिव्यता का आवाहन करने का उन्होंने आह्वान किया।
जगद्गुरु शंकराचार्य ने कहा कि भारत विश्व का हृदय है। स्वयं जगदीश्वर राम और कृष्ण के रूप में यहाँ अवतार लेते हैं, और सीता तथा रुक्मिणी के रूप में जगदीश्वरी जन्म लेती हैं। सिद्ध संत मानव रूप में जन्म लेकर समाज को दिशा देते हैं। उन्होंने कहा कि धर्म का फल वैराग्य, वैराग्य का फल समाधि, समाधि का फल ज्ञान, और ज्ञान का फल मोक्ष है। आत्मा को आत्मा के अनुरूप जानना ही मुक्ति है, और आत्मा स्वभावतः मुक्त है—इस अनुभूति को प्राप्त करना ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। एक अन्य संदर्भ में जगद्गुरु ने कहा कि हिंदुओं को हत्या की धमकियाँ दी जा रही हैं, किंतु यह स्मरण रखना चाहिए कि भारत का कोई भी कुछ भी अहित नहीं कर सकता।
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इस अवसर पर जगद्गुरु शंकराचार्य ने तीर्थराज महोदधि को नैवेद्य अर्पण कर भव्य आरती संपन्न की। सभी नदियों के संगमस्वरूप महोदधि की आरती के दर्शन हेतु हजारों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। घंटा-घड़ियाल, शंखनाद और वेदमंत्रों की मंगलध्वनि के बीच आरती का दृश्य अत्यंत हृदयग्राही रहा। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो नैवेद्य अर्पण के समय स्वयं समुद्र समीप आ रहा हो और लहरें अधिक उछाल मार रही हों।
पाठ्यक्रम में भागवत, रामायण और महाभारत को शामिल किया जाए : गजपति महाराज
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए गजपति महाराज दिव्यसिंह देव ने कहा कि श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र स्वयं महाप्रभु का स्वरूप है, अतः इसे मांसाहार और अनैतिक गतिविधियों से मुक्त रखना सभी का दायित्व है। उन्होंने कहा कि बाल्यकाल में प्राप्त शिक्षा से ही व्यक्ति का चरित्र और व्यक्तित्व निर्माण होता है, किंतु वर्तमान शिक्षा प्रणाली में भागवत, रामायण, महाभारत और वेदों का स्थान नहीं है।
उन्होंने सुझाव दिया कि यदि इन ग्रंथों को विद्यालयों और महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जाए तो आदर्श चरित्र, उत्तम व्यक्तित्व और सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव है। प्रत्येक विद्यालय में भौतिक शिक्षा के साथ-साथ आध्यात्मिक एवं नैतिक शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए। इसके लिए उन्होंने शिक्षा मंत्री से विशेष ध्यान देने का आग्रह किया। कार्यक्रम में अनेक विशिष्ट साधु-संतों के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह क्षेत्र प्रचारक जगदीश प्रसाद खाड़ंगा, पुरी से सांसद डॉ. संबित पात्र भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मनमोहन सामल, राज्य उच्च शिक्षा मंत्री सूर्यवंशी सूरज, विधायक आश्रित पटनायक, पूर्व विधायक जयंत षडंगी, गोवर्धन मठ के सचिव स्वामी निर्विकल्पानंद, महोदधि आरती के महासचिव इंजीनियर प्रशांत आचार्य सहित वरिष्ठ सेवायत एवं अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने कार्यक्रम में सहभागिता की। इस कार्यक्रम का संचालन श्री ऋषिकेश ब्रह्मचारी, पंडित मातृ प्रसाद मिश्र और पूर्ण चंद्र खुंटिया ने किया। महोत्सव के दौरान 1008 दीपों का प्रज्वलन किया गया, जिससे संपूर्ण वातावरण आध्यात्मिक आलोक से जगमगा उठा।














