वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादूरो को ट्रंप के आदेश पर उनके निवास से गिरफ्तार कर न्यूयार्क ले जाने का मामला शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। विश्व के अनेक देशों ने अमेरिका के प्रति तलवारें खींच ली हैं, कुछ ने इस गिरफ्तारी को कानून विरोधी बताया है तो कुछ ने इसे संयुक्त राष्ट्र के चार्टर की अवहेलना करार दिया है। विशेषकर चीन और रूस से तीखे बयानों का आना यह दिखाता है कि अनेक महाशक्तियां अमेरिका की इस थानेदारी की विरोधी हैं और अमेरिका को कायदे में रहने की सलाह दे रही हैं। तेल और सोने से सम्पन्न वेनेजुएला पर अमेरिका का दबदबा कायम होने का अर्थ है वहां के तेल भंडारों और सोने की खदानों पर अमेरिका का प्रभुत्व होना।
बेशक, दुनिया वेनेजुएला पर अमेरिकी कार्रवाई को लेकर दो धड़ों में बंटी दिख रही है। जैसा पहले बताया, चीन और रूस तो ट्रंप प्रशासन के खिलाफ खुलकर सामने आए हैं। चीन के पिछलग्गू देश उत्तर कोरिया के तानाशाह ने भी इस मामले पर अमेरिका के विरुद्ध अपनी भवैं तरेरी हैं। जबसे राष्ट्रपति मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोर्स को अमेरिकी सेना हिरासत में लेकर न्यूयॉर्क ले गए है तबसे विश्व के अनेक विषय मानो गौण हो गए हैं। विश्व में तनाव का माहौल पैदा हुआ है।

चीन ने अमेरिका की इस कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर का स्पष्ट उल्लंघन करार दिया है। चीन के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि मादुरो दंपती को तुरंत रिहा किया जाए, उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा सुनिश्चित हो और वेनेजुएला सरकार को गिराने की कोशिशें बंद हों।
कम्युनिस्ट बीजिंग के लिए मादुरो सरकार का गिरना एक बड़ा झटका है, क्योंकि वेनेजुएला चीन का प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता रहा है। चीन ने संवाद और बातचीत के जरिए मुद्दों के समाधान पर जोर दिया है। उसने इस कार्रवाई को अमेरिकी तानाशाही की मिसाल बताया है।
उधर, रूस ने भी अमेरिका से मादुरो और उनकी पत्नी को तुरंत रिहा करने की अपील की है। रूसी विदेश मंत्रालय ने इसे संप्रभु देश के नेता के खिलाफ हमला करार दिया है और सभी विवादों के हल के लिए बातचीत का माहौल बनाने की सलाह दी है। मॉस्को का मानना है कि ऐसी कार्रवाइयां क्षेत्रीय तनाव बढ़ाएंगी, इसलिए कूटनीतिक समाधान ही एकमात्र रास्ता है। रूस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाए जाने का समर्थन किया है।
इनके अलावा ईरान ने भी वेनेजुएला पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की कड़ी निंदा की है। उसने इसे राष्ट्रीय संप्रभुता का घोर उल्लंघन बताया। क्यूबा तो लंबे समय से अमेरिका विरोधी रहा है, इसलिए उसने वेनेजुएला के प्रति अपना समर्थन खुलकर व्यक्त किया है।

अमेरिका के पड़ोसी देश मेक्सिको ने वेनेजुएला की जमीन पर एकतरफा अमेरिकी कार्रवाई को अस्वीकार किया है। उसने सैन्य हस्तक्षेप को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा बताया है। दक्षिण अमेरिकी देश ब्राजील ने इस अमेरिकी कदम को तानाशाही बताया है। उसने कहा हे कि हर देश की संप्रभुता का सम्मान किया जाना जरूरी है।
यूरोपीय संघ ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक सत्ता परिवर्तन के रास्ते का समर्थन किया है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कहा हे कि वे स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।
मीडिया के एक वर्ग में जताई गई आशंकाओं पर स्पष्टीकरण देते हुए ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने साफ कहा कि ब्रिटेन का इस कार्रवाई में कोई हाथ नहीं है। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन और शांतिपूर्ण हस्तांतरण सुनिश्चित होना जरूरी है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक में भी रूस और चीन ने अमेरिका के खिलाफ मोर्चा खोला। इससे ट्रंप प्रशासन पर दबाव बढ़ा है, क्योंकि वेनेजुएला में तेल संसाधनों और क्षेत्रीय स्थिरता पर असर पड़ सकता है। कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद लातीनी अमेरिका में एक नया संकट पैदा कर सकता है।

















