राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक और 2014-20 तक भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव रहे राम माधव की पहचान लेखक और समाजशास्त्री की है। लेकिन वे रणनीतिक मामलों, वैश्विक समीकरणों एवं राजनीतिक गतिविधियों की भी गहन समझ रखते हैं। वे कठिन-असहज प्रश्नों को सरलता से उठाते हैं, जिनसे लोग परहेज करते रहे हैं। वैश्विक संबंधों पर उनकी चर्चित पुस्तकें नई दृष्टि प्रदान करती हैं। पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने श्री राम माधव के साथ संघ, समाज और विश्वव्यापी मुद्दों पर गहन चर्चा की। प्रस्तुत हैं बातचीत के संपादित अंश
रा.स्व.संघ भारत की बहुलता और बहुपंथी पहचान को कैसे देखता है? वह इसे एक बहुसंप्रदायी सांस्कृतिक सभ्यता के रूप में स्वीकार करता है या उसके सांस्कृतिक राष्ट्र की परिभाषा से देश की विविधता सीमित होती है?
भारत का हजारों वर्षों का प्रस्थान ही संघ की विचारधारा का आधार है। संघ ने कोई अलग विचारधारा नहीं बनाई। संघ उसी परंपरा को जीता है, जहां अनेक पंथ और संप्रदाय रहे, सभी को पूर्ण आजादी और सम्मान मिला। हमने हमेशा बहुलता का आदर किया। सहिष्णुता (टॉलरेंस) तो वह है, जहां मैं आपको अच्छा न मानकर भी सह लेता हूं। स्वीकृति (एक्सेप्टेंस) से आगे बढ़कर हम विविधता का उत्सव मनाते हैं। हम विविधता का आनंद लेते हैं, लेकिन संस्कृति पर आधारित एकता को सर्वोपरि मानते हैं। भारत हमेशा से ‘बहुधर्मी’ नहीं, ‘बहुपंथी, बहुसंप्रदायी, विविध आस्थाओं वाला’ देश रहा है। संघ इस विविधता को पूर्ण सम्मान देता है। लेकिन संघ हमेशा एक ही बात कहता है, कोई विविधता पर जितना आग्रह करता है, एकता पर उतना क्यों नहीं करता? विविधता का जितना महत्व है, उतना एकता का भी तो है न यह देश विविध भी रहा और एक भी। आग्रह करने वालों के साथ समस्या यह है कि वे विविधता पर ही आग्रह करते हैं और पूछते हैं कि संघ विविधता को मानता है कि नहीं? लेकिन संघ विविधता को नकारता नहीं, वह एकता का पुजारी है। हम चाहते हैं कि उस पर भी चर्चा हो, लेकिन उस पर चर्चा ही नहीं होती।
संघ हिंदुत्व को इस देश की सांस्कृतिक पहचान बताता है, जो आस्थागत या पंथ तक सीमित नहीं है। फिर भी अल्पसंख्यकों से बार-बार निष्ठा का प्रमाण मांगा जाता है। आप इसे कैसे देखते हैं, क्योंकि अल्पसंख्यकों के मन में भी प्रश्न उठते हैं?
किसी व्यक्ति विशेष से निष्ठा का प्रमाण मांगना अपमानजनक है। बहस में निष्ठा पर सवाल उठाना स्वाभाविक है, लेकिन किसी पंथ या संप्रदाय के आधार पर टीवी स्टूडियो में प्रमाण मांगना गलत है। इसके साथ ही हमें सोचना चाहिए कि क्या अल्पसंख्यक इस देश की सांस्कृतिक एकात्मता से खुद को जोड़ने का प्रयास करते हैं? यह व्यक्तिगत देशभक्ति का प्रश्न नहीं, बल्कि व्यापक वैचारिक दृष्टि का है। 1947 में एक तबके ने भारत को अस्वीकार किया, जिससे देश खंडित हुआ। जब 1857 में सब एकजुट होकर अंग्रेजों से लड़े थे, तब तो किसी ने यह प्रश्न नहीं उठाया था। ऐतिहासिक घटनाओं पर सबको-अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक-गंभीरता से विचार करना चाहिए। सांस्कृतिक एकात्मता पर आस्था बनाए रखने का आग्रह सही है, लेकिन हर व्यक्ति को रोज परख न जाए। कश्मीर का अनुभव बताता है कि आम लोग रोज प्रूफ देते-देते थक जाते हैं, जब टीवी पर कठघरे में बिठाकर पाकिस्तानी ठहराए जाते हैं। व्यापक विचार पर भी ध्यान दें।
संघ एकता, सहमति और सर्वसहमति की बात करता है। लेकिन उसकी असहमति की परिभाषा क्या है? असहमति और देशद्रोह को आप कैसे अलग करेंगे?
असहमति को देशद्रोह बिल्कुल नहीं मानना चाहिए। आज सोशल मीडिया पर कई लोग ‘पेट्रियॉट’ बनकर दूसरों को दोषी ठहराते हैं, यह सही नहीं। असहमति हमेशा हमारे सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा रही है। हम किसी आस्था का अंधानुकरण करने वाले नहीं हैं। हम ‘बिलीवर्स’ नहीं, ‘सीकर्स’ रहे हैं। हम कहते हैं, जिज्ञासु बनें, प्रश्न करें, समझें और फिर स्वीकार करें। इसलिए असहमति को स्वीकार करना चाहिए। जो असहमत है, उसे देशद्रोही कहना या हमारा विरोध कहना-यह संघ का सिद्धांत नहीं है। संघ का सूत्र ही है-सर्वेषाम् अविरोधेन। संघ किसी को उस दृष्टि से नहीं देखता है। हम तो यही कहते हैं कि आज अगर कोई विरोधी विचार रखता है, तो कल इसे देशभक्ति में बदला जा सकता है। हमारा लक्ष्य विरोधी भावना फैलाना नहीं, बल्कि विचारों को समेकित करके मार्ग दिखाना है।
संघ की राष्ट्र की अवधारणा या सांस्कृतिक राष्ट्र की अवधारणा मॉर्डन नेशन स्टेट सिद्धांत से कैसे अलग है? क्या संघ यह मानता है कि इस देश की परंपराओं में मुस्लिम और ईसाई परंपराएं भी शामिल हैं?
पहली बात, नेशन स्टेट की कल्पना मात्र 250-300 साल पुरानी है और उसकी सही अवधारणा आज तक प्रस्थापित नहीं हुई है। यूनाइटेड किंगडम आज पूर्ण रूप से एक राष्ट्र है या नहीं, इस पर स्वयं उसे भी स्पष्टता नहीं है। स्कॉटलैंड अभी तक दो बार अपना रेफरेंडम कर चुका है। आज से 150 वर्ष पहले इंग्लैंड, वेल्स और स्कॉटलैंड ने मिलकर एक राष्ट्र बनाने का प्रयास किया था। फेडरल स्टेट की नई अवधारणा भी ऐसी ही है। ये सब मॉडर्न नेशन स्टेट के ही उत्पाद हैं। दुनिया में जितनी भी मॉडर्न नेशन स्टेट हैं, खासकर यूरोप में,उनमें अलग होने के लिए अंदरूनी तौर पर बड़े-बड़े आंदोलन चलते हैं। जैसे- फ्रांस, इटली और यूके। यानी नेशन स्टेट न तो स्थायी विचार है और न ही महत्वपूर्ण। इसके मुकाबले भारत और चीन जैसे प्राचीन राष्ट्र केवल विचार नहीं, इतिहास हैं। संघ के विचार इतिहास में एक व्यापक राष्ट्र-परिप्रेक्ष्य पर टिके हैं, जो नेशन स्टेट की आधुनिक कल्पना से बड़ा है। नेशन स्टेट अक्सर किसी एक पहचान के आधार पर (भाषा-नस्लीय पहचान और युद्ध विजयों) बना होता है। लेकिन हमारा दृष्टकोण हजारों वर्षों से चली आ रहीं विविध परंपराओं को संभालता है, भाषा, संस्कृति, पंथ-संप्रदाय की विविधता को शामिल करता है। राष्ट्र की हमारी कल्पना इवोल्यूशनरी है। इसमें हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख आदि परंपराएं हैं। 2,500 वर्ष पहले भारत में अनेक पंथ-संप्रदाय आते रहे, पर इसकी सांस्कृतिक धारा अक्षुण्ण रही। इसलिए विविधता का सम्मान होना चाहिए। सबको एक ही सांचे में नहीं डाला जाना चाहिए। विविधताओं को अपनाते हुए एक साथ रहने की यह संस्कृति ही भारत की पहचान है। नहीं तो दुनिया में ऐसा कौन सा इस्लामी देश है, जहां इस्लाम की 70 विविध शाखाएं देखने को मिलती हैं। एक ही देश है-भारत। इसलिए इसे संस्कृति का पालना भी कहते हैं।

भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को संघ कैसे देखता है? कुछ लोगों का आरोप है कि संघ में जातिगत प्रभुत्व है। वे संघ को ठीक से नहीं समझते या संघ अपनी बात ठीक से नहीं समझा पाया है?
वर्ण व्यवस्था का अपभ्रंश जाति बनी। वर्ण चार ही थे, लेकिन 1916 में काका कालेलकर समिति आते-आते 2300 जातियां बन गईं। मंडल आयोग में यह बढ़कर 3,900 हुईं और अब ये 4,300 हैं। यह एक अलग व्यवस्था बन गई है, वर्ण व्यवस्था से इसका कोई संबंध नहीं है। जैसा कि परम पूजनीय सरसंघचालक श्री मोहन भागवत जी ने भी कहा है कि यह काल बाह्य (आउटडेटिड) है। इसे राजनीति ने जीवित रखा है। संविधान में एससी/एसटी/ओबीसी/सवर्ण श्रेणी बनाकर हमने इसे पक्का किया, लेकिन सामाजिक रूप से काल बाह्य है।
लोग उपनाम से जाति जोड़ते रहते हैं। बाबासाहब आंबेडकर ने अपनी पुस्तक ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ में जाति व्यवस्था के समाप्ति की बात की है, लेकिन इसे क्रांति से नहीं बदला जा सकता। महाराष्ट्र में एक संस्था बनी-जाति-पाति तोड़क मंडल, लेकिन यह खुद ही एक जाति बन गई। संघ कहता है कि एकजुट हो, अपने धर्म और संस्कृति को अपनी पहचान बनाओ। धीरे-धीरे ये चीजें गौण होती जाएंगी। इसके लिए संघ प्रयासरत है। अगर कोई कहता है कि संघ में जातिवाद है, तो यह सरासर गलत है। संघ ने कभी जाति को नहीं माना। डॉक्टर जी के समय नागपुर शिविर में सवर्ण स्वयंसेवकों ने अलग खाना खाया, लेकिन दूसरे दिन सबके साथ खाया। गांधी जी भी वर्धा शिविर आए। संघ के आनुषांगिक संगठनों में सभी वर्गों-जाति, संप्रदाय और पुरुष-महिला का समावेश सहजता से होता है, बिना ‘सामाजिक न्याय’ जैसे शब्दों के। इससे एकता बढ़ती है।
संघ महिलाओं को राष्ट्र निर्मात्री, राष्ट्र शक्ति और मातृशक्ति मानता है, पर नेतृत्व-निर्णायक भूमिका में उनकी स्थिति को कैसे देखता है? क्या संघ उन्हें पुरुषों के समान ही मानता है?
संघ की शाखा-व्यवस्था पुरुष केंद्रित है, ताकि स्वयंसवेक रोज एक घंटा आपस में मिलें, शारीरिक और बौद्धिक कार्यक्रम करें। सुबह-शाम का यह समय महिलाओं के लिए सुविधाजनक नहीं, इसलिए पुरुषों के लिए अलग व्यवस्था की गई है। इसी तरह, महिलाओं के लिए राष्ट्र सेविका समिति अलग से शाखा जैसा कार्यक्रम चलाती है। शाखा के बाहर संघ के जितने कार्य होते हैं, उसमें महिलाओं का हमेशा से बड़ा योगदान रहा है, जिसे और बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। 1980 के दशक में जब मैं अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा कार्यकारी मंडल में जाना शुरू किया था, उसमें मुश्किल से 10 महिलाएं होती थीं। आज उनकी संख्या लगभग 300 तक होती है। सामाजिक जीवन में संघ अधिक से अधिक महिलाओं को प्रोत्साहित करने का प्रयास कर रहा है, क्योंकि संघ का मानना है कि राष्ट्र निर्माण कार्य में महिलाएं पुरुषों से अधिक योगदान दे
सकती हैं।
संघ की जो भारतीयता की परिभाषा है, उसमें आधुनिकता के लिए कितनी जगह है? संघ की दृष्टि से भारतीयता में आधुनिकता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों का स्थान क्या है?
संघ के कार्य में सबका पूर्ण रूप से स्थान है। आपने व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात की। अंग्रेजी में कहावत है योर फ्रीडम एंड्स वेयर माई नोज बिगिन्स। यानी आपकी आजादी तब तक है, जहां तक मेरी नाक का प्रश्न नहीं आता है। संघ हर व्यक्ति की स्वतंत्रता और दायित्व को साथ स्वीकार करता है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान होता है, पर दायित्व भी अनिवार्य है, कर्तव्य सहित आजादी संघ के मूल में है। संघ में पहले निक्कर होते थे, अब 2015 से फुल पैंट हो गया। लेकिन लोगों को मालूम नहीं कि यह निर्णय लेने में 6 वर्ष लग गए। पहली बार इस पर चर्चा 2009 में हुई थी। मतलब संघ में हर चर्चा बहुत खुलकर होती है। सबका मत लिया जाता है। व्यक्तिगत विचारों का संघ में पूरा सम्मान होता है। आधुनिकता को भी संघ धीरे-धीरे स्वीकारता है। पतलून जैसी परंपराओं को भी समय के साथ अपनाया गया। अनुशासन, समय की पाबंदी और मानव सम्मान को संघ अग्रिम मानता है, जो पश्चिमी मानक से परे एक सुसंस्कृत आधुनिकता की ओर संकेत करता है। रही बात संवैधानिक अधिकारों की, तो संविधान में केवल अधिकार ही नहीं है। अनुच्छेद 51 में दायित्व, कर्तव्य भी है। कर्तव्यों का भी पालन होना चाहिए।
संघ की दृष्टि में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और संविधान, दोनों में सर्वोच्च कौन है? और अगर टकराव की बात आती है तो संघ किसे प्राथमिकता देगा?
पहली बात, संविधान बनाम राष्ट्रवाद का प्रश्न गलत है। संविधान राष्ट्रीय एकता-अखंडता का दस्तावेज है। अगर कोई उसका गलत मतलब समझ रहा है तो यह गलतफहमी भी दूर होनी चाहिए। नागरिक के नाते संविधान के प्रति पूर्ण श्रद्धा अनिवार्य है, साथ ही राष्ट्र की सांस्कृतिक अवधारणा के प्रति भी। समस्या संविधान से कम, सांस्कृतिक राष्ट्र-एकता से ज्यादा है। संविधान का मूल भाव सांस्कृतिक एकता को सम्मान देता है। यह जीवंत दस्तावेज है, संविधान सभा ने ही परिवर्तन की स्वतंत्रता दी। जन-प्रतिनिधि समयानुसार संशोधन कर सकते हैं। जैसे धारा 370 हटाई गई, हिंदू कोड बिल बदला गया। संविधान देश को एक पहचान देता है और समय के अनुरूप बदलाव की शक्ति रखता है। संघ इसे इसी रूप में देखता है।
संघ और गांधी जी को लेकर बहुत प्रश्न उठाए जाते हैं। संघ के प्रातःस्मरण में गांधी जी हैं, लेकिन उनका अहिंसा, बहुलता और अल्पसंख्यक सुरक्षा का सिद्धांत संघ की चिंताओं में कितना शामिल है?
संघ प्रातः स्मरण में देश के अनेक महापुरुषों को शामिल करता है, जिन्होंने राष्ट्रजीवन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इनमें गांधीजी का नाम भी है। उनका योगदान राष्ट्र और विश्व स्तर पर अभूतपूर्व है। भारत की 1947 की आजादी का आधार गांधीजी का सत्याग्रह-अहिंसा आंदोलन था। उसके बाद 60 से अधिक देशों ने यही रास्ता अपनाया-भारत से दक्षिण अफ्रीका तक। विश्वव्यापी सम्मान का यह योगदान हमें गर्व से लेना चाहिए। फिर भी, किसी व्यक्ति के जीवन में सब कुछ सही नहीं होता। कुछ विचारों से असहमति संभव है, जैसे 1919-45 तक गांधी जी का मुस्लिम लीग-जिन्ना नीति और खिलाफत आंदोलन के प्रति व्यवहार। उनके 20 वर्ष के कालखंड को लेकर संघ में भिन्न मत रहा है। गांधी जी की शैली को लेकर कांग्रेस में भी विरोध हुआ। नेहरू ने 5 नवंबर, 1945 को गांधी जी को पत्र लिखा, ‘‘हिंद स्वराज बचपन में पढ़ा, तब भी सहमत नहीं था। अब बड़ा हो गया हूं। आज तो उसको मानने का सवाल ही पैदा नहीं होता।’’ गांधी जी ने जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस का साथ देने से मना कर दिया तो उन्होंने भी बापू का विरोध किया, पर बाद में उन्हें ‘महात्मा’ कहा। संघ विचारों से भिन्न मत रख सकता है, पर व्यक्तित्व का पूर्ण सम्मान करता है।
क्या राष्ट्रप्रेम की विविधता संभव है? क्या आलोचना में देशभक्ति नहीं हो सकती? संघ क्या मानता है?
संघ आलोचना की पूर्ण स्वतंत्रता का समर्थन करता है-चाहे विचारों की हो, संगठनों या व्यक्तियों की। सार्वजनिक जीवन में विरोध स्वाभाविक है। हमारे यहां कभी-कभी लगता है कि सरसंघचालक जी का कोई कैसे विरोध कर सकता है? स्वयंसेवक उन्हें गुरु, पिता तुल्य मानें, पर समाज में चार प्रकार के विरोध संभव हैं, उसे स्वीकार करना चाहिए। लेकिन राष्ट्र-एकता का विरोध अस्वीकार्य है। जिन्ना को इसलिए नहीं सम्मानित करते, क्योंकि उन्होंने एकता भंग की। मौलाना अबुल कलाम आजाद को सम्मान देते हैं, क्योंकि उन्होंने जिन्ना के विचारों का इस्लाम के दृष्टिकोण से विरोध किया। असहमति संभव है, पर राष्ट्र-एकता पर सबको एकमत होना चाहिए।
संघ महापुरुषों का समग्र गुण-आधारित आकलन चाहता है। क्या इसकी दृष्टि वैज्ञानिक चेतना व आलोचनात्मक सोच बढ़ाती है या केवल वैचारिक अनुशासन को?
संघ अवैज्ञानिकता और अंधविश्वास को धर्म में स्थान नहीं देता। स्वामी विवेकानंद ने कहा है, ‘जो वैज्ञानिक नहीं, हिंदू धर्म में उसका कोई स्थान नहीं।’ धर्म हमेशा विज्ञान के ही मापदंड पर चले, यह जरूरी नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि विज्ञान जहां नहीं पहुंचता, धर्म वहां पहुंच जाता है। धर्म विज्ञान की सीमा से आगे जाता है, पर तार्किक-शास्त्रीय आधार अनिवार्य है। अंधभक्ति या अंधविश्वास को संघ प्रोत्साहित नहीं करता, पर विचारों में स्वतंत्रता और वैज्ञानिक दृष्टि का पूर्ण समर्थन करता है।

संघ इतिहास के पुनर्लेखन और ऐतिहासिक अन्याय सुधार के बीच सीमा रेखा कहां खींचता है?
पहले देखिए कि इतिहास के पुनर्लेखन की जरूरत क्यों पड़ी? क्योंकि 1960 के दशक में वामपंथी इतिहासकारों ने कांग्रेस सरकार के समर्थन से भारतीय इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश किया। पाठ्यपुस्तकों में अकबर को ‘ग्रेट’ बनाया गया आदि। उस विकृत इतिहास को सुधारना आवश्यक सुधार (रिफॉर्म) है, न कि नया रिवीजनिज्म। यह सही इतिहास को पुनर्स्थापित करने का प्रयास है। इतिहास में देश के महापुरुषों को उचित स्थान देना चाहिए। लेकिन श्यामा प्रसाद मुखर्जी सहित बड़े स्वतंत्रता सेनानियों और नेहरू मंत्रिमंडल में शामिल आंबेडकर जैसे लोगों के बारे में स्कूलों में पढ़ाया ही नहीं जाता था। और अब वे कह रहे हैं कि 1970 के दशक तक बाबासाहब आंबेडकर का चित्र कहीं होता ही नहीं था। सच यह है कि 1980-90 के दशक में जब संसद में आंबेडकर का तैल चित्र संसद में लगाने का प्रयास हुआ तो उसे लगने नहीं दिया। हमने इसकी चिंता की है-पहले अटल बिहारी वाजपेयी और अब नरेंद्र मोदी जी के समय में यह हुआ। शिक्षा, इतिहास से ऐसे तमाम महापुरुषों को गायब करने के जो प्रयास हुए, उसे ठीक किया जा रहा है।
संघ अल्पसंख्यकों (ईसाई, मुस्लिम आदि) को क्या मानता है? क्या ये बाहरी हैं या ऐतिहासिक भारतीय समुदाय? इस बारे में संघ की दृष्टि क्या है?
नहीं, पहली बात इस शब्दावली ‘अल्पसंख्यक’ के आधार पर चर्चा होनी चाहिए। संघ किसी को अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक नहीं मानता है। संघ इस देश को एक समाज मानता है। इस देश में अल्पसंख्यक तो कोई भी हो सकता है, जिसकी संख्या कम है। जिसकी संख्या 18 करोड़ है, वह अल्पसंख्यक कैसे होगा? यह प्रश्न भी उठता है। लेकिन 99 प्रतिशत मुसलमान और 100 प्रतिशत ईसाई ऐतिहासिक रूप से भारतीय हैं। उनके पूर्वज यहीं के हैं, मात्र पंथ परिवर्तन हुआ। वे अलग नहीं, एक ही समाज के हैं। इसलिए भी हम उन्हें अल्पसंख्यक दृष्टि से नहीं देखते हैं। संघ उन्हें पूर्णतः स्वीकार करता है। संघ खुला संगठन है, कोई भी आ सकता है। संघ में जो आता है वह राष्ट्रभक्त होता है। प्रश्न यह है कि क्या वे संघ के सांस्कृतिक दृष्टिकोण (व्यापक हिंदू अर्थ में राष्ट्रभक्त) को स्वीकार करते हैं? सरसंघचालक जी कहते हैं कि संघ में कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, मुसलमान-ईसाई नहीं होता है, सब राष्ट्रभक्त होते हैं। कई राज्यों में मुस्लिम-ईसाई कार्यकर्ता हैं। उन्हें संघ जाति-पंथ से परे देखता है।

संघ में कार्यकर्ता-प्रचारक भी अल्पसंख्यक दायित्व निभाते हैं? फिर भी राजनीति अपने आरोप-प्रत्यारोप, द्वंद्व और इस झगड़े में संघ जैसे सामाजिक संगठनों को क्यों घसीटने की कोशिश करती है?
दुर्भाग्य से देश में पिछले 70 वर्ष की राजनीति में ‘अल्पसंख्यक ठेकेदार’ उभरे, विशेषकर मुस्लिम-ईसाई समाज के राजनीतक लोग। उन्होंने वोटबैंक बनाया, पर समाज को गरीबी-पिछड़ेपन में रखा और स्वयं सम्पन्न हो गए। सच्चा मित्र कौन है? जो ‘अल्प’ बनाकर अलग रखे या जो 140 करोड़ के साथ बहुल बनने को कहे? पंथ-रक्षा, अच्छी परंपराओं का सम्मान सुनिश्चित करे। इस पर उन मत-मजहब के नेताओं को सोचना चाहिए। संघ चाहता है कि मुस्लिम-ईसाई समाज उस ठेकेदारी की राजनीति से बाहर आए।
संघ के लिए राष्ट्र पहले है या धर्म? दोनों व्याख्याएं अगर कहीं टकराती हैं तो संघ के लिए पहले क्या है?
देखिए, धर्म व्यापक सद्गुणों का संचय है। राष्ट्रधर्म (राष्ट्रप्रेम) उसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। मानवधर्म, सामाजिक धर्म, पर्यावरण, अनेक प्रकार के पारिवारिक धर्म आदि इसमें शामिल हैं। राष्ट्र के प्रति प्रेम रखना राष्ट्रधर्म है और समाज के प्रति प्रेम रखना समाज धर्म है। हमारे वेदों में कहा है, अहं राष्ट्रिय: संगे मम् अर्थात् मैं राष्ट्र में समाविष्ट हूं। हम राष्ट्र को महत्वपूर्ण इकाई मानते हैं। राष्ट्रधर्म को धर्म नहीं, बल्कि व्यापक धर्म का हिस्सा मानते हैं।
संघ आर्थिक विषयों को कैसे देखता है? क्या आर्थिक असमानता के बड़े मुद्दे सांस्कृतिक विषयों से ढक जाएंगे?
आर्थिक विषय तकनीकी हैं; संघ पॉलिसी-निर्धारण नहीं करता, बल्कि व्यापक देशहित और समाजहित पर जोर देता है। हमारी प्राचीन दृष्टि है-सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः अर्थात् सब सुखी व निरोगी हों और सबके सिर पर छत हो यानी हर प्रकार से सुखी हो। धर्म का सार है इस लोक में आनंदपूर्ण जीवन। इसलिए दीनदयाल जी ने आर्थिक व्यवस्था पर ‘इंटीग्रल ह्यूमेनिज्म’ में विस्तार से चर्चा की है। लेकिन वह अंतिम नहीं है। जैसे गांधी जी का ग्राम स्वराज भी अंतिम नहीं है। आज 45 प्रतिशत शहरीकरण और गांवों का अर्बनाइजेशन नई सोच मांगता है। संघ स्वदेशी का समर्थन करता है, जिससे आंतरिक उत्पादन, विनिमय, बाजार से अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। विदेशी निर्भरता र्भरता हमारी अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं है।
संघ की ‘एक राष्ट्र, एक संस्कृति’ सोच भाषाई, क्षेत्रीय, जनजातीय विविधताओं के साथ कैसे सह-अस्तित्व रखती है? यह सहज है या इसमें कुछ चुनौतियां हैं?
नहीं, सहज है। भारतीय संस्कृति स्वाभाविक रूप से बहुलता की उपासक है। घाना जैसे अफ्रीकी देशों में अपनी आदिवासी पहचान पुनर्स्थापित करने के लिए आंदोलन चल रहे हैं। न्यूजीलैंड में माओवादी संसद में लड़ते हैं। भारत में ऐसा कभी क्यों नहीं हुआ? क्योंकि यहां बहुलता पनपी, क्योंकि संस्कृति ने कभी किसी की जीवन-पद्धति, पूजा-आचार को न बदला, न दबाया। संस्कृति जीवित रहेगी तो विविधता सुरक्षित रहेगी, लेकिन शर्त है कि विविधता के साथ एकात्मता भी हो।

संघ कार्य का प्रसार-प्रभाव बढ़ने पर कुछ लोग उसे ध्रुवीकरण के तौर पर चिह्नित करते हैं, उसे सामाजिक फांक के तौर पर दिखाने की कोशिश करते हैं। संघ इसे कैसे देखता है और ये जो जनजागरण हुआ है, उसका उत्तरदायित्व कैसे लेता है?
ध्रुवीकरण तो है, पर किन चीजों के बीच? यह ध्रुवीकरण संघ और इसके व्यापक धर्म विचार को समझ कर समर्थन करने वालों और न समझ पाने वालों के बीच है। संघ किसी ध्रुवीकरण का पक्षधर नहीं है। संघ समर्थकों को मजबूत करता है और न समझने वालों को समझाने का प्रयास करता है। संघ जाति-मजहब-भाषा के आधार पर ध्रुवीकरण नहीं करता है और देश के 140 करोड़ लोगों को एक समाज मानता है। हां, राष्ट्रभक्ति के आधार पर थोड़ा ध्रुवीकरण हो सकता है, जैसे-नक्सलियों और देश विरोधियों का विरोध। नक्सली इस देश की संप्रभुता को नहीं मानते, इसलिए हम उनका विरोध करते हैं और उसे इस ध्रुव में लाने की कोशिश करते हैं। लेकिन संघ राजनीतिक ध्रुवीकरण नहीं करता। संघ के द्वार तो खुले हैं। संघ के कार्यक्रम में प्रणब मुखर्जी जैसे कांग्रेस के शीर्ष नेता भी आए।
अगले 25 वर्ष के लिए संघ का लक्ष्य क्या है? एक अनुशासित समाज या स्वतंत्र प्रश्न करने वाला नागरिक?
संघ के 100 वर्ष का सफर संघर्ष से मुख्यधारा तक रहा। स्थापना के शुरुआती 25 वर्ष (1925-50) में अंग्रेजों की जासूसी, प्रतिबंध और गांधी हत्या के आरोप झेले। 1933 में सेंट्रल प्रोविंसिस की असेंबली में संघ पर प्रतिबंध का प्रस्ताव लाया गया था, पर सदस्यों के विरोध के बाद टल गया। उस समय संघ का विरोध अंग्रेजों के माध्यम से भी होता था। 1950-75 का दौर संघ के लिए अनुकूल रहा। बाद के 25 वर्ष में संघ ने समाज में अपना कार्य बढ़ाना शुरू किया और 2000 आते-आते यह वट वृक्ष बन गया। फिर संघ के प्रचारक रहे अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने। अगले 25 वर्ष में संघ के प्रचारक रहे नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, जो दुनिया में राष्ट्रगौरव के प्रमाण हैं। अब आगामी 25 वर्ष यानी 2025-50 के लिए संघ ने ‘पंच परिवर्तन’ के जरिए समाज में पांच बदलाव लाने का लक्ष्य रखा है। इस ‘पंच परिवर्तन’ में कुटुंब प्रबोधन, स्वदेशी, सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक कर्तृत्व बोध जैसे विषय शामिल हैं। संघ पर आरोप लगाए जाते हैं कि यह संविधान को नहीं मानता। समाज संविधान का पालन करे, पंच परिवर्तन उसी दिशा में एक आंदोलन है।
1976 में इंदिरा गांधी ने संविधान में अनुच्छेद 51A जोड़ा और उसमें कर्तव्यों को शामिल किया, पर यह नॉन-एनफोर्सेबल है। अधिकारों का उल्लंघन हो तो दंड/जेल का प्रावधान है, कर्तव्यों के उल्लंघन पर कोई सजा नहीं। फिर भी संघ संविधान का पूरा सम्मान करता है, इसलिए संविधान प्रेम में ‘सामाजिक कर्तृत्व बोध’ आंदोलन चला रहा है। अगले 25 वर्ष का कालखंड महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि इसमें राष्ट्र परिवर्तन और सनातन संस्कृति पर आधारित समाज निर्माण होना है। इसमें तीन चुनौतियां हैं- एक, राजनीति के साथ संघ का संबंध कैसा रहेगा? दूसरा प्रश्न संगठनात्मक रहेगा, जिसमें महिलाओं की भूमिका, जातियों के समावेश और शाखा तंत्र में बदलाव से जुड़े विषय शामिल होंगे। तीसरी चुनौती, विचारधारा से जुड़ी होगी, जैसे हिंदू की व्यापक परिभाषा, एलजीबीटीक्यू, लिव-इन आदि पर स्पष्टता। इनसे पार कर अनुशासित, स्वतंत्र चिंतनशील समाज बनेगा। मुझे लगता है कि संघ की यात्रा इस दिशा में होगी।

















