पश्चिम बंगाल में आगामी चुनावों से पहले चुनाव आयोग (ECI) ने बड़ी धांधली पकड़ी है। एक ही पते पर 15-20 लोग रहते मिले और कई जगह पर तो मृत लोगों का नाम भी वोटर लिस्ट में शामिल पाया गया। आयोग ने वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा पकड़ने के बाद 4 अधिकारियों और एक कर्मचारी के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज करने का आदेश दिया है।
वोटर लिस्ट में धांधली
चुनाव आयोग ने अपनी जांच में पाया कि मोयना और बारुईपुर पूर्व में तैनात इन अधिकारियों ने वोटर लिस्ट को अपडेट करने में गंभीर लापरवाही बरती है। आयोग के लेटेस्ट सॉफ्टवेयर ने ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ के तहत हजारों संदिग्ध नामों को अलग छांटा। सॉफ्टवेयर ने अलर्ट किया था कि एक ही मकान नंबर पर 10 से 20 लोग रजिस्टर्ड हैं, जो व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। इसके अलावा एक ही फोटो या आईडी पर कई अलग-अलग नाम दर्ज थे।
दफ्तर में बैठकर वेरिफाइड का बटन दबाया
नियम के मुताबिक, चुनाव पंजीकरण अधिकारियों (ERO) और सहायक चुनाव पंजीकरण अधिकारियों (AERO) को अपनी टीम भेजकर जमीनी स्तर पर जांच करवानी थी। लेकिन इन अफसरों ने दफ्तर में बैठकर ही ‘वेरिफाइड’ का बटन दबा दिया। मतलब बिना किसी जांच के फर्जी वोटरों को आधिकारिक रूप से वैध घोषित कर दिया गया।
आयोग ने इसे ‘मानवीय भूल’ मानने से इनकार कर दिया है, क्योंकि 100 वर्ग फुट के छोटे से कमरे में 15-20 लोगों का रहना नामुमकिन है, जिसे अधिकारियों ने जानबूझकर अनदेखा किया। जांच में फर्जीवाड़े के कई और तरीके भी सामने आए हैं।
अनमैप्ड वोटर्स
वोटर लिस्ट में अनमैप्ड वोटर्स की एक श्रेणी होती है, इसमें उन लोगों के नाम होते हैं जो वोटर लिस्ट में शामिल हैं, लेकिन उन्हें कोई पोलिंग बूथ या पते से जोड़ा नहीं गया होता। ऐसे लोगों की जांच कर उन्हें सही पोलिंग बूथ में शामिल करने काम अधिकारियों की थी, लेकिन पता चला है कि उन्होंने बिना जांच किए ही इन नामों को लिस्ट में वैसे ही पड़े रहने दिया। जानकारों का मानना है कि ऐसे फर्जी नामों का इस्तेमाल ‘बोगस वोटिंग’ के लिए किया जाता है।
मृतकों के नाम नहीं हटाए
मोयना विधानसभा क्षेत्र में कई ऐसे मतदाता मिले जिनकी मृत्यु वर्षों पहले हो चुकी है। मृत्यु प्रमाण पत्र होने के बावजूद अधिकारियों ने ‘फॉर्म-7’ (नाम हटाने का आवेदन) को नहीं भरा। इससे वोटर लिस्ट की संख्या वास्तविक आबादी से कहीं ज्यादा दिखाई दे रही थी।
मिले 24 लाख संदिग्ध मतदाता
पूरे पश्चिम बंगाल में करीब 24 लाख संदिग्ध मतदाता मिले। जब आयोग ने लिस्ट सही करने का दबाव बनाया, तो अधिकारियों ने बीएलओ (BLO) के जरिए डाटा सही करने के बजाय शॉर्टकट अपनाया और दफ्तर में बैठे-बैठे ही लिस्ट को बिना जांचे-परखे अपडेट कर दिया। इस तरह बिना जांच के नाम को पास कर देना लापरवाही के साथ ही आपराधिक श्रेणी में आता है।
इसलिए चुनाव आयोग ने ऐसे अफसरों पर केस दर्ज किया है। पुलिस अब उनसे पूछताछ करेगी कि उन्होंने किसके दबाव में यह फर्जीवाड़ा किया। साथ ही यह भी पता लगाएगी कि क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक साजिश थी? इसके जरिए आयोग ने साफ कर दिया है कि अगर कोई भी वोटर लिस्ट में गड़बड़ी करते पाया गया, तो अब केवल तबादला नहीं होगा, बल्कि जेल भी जाना पड़ेगा।

















